पहली गवाही दस्तावेज़ की—जब कॉपर कंपनी और मजदूर आमने-सामने थे, तब मजदूरों की मजदूरी से लेकर सुरक्षा, आवास, इलाज और बोनस तक हर सवाल न्यायिक जांच के दायरे में आया

जमीनी आवाज की पड़ताल: 20 जुलाई 1947 के बिहार गजट में दर्ज अवार्ड सिर्फ कागज नहीं, मजदूर और प्रबंधन के रिश्ते का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है

जमीनी आवाज के संपादक असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट

आज हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड के इतिहास, उसके मजदूरों और यूनियनों से जुड़े सवालों को समझने के लिए अगर कोई पाठक सात-आठ दशक पीछे जाना चाहे, तो उसे सिर्फ कंपनी की वर्तमान व्यवस्था नहीं, बल्कि उस दौर के दस्तावेजों को भी पढ़ना होगा। इन्हीं दस्तावेजों में एक महत्वपूर्ण नाम सामने आता है—शिवपूजन राय अवार्ड।

जमीनी आवाज के पास उपलब्ध 20 जुलाई 1947 के बिहार गजट (Extraordinary) की प्रति बताती है कि यह मामला भारतीय कॉपर कॉरपोरेशन लिमिटेड और उसके कर्मचारियों के बीच औद्योगिक विवाद से जुड़ा था। उस समय भारतीय कॉपर कॉरपोरेशन लिमिटेड ही वह कंपनी थी जिसके कार्यक्षेत्र में मऊभंडार और मुसाबनी का तांबा उद्योग आता था।

दस्तावेज में बताया गया है कि बिहार सरकार के श्रम विभाग की अधिसूचना के तहत शिवपूजन राय, तत्कालीन अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, को इस औद्योगिक विवाद की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिनिर्णायक नियुक्त किया गया था। यानी यह कोई सामान्य यूनियन बैठक या कंपनी के भीतर की बातचीत नहीं थी—मजदूरों और कंपनी के बीच उठे सवाल औपचारिक औद्योगिक न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच चुके थे।

आखिर शिवपूजन राय अवार्ड था क्या?

सरल भाषा में समझें तो यह वह न्यायिक प्रक्रिया थी जिसमें कंपनी और उसके कर्मचारियों के बीच उठे रोजगार एवं सेवा संबंधी विवादों पर विचार किया गया।

दस्तावेज के अनुसार कंपनी ने अपना मेमोरेंडम प्रस्तुत किया और ट्रेड यूनियन की ओर से भी अपनी बात रखी गई। इसके बाद विवाद से जुड़े अनेक प्रश्नों को अधिनिर्णायक के सामने रखा गया।

और यहीं से यह दस्तावेज आज के पाठक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि इन सवालों को पढ़ने से पता चलता है कि 1947 में मजदूरों की समस्या केवल वेतन तक सीमित नहीं थी।

मजदूरों के सामने मजदूरी थी, महंगाई भत्ता था, पदोन्नति थी, आवास था, चिकित्सा व्यवस्था थी, काम के घंटे थे, छुट्टियां थीं, सुरक्षा थी, बोनस था, भविष्य निधि थी, अस्थायी मजदूरों की स्थिति थी और यहां तक कि यह सवाल भी था कि क्या कंपनी खाली पड़े पदों को न भरकर कर्मचारियों से अधिक काम ले रही है।

34 सवाल—और मजदूर जीवन का पूरा आईना

दस्तावेज में क्रमवार कई सवाल दर्ज हैं। पहले सवालों में मऊभंडार मजदूर यूनियन को मान्यता देने का प्रश्न था। इसके बाद वर्क्स कमेटी बनाने और उसके कामकाज पर सवाल उठाया गया।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या पिछले वर्षों में कुछ मजदूरों को बिना उचित जांच के नौकरी से निकाला गया या बर्खास्त किया गया और यदि ऐसा हुआ तो क्या उन्हें दोबारा नौकरी में लिया जाना चाहिए?

यानी आज जिस विषय को हम नौकरी की सुरक्षा या सर्विस सिक्योरिटी कहते हैं, उसका सवाल 1947 के दस्तावेज में भी मौजूद था।

इसके बाद कंपनी के Standing Orders और Service Conditions पर सवाल आया—क्या मौजूदा नियम मजदूरों की नौकरी की सुरक्षा के लिए पर्याप्त हैं? अगर नहीं, तो और कौन से नियम बनाए जाने चाहिए?

फिर आया ग्रेड सिस्टम का प्रश्न। क्या अलग-अलग विभागों में न्यूनतम और अधिकतम ग्रेड के बीच एक संतोषजनक वेतन व्यवस्था मौजूद थी? यदि नहीं, तो क्या नया ग्रेड सिस्टम बनाया जाना चाहिए?

इसके बाद Provident Fund में कंपनी के योगदान के अलावा अतिरिक्त योगदान का सवाल भी सामने आया। और फिर Dearness Allowance यानी महंगाई भत्ता। दस्तावेज पूछता है कि क्या कंपनी द्वारा कर्मचारियों को दिया जा रहा महंगाई भत्ता संशोधित किए जाने की जरूरत है? यदि हां, तो किस तरीके से और किस तारीख से?

यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है—जिस उद्योग में मजदूर अपने श्रम से उत्पादन कर रहा था, वहां उसकी वास्तविक आय और जीवन-यापन की लागत के बीच संतुलन कैसे तय होगा?

मजदूर सिर्फ मजदूरी नहीं मांग रहा था—वह सम्मानजनक जीवन मांग रहा था

दस्तावेज के अगले प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हैं। क्या कंपनी को अपने कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट हाउस और होटल का निर्माण करना चाहिए? क्या मौजूदा काम के घंटे संशोधित किए जाने चाहिए? क्या कंपनी को मजदूरों को जूते, दस्ताने, एप्रन, गॉगल्स और रेनकोट उपलब्ध कराने चाहिए और यदि हां तो किन विभागों में?

