बारह साल में पटरियां बिछती रहीं, भाषण दौड़ते रहे, आंकड़े चमकते रहे; मगर घर के चूल्हे से पूछिए—उसके हिस्से में विकास कितना आया?
जमीनी आवाज़ | संपादकीय। असित भट्टाचार्य
देश को विकास की ऐसी ट्रेन का इंतजार है, जिसकी पटरियां तो पिछले बारह वर्षों में लगातार बिछाई गईं, लेकिन ट्रेन का पता अभी तक नहीं चला। टिकट जनता ने खरीदा, प्लेटफॉर्म पर जनता खड़ी रही और घोषणा भी जनता के नाम पर होती रही—बस विकास बाबू हर बार अगली ट्रेन से आने की सूचना देकर निकल गए!
पहले नोटबंदी आई। कहा गया कि इससे काला धन खत्म होगा, भ्रष्टाचार पर चोट होगी और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। फिर जीएसटी आया—'एक देश, एक टैक्स' का नारा लेकर। उसके बाद महंगाई ने घर की रसोई में अपना स्थायी कार्यालय खोल लिया। बेरोजगारी ने युवाओं के हाथों से काम छीनकर उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की कतार में खड़ा कर दिया। और अब अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर भी सवाल उठने लगे हैं।
सरकारी और अंतरराष्ट्रीय आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है। विश्व बैंक के अनुसार FY2026 में भारत की वृद्धि दर 7.6% रही और FY2027 के लिए 6.6% का अनुमान है।
लेकिन सवाल यही है—GDP बढ़ने की खबर घर की रसोई तक कितनी पहुंची?
क्योंकि आंकड़ों की थाली में विकास परोसा जा सकता है, मगर गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार को अंततः दाल, चावल, तेल, सब्जी, दूध, दवा, बच्चों की फीस और बिजली का बिल ही देखना पड़ता है।
जुलाई 2026 में देश की खुदरा महंगाई 4.45% और खाद्य महंगाई 5.52% दर्ज हुई। यानी जिस परिवार की आमदनी पहले ही सीमित है, उसके लिए हर महीने की रसोई का हिसाब किसी वित्त मंत्रालय की एक्सेल शीट से नहीं, खाली होती जेब से तय होता है।
और बेरोजगारी? यह केवल रोजगार कार्यालय की फाइल में दर्ज एक प्रतिशत नहीं है। यह उस घर की बेचैनी है, जहां पढ़ा-लिखा बेटा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते-करते उम्र की सीमा पार कर जाता है। यह उस पिता की चिंता है जो पूछता है—'बेटा, नौकरी कब लगेगी?' और उस बेटे की खामोशी है जिसके पास जवाब नहीं है।
यही वह जगह है जहां विकास के बड़े-बड़े दावे और जमीन की छोटी-सी सच्चाई आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है।
सरकार को उपलब्धियों का हिसाब देने का पूरा अधिकार है। लेकिन जनता को भी सवाल पूछने का उतना ही अधिकार है।
अगर अर्थव्यवस्था बढ़ रही है तो आम परिवार की आय कितनी बढ़ी? अगर रोजगार बढ़ रहा है तो युवाओं की कतारें इतनी लंबी क्यों हैं? अगर महंगाई नियंत्रण में है तो रसोई का बजट हर महीने क्यों बिगड़ता है? अगर विकास गांव-गांव पहुंचा है तो किसान, मजदूर और छोटे दुकानदार अपनी आमदनी को लेकर इतने परेशान क्यों हैं?
यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने बड़े-बड़े लक्ष्य सामने रखे हैं। लेकिन देश की जनता केवल लक्ष्य नहीं, नतीजे भी देखना चाहती है। उसे दुनिया में भारत की बढ़ती हैसियत पर गर्व है, लेकिन वह यह भी चाहती है कि उसके अपने घर की हैसियत बढ़े।
क्योंकि किसी देश का विकास केवल ऊंची इमारतों, एक्सप्रेसवे, डिजिटल भुगतान और बड़े आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापा जाता।
विकास तब माना जाएगा जब घर का चूल्हा बिना उधार के जले, युवा नौकरी के लिए भटकने के बजाय काम पैदा करे, किसान अपनी उपज की कीमत से सम्मानपूर्वक जी सके, मजदूर की मजदूरी परिवार चला सके और महीने की 25 तारीख को घर की जेब में 26 तारीख का डर न बैठा हो।
आज सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि विकास की घोषणा बहुत तेज है, लेकिन आम आदमी की जेब की चाल उससे कहीं धीमी।
नोटबंदी की पटरी बिछी, जीएसटी की पटरी बिछी, महंगाई की पटरी अपने आप बन गई, बेरोजगारी की पटरी पर लाखों युवा खड़े हैं और मंदी की आशंका वाली पटरी भी सामने दिखाई दे रही है।
बस पांचों पटरियां तैयार हैं—अब जनता पूछ रही है, विकास की ट्रेन आखिर किस प्लेटफॉर्म पर खड़ी है?
और अगर ट्रेन सचमुच चल रही है, तो शायद सरकार को कभी-कभार वातानुकूलित डिब्बे से उतरकर उस जनरल डिब्बे में भी झांक लेना चाहिए, जहां भारत की असली जनता सफर कर रही है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा आर्थिक सर्वेक्षण किसी मंत्रालय की रिपोर्ट नहीं होता। वह घर की रसोई होती है। वह बेरोजगार बेटे की आंख होती है। वह मजदूर की हथेली होती है। और वह महीने के आखिर में खाली बची जेब होती है।
जमीनी आवाज का सवाल सीधा है—देश के विकास की रफ्तार चाहे जितनी हो, क्या वह रफ्तार आम आदमी के घर तक भी पहुंच रही है?





