सरायकेला-खरसावां : जमशेदपुर ब्यूरो चीफ विजय कुमार गोप की रिपोर्ट....
तिरुलडीह क्षेत्र में अवैध बालू के कारोबार को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि क्षेत्र में जगह-जगह अवैध रूप से बालू का भंडारण किया जा रहा है और रात-दिन हाईवा के जरिए बालू की ढुलाई जारी है। आरोप है कि इस कारोबार का दायरा पश्चिम बंगाल, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां के विभिन्न क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल बालू के परिवहन चालान को लेकर उठ रहा है। स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार, कई वाहनों के पास महज 300 सीएफटी बालू का चालान रहता है, जबकि हाईवा में कथित तौर पर करीब 700 सीएफटी बालू लोड किया जाता है। यदि यह आरोप जांच में सही साबित होता है तो लगभग 400 सीएफटी बालू बिना वैध चालान के परिवहन किए जाने का मामला सामने आ सकता है।
इतना ही नहीं, ग्रामीणों का आरोप है कि दिन में एक चालान कटवाकर उसी चालान के आधार पर रात के समय दो से तीन ट्रिप तक बालू ढोया जाता है। ऐसे में सवाल सिर्फ अवैध बालू परिवहन का नहीं, बल्कि सरकारी राजस्व की संभावित बड़े पैमाने पर चोरी का भी है।
चालान कट रहा है तो फिर खेल इतना आसान क्यों?
बालू कारोबार में चालान व्यवस्था का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि सरकार को निर्धारित राजस्व मिले और परिवहन की मात्रा का हिसाब स्पष्ट रहे। लेकिन यदि एक निर्धारित मात्रा के चालान की आड़ में उससे कहीं अधिक बालू ढोया जा रहा है या उसी चालान पर कई ट्रिप किए जा रहे हैं, तो यह पूरी व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि वैध चालान के साथ बालू का परिवहन हो और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही बालू लाया-ले जाया जाए, तो स्थानीय लोगों को भी आपत्ति नहीं होगी। समस्या तब पैदा होती है जब कागज पर कुछ और और जमीन पर कुछ और दिखाई देता है।

राजस्व का नुकसान, स्थानीय लोगों की परेशानी
अवैध बालू कारोबार का असर केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, भारी वाहनों की लगातार आवाजाही से गांवों की सड़कों की हालत खराब हो रही है, धूल और दुर्घटना का खतरा बढ़ रहा है तथा आम लोगों को आवागमन में परेशानी झेलनी पड़ रही है।
दूसरी ओर, नदी घाटों से लगातार और अनियंत्रित बालू उठाव होने से नदी के प्राकृतिक स्वरूप, जलस्रोत और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
प्रशासनिक निगरानी पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि तिरुलडीह क्षेत्र में लंबे समय से बालू का कारोबार चल रहा है, लेकिन प्रभावी और लगातार निगरानी दिखाई नहीं देती। कभी-कभार अवैध बालू डंप पर कार्रवाई की खबर सामने आती है, लेकिन इसके बावजूद कारोबार दोबारा सक्रिय हो जाता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर हाईवा दिन-रात चल रहे हैं, डंप संचालित हो रहे हैं और परिवहन हो रहा है, तो जिम्मेदार विभागों की नजर आखिर कहां है?
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और खनन विभाग से मांग की है कि तिरुलडीह क्षेत्र के सभी संदिग्ध बालू डंप, हाईवा और परिवहन चालानों की गहन जांच की जाए। विशेष रूप से वाहनों में वास्तविक रूप से लदी बालू की मात्रा और चालान में दर्ज मात्रा का मिलान कराया जाए।
साथ ही यह भी जांच हो कि एक ही चालान पर कितनी बार परिवहन किया गया और संबंधित वाहनों की ई-चालान तथा परिवहन संबंधी पूरी जानकारी खंगाली जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि जांच निष्पक्ष हुई तो सिर्फ बालू के अवैध कारोबार की परतें ही नहीं खुलेंगी, बल्कि यह भी सामने आ सकता है कि सरकारी राजस्व को कितने समय से और किस तरीके से नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन गंभीर आरोपों को महज शिकायत मानकर फाइल में दबाता है या फिर हाईवा, डंप और चालान की जमीन पर जांच कर तिरुलडीह के कथित बालू खेल का पूरा हिसाब जनता के सामने रखता है।





