पोटका---असित भट्टाचार्य "जल ही जीवन है"—लेकिन डुमरिया प्रखंड की केन्दुआ पंचायत के ग्रामीणों के लिए यही जीवन आज संघर्ष बन गया है। सरकार की नल-जल योजना के तहत घर-घर पानी पहुंचाने के लिए बड़ी राशि खर्च की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है। कहीं नल खराब पड़े हैं तो कहीं जलमीनारें जवाब दे चुकी हैं। नतीजा यह है कि ग्रामीण आज भी पानी के लिए बाहर जाने को मजबूर हैं। पेयजल संकट की इस गंभीर समस्या की ओर युवा नेत्री दुखनी सोरेन ने ध्यान आकृष्ट कराया है। उन्होंने ग्रामीणों की परेशानी को सामने लाते हुए व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठाया है। सबसे चिंताजनक तस्वीर यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी ग्रामीणों को जंगल के गड्ढों में जमा पानी तक से अपनी प्यास बुझाने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है। जिस नल-जल योजना का उद्देश्य ग्रामीणों के घर तक स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचाना था, उसी योजना के बावजूद अगर ग्रामीण पानी के लिए बाहर भटक रहे हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है। करोड़ों की योजना, फिर भी पानी के लिए संघर्ष क्यों? नल-जल योजना पर खर्च होने वाली भारी-भरकम राशि के बावजूद यदि नल में पानी नहीं आ रहा और जलमीनारें बेकार पड़ी हैं, तो सिर्फ योजना का निर्माण कर देना ही पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि योजनाओं की नियमित निगरानी कौन कर रहा है? खराब पड़ी जलापूर्ति व्यवस्था की मरम्मत कब होगी? और सबसे बड़ा सवाल—ग्रामीणों को उनके हिस्से का पानी आखिर कब मिलेगा? पानी कोई एहसान नहीं, हर नागरिक का अधिकार है। ग्रामीणों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। अब जरूरत सिर्फ कागजों और घोषणाओं की नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर व्यवस्था को दुरुस्त करने की है। डुमरिया प्रखंड के केन्दुआ पंचायत में बंद पड़ी अथवा खराब पेयजल योजनाओं को तत्काल दुरुस्त कर ग्रामीणों को नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। जमीनी आवाज का सीधा सवाल जब घर-घर नल पहुंचाने पर इतनी बड़ी राशि खर्च हो रही है, तो फिर घर-घर पानी क्यों नहीं पहुंच रहा? योजना बनी, पैसा खर्च हुआ और नल भी लग गए—फिर ग्रामीणों की प्यास अब तक क्यों नहीं बुझी? यही सवाल अब व्यवस्था से जवाब मांग रहा है।