यह सवाल उस समय के औद्योगिक कार्यस्थल की वास्तविक तस्वीर सामने लाता है। इसके बाद पूछा गया कि क्या मजदूरों को उनके काम की प्रकृति के अनुसार उचित सुविधाएं मिल रही हैं।

खतरनाक काम करने वाले मजदूरों के लिए विशेष छुट्टी/रियायत होनी चाहिए या नहीं—यह भी विवाद का हिस्सा था। हार्ड जॉब करने वाले मजदूरों को सोडा, बर्फ आदि जैसी सुविधाएं दिए जाने का प्रश्न भी दर्ज है।

अर्थात दस्तावेज यह दिखाता है कि मजदूरों के अधिकारों की चर्चा केवल वेतन-पर्ची तक सीमित नहीं थी। काम की जगह पर सुरक्षा और काम के बाद जीवन की गुणवत्ता भी विवाद का हिस्सा थी।

और फिर आया वह सवाल जो आज भी चुभता है—मजदूरों की भर्ती कैसे होती है? दस्तावेज में कंपनी की Recruitment System पर भी सवाल उठाया गया। प्रश्न था कि क्या वर्तमान भर्ती प्रणाली संतोषजनक है? यदि नहीं, तो इसे अधिक संतोषजनक आधार पर कैसे बनाया जाए?

इसके बाद दुर्घटना में घायल होने वाले मजदूरों के मुआवजे की बात आती है। यदि कोई मजदूर कार्यस्थल की दुर्घटना के कारण तीन सप्ताह से कम समय के लिए काम करने में असमर्थ होता है, तो क्या उसे मुआवजा दिया जाना चाहिए? यदि हां, तो किस आधार पर?

यह सवाल बताता है कि औद्योगिक दुर्घटना को केवल मजदूर की व्यक्तिगत समस्या मानने के बजाय उसके रोजगार और मुआवजे के अधिकार से जोड़कर देखा जा रहा था।

चिकित्सा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में थी

अवार्ड में कंपनी के Medical Department को लेकर भी सवाल रखा गया। क्या कंपनी के चिकित्सा विभाग की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है ताकि मजदूरों को बेहतर उपचार और सेवा मिल सके?

सोचिए—1947 के दस्तावेज में मजदूरों के बेहतर इलाज की मांग दर्ज है। आज जब उसी औद्योगिक क्षेत्र का इतिहास हमारे सामने है, तो यह सवाल पूछना जरूरी है कि उस समय उठाए गए मजदूर हित के प्रश्नों की विरासत आगे कितनी बची?

खाली पद न भरकर मजदूरों पर अतिरिक्त बोझ?

दस्तावेज में एक और बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या कंपनी ने ऐसी नीति अपनाई है कि खाली हो चुके पदों को भरने के बजाय काम को कर्मचारियों के बीच बांटकर उनसे अतिरिक्त काम कराया जाए?

यह सवाल आज की भाषा में work intensification और कर्मचारियों पर बढ़ते कार्यभार से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

और इसके बाद आया मशीनरी बंद रहने अथवा फैक्ट्री बंद होने की अवधि में मजदूरों को मुआवजा देने का प्रश्न। यानी उत्पादन बंद हो तो नुकसान सिर्फ कंपनी का नहीं—उस अवधि में मजदूर की रोजी-रोटी का क्या होगा, यह सवाल भी औद्योगिक विवाद का हिस्सा था।

भविष्य निधि, छुट्टी और आवास—मजदूर जीवन का पूरा खाका

अवार्ड में Provident Fund को सभी कर्मचारियों तक बढ़ाने और मौजूदा PF योजना में बदलाव की जरूरत का प्रश्न है। मजदूरों और क्लर्कों को दी जा रही अलग-अलग प्रकार की छुट्टियां पर्याप्त हैं या नहीं—यह भी पूछा गया।

इसके बाद कंपनी के आवास पर सवाल आया। क्या कंपनी द्वारा उपलब्ध कराया गया आवास पर्याप्त है? क्या sweepers और work guards को मुफ्त क्वार्टर दिए जाने चाहिए? क्या office clerks को परिवार के लिए मुफ्त क्वार्टर देने की मौजूदा व्यवस्था संतोषजनक है?

यानी 1947 का दस्तावेज हमें यह समझने में मदद करता है कि मजदूर और कर्मचारी को केवल वेतन लेने वाला व्यक्ति नहीं माना जा रहा था, बल्कि उसके आवास, परिवार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को भी रोजगार संबंध का हिस्सा माना जा रहा था।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है... क्योंकि दस्तावेज के अगले हिस्से में सवाल और भी गंभीर होते जाते हैं।

बोनस, उत्पादन बोनस, ओवरटाइम, अस्थायी मजदूरों की छह महीने बाद स्थायी नियुक्ति, वरिष्ठ कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी, वेतन में कमी-बढ़ोतरी और कंपनी की जिम्मेदारियां—इन सब पर सवाल दर्ज हैं।

यही वह हिस्सा है जहां से शिवपूजन राय अवार्ड की असली ताकत सामने आती है।

अगली कड़ी में हम उसी दस्तावेज के सवाल नंबर 21 से आगे पढ़ेंगे और देखेंगे कि मजदूरों के लिए आवास, काम के घंटे, सुरक्षा उपकरण, खतरनाक काम, शिक्षा, बोनस, अस्थायी कर्मचारियों और ओवरटाइम तक को लेकर 1947 में क्या सवाल उठाए गए थे। जारी...