संपादकीय | असित भट्टाचार्य

आज से भाजपा में कई नेता बेरोजगार हो गए होंगे। संसद का मानसून सत्र खत्म हुआ तो कुछ नेताओं के हाथ से वह काम भी चला गया, जिसमें वे जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा करते थे। लेकिन चिंता मत कीजिए—राजनीति में बेरोजगारी भत्ता नहीं मिलता, इसलिए शायद अगली बार कोई नया पद, नया बोर्ड या नई जिम्मेदारी मिल जाए!

लेकिन असली बेरोजगार कौन है?

वह युवा, जिसने परीक्षा दी और पेपर लीक हो गया? वह नौजवान, जिसने डिग्री ली और नौकरी नहीं मिली? वह अभ्यर्थी, जिसने वर्षों तैयारी की और परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा किया, लेकिन व्यवस्था ने उसके भरोसे का ही पेपर लीक कर दिया? या फिर वह सरकार, जिसके पास हर सवाल का जवाब है—सिवाय रोजगार के?

कल तक संसद में सत्ता और विपक्ष की अपनी-अपनी स्क्रिप्ट थी। कोई हंगामा कर रहा था, कोई विधेयक पारित करा रहा था, कोई माइक ढूंढ रहा था और कोई कैमरा। लेकिन संसद से बाहर निकलते ही असली संसद शुरू हो गई—जनता की संसद।

और इस संसद में न स्पीकर है, न मार्शल, न वेल में जाने की जरूरत।

यहां सवाल सीधे है—नौकरी कहां है? परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं है? युवाओं का भविष्य कब सुरक्षित होगा?

सरकार को शायद लग रहा था कि हर विरोध को किसी लेबल से चुप करा दिया जाएगा। कभी आंदोलनकारी, कभी विपक्षी, कभी देशविरोधी और अब "दिमागी नक्सल"। प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में "दिमागी नक्सल" का जिक्र हुआ और उसी समय देश का युवा पूछ रहा था—साहब, दिमाग तो हमारे पास भी है, लेकिन नौकरी किसके पास है?

यही सबसे बड़ा संकट है।

सरकार को जंगल के नक्सल दिखाई दे रहे हैं, लेकिन शहरों, कस्बों और गांवों में उबलता हुआ युवा क्यों दिखाई नहीं दे रहा?

क्योंकि यह बंदूक लेकर नहीं आया है। यह डिग्री लेकर आया है। यह संविधान लेकर आया है। यह अपने वोट का अधिकार लेकर आया है। और सबसे खतरनाक बात—यह सवाल लेकर आया है।

यही वह हाइड्रोजन बम है जिसकी गर्मी अब गांव तक पहुंच चुकी है। इसे किसी सुरक्षा घेरा, किसी भाषण या किसी राजनीतिक नारे से निष्क्रिय नहीं किया जा सकता।

प्रधान जी, डरना स्वाभाविक है। क्योंकि सवाल अब विपक्ष का नहीं रहा। सवाल जनता का है। और जनता की आवाज को जितना दबाया जाएगा, वह उतनी ही दूर तक जाएगी।

हमने क्रिकेट खेली है, फुटबॉल खेली है। खेल का एक नियम समझते हैं—खिलाड़ी बदल देने से कप्तान मजबूत नहीं होता। सवाल यह नहीं कि टीम में कौन आया और कौन गया। सवाल यह है कि कप्तान खेल पढ़ पा रहा है या नहीं?

आज अगर कुछ नेता बेरोजगार हुए हैं तो उससे सरकार मजबूत नहीं हो जाती। अगर कुछ चेहरे बदल दिए जाएं, कुछ मंत्रियों की जिम्मेदारी बदल दी जाए, कुछ प्रवक्ताओं को बदल दिया जाए—तो जनता के सवाल नहीं बदलेंगे।

नौकरी वही है। परीक्षा वही है। महंगाई वही है। युवा वही है। और उसका गुस्सा भी वही है।

हाