E20 का जश्न, मक्के का संकट और महंगाई की मार—आखिर आत्मनिर्भर भारत में आत्मनिर्भर कौन हो रहा है?
संपादकीय। असित भट्टाचार्य
भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना बुरा नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि विश्वगुरु बनने की इस दौड़ में वह भारत कहां है, जो खेत में पसीना बहाता है, कारखाने में मशीन चलाता है और दिनभर मजदूरी करके शाम को अपने घर की रसोई जलाता है?
2014 से अब तक देश ने विकास, आत्मनिर्भरता, मेक इन इंडिया, किसान आय, रोजगार और विश्वगुरु जैसे बड़े-बड़े नारों की लंबी यात्रा देखी है। उपलब्धियां गिनाने के लिए आंकड़े भी हैं और मंच भी। लेकिन जमीन पर खड़ा किसान और मजदूर आज भी एक सीधा सवाल पूछ रहा है—मेरी जिंदगी में कितना बदलाव आया?
E20 को देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने और किसानों के लिए नया बाजार बनाने की बात कही जाती है। सवाल यह नहीं कि एथेनॉल क्यों बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि इस पूरी व्यवस्था में किसान के हिस्से में आखिर आया क्या?
मक्का इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
सरकार की एथेनॉल नीति में मक्के की मांग को किसानों के लिए अवसर के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन उपलब्ध कृषि मंत्रालय और Agmarknet के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2025 से अगस्त 2026 तक हर महीने मक्के का औसत मंडी भाव MSP से नीचे रहा। अगस्त 2026 में औसत मंडी भाव ₹2,008.69 प्रति क्विंटल था, जबकि MSP लगभग ₹391 अधिक था।
तो फिर सवाल बिल्कुल जायज है—अगर एथेनॉल से किसान की आय बढ़नी थी, तो मक्का किसान को MSP से नीचे क्यों बेचना पड़ रहा है?
इधर आम आदमी की रसोई भी अपने सवाल पूछ रही है। जुलाई 2026 में देश की खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत रही।
और इसी बीच केंद्र सरकार के Price Monitoring System में 26 अगस्त 2026 को अंडे का अखिल भारतीय औसत खुदरा भाव ₹84.17 प्रति किलोग्राम दर्ज हुआ (सरकारी मूल्य निगरानी में अंडे की कीमत किलोग्राम की इकाई में दर्ज है)।
यह आंकड़ा अपने आप में एक अलग सवाल खड़ा करता है—क्या हमारी नीतियों में आम आदमी की थाली को देखने वाली आंख बची है?
यहां यह भी समझना जरूरी है कि सरकारी पोर्टल पर अंडे की कीमत किलोग्राम में दर्ज होना और बाजार में अंडे का किलोग्राम के हिसाब से बिकना एक बात नहीं है। लेकिन जब सरकार के अपने मूल्य निगरानी तंत्र में ऐसी इकाई दिखाई देती है, तो उसके पीछे की व्यवस्था और आंकड़ों की पारदर्शिता पर सवाल पूछना जनता का अधिकार है।
दरअसल असली संकट केवल E20 या मक्का का नहीं है। संकट उस सोच का है जिसमें नीति बनाते समय उद्योग की लागत, बाजार की जरूरत और राजस्व का हिसाब तो दिखाई देता है, लेकिन मजदूर की मजदूरी और किसान की लागत आखिर में फुटनोट बन जाती है।
किसान से कहा गया—उत्पादन बढ़ाओ। उसने बढ़ाया।
मजदूर से कहा गया—देश बदल रहा है। उसने अपना पसीना दिया।
युवा से कहा गया—नए अवसर आएंगे। उसने इंतजार किया।
लेकिन जब सवाल आया कि इन सबकी जिंदगी कब बदलेगी, तो जवाब आंकड़ों और नारों में खोजा जाने लगा।
विश्वगुरु बनने का अर्थ यह नहीं कि दुनिया भारत की तारीफ करे और भारत का गरीब अपने ही घर में महंगाई से हार जाए।
विश्वगुरु बनने का पहला प्रमाण यह होना चाहिए कि किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पाए, मजदूर को उसकी मेहनत की पूरी कीमत मिले, युवा को सम्मानजनक रोजगार मिले और गरीब की रसोई बाजार के सामने घुटने न टेके।
देश की असली ताकत संसद के भाषणों में नहीं, खेत में झुकी किसान की कमर और निर्माण स्थल पर उठते मजदूर के हाथों में है।
इसलिए आज सवाल सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है—हम ऐसा भारत बना रहे हैं जिसमें देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, या ऐसा भारत जिसमें मजबूत होने का बोझ हमेशा किसान और मजदूर ही उठाएंगे?
अगर विकास का लाभ ऊपर जाता रहे और उसकी कीमत नीचे वाला चुकाता रहे, तो फिर हमें एक बार रुककर पूछना होगा—विश्वगुरु बनने की इस दौड़ में कहीं हम अपने ही भारत को तो पीछे नहीं छोड़ रहे?





