सरायकेला। विजय कुमार गोप चांडिल डैम बहुउद्देशीय परियोजना से उजड़े विस्थापित परिवारों के दर्द और वर्षों से लंबित समस्याओं को समझने के लिए चांडिल डैम विस्थापित समन्वय मंच की 116 विस्थापित गांवों और 13 पुनर्वास स्थलों में चल रही संवाद यात्रा लगातार जारी है। दूसरे चरण के दूसरे दिन मंच ने ईचागढ़ प्रखंड के कई गांवों और पुनर्वास स्थल का दौरा कर विस्थापित परिवारों से सीधा संवाद किया। 7 सितंबर से 12 सितंबर 2026 तक चलने वाली इस संवाद यात्रा के तहत मंच छोटा आमड़ा, बड़ा आमड़ा, हुटुप, नदीसाई, फिरगिवासा, कुंदरिलोंग, बनकाटी पुनर्वास स्थल और लेपाटांड़ पहुंचा। यहां विस्थापित परिवारों ने मंच के सदस्यों के सामने अपनी वर्षों पुरानी समस्याएं और अपेक्षाएं रखीं। संवाद के दौरान लंबित मुआवजा, पुनर्वास, जमीन और अधिकार से जुड़े मुद्दे तथा विस्थापन के बाद पैदा हुई सामाजिक एवं आर्थिक परेशानियां प्रमुख रूप से सामने आईं। विस्थापितों का कहना है कि परियोजना के निर्माण के वर्षों बाद भी कई परिवार आज तक अपने अधिकार और उचित पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहे हैं। मंच के सदस्य राकेश रंजन महतो, श्यामल मार्डी और अंबिका यादव ने कहा कि यह यात्रा महज समस्याएं सुनने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि विस्थापित समाज को एकजुट कर निर्णायक संघर्ष की जमीन तैयार करने का अभियान है। उन्होंने कहा कि सरकारें बदलती रहीं, घोषणाएं होती रहीं और आश्वासन भी मिलते रहे, लेकिन विस्थापितों की मूल समस्याओं का स्थायी समाधान आज भी जमीन पर दिखाई नहीं देता। कागज पर नहीं, जमीन पर चाहिए विस्थापन आयोग मंच ने सरकार से मांग की कि विस्थापन आयोग की घोषणा को केवल सरकारी कागजों तक सीमित नहीं रखा जाए। आयोग को अविलंब धरातल पर लागू करते हुए उसे पर्याप्त अधिकार और संसाधन दिए जाएं, ताकि वर्षों से लंबित विस्थापन संबंधी मामलों का समयबद्ध और न्यायपूर्ण समाधान हो सके। मंच ने स्पष्ट किया कि संवाद यात्रा 12 सितंबर को पूरी होने के बाद सभी गांवों से प्राप्त सुझावों और समस्याओं को लेकर सामूहिक बैठक आयोजित की जाएगी। इसी बैठक में विस्थापितों की राय के आधार पर आंदोलन की अगली रणनीति तय की जाएगी। मंच ने चेतावनी दी कि यदि सरकार विस्थापितों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेती है और समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं करती, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। संवाद यात्रा के दौरान सागर महतो, अंजित किस्कू, मनोहर महतो, हरेकृष्ण महतो, अनिल मुर्मू, रेंघू हेंब्रम सहित बड़ी संख्या में विस्थापित ग्रामीण मौजूद रहे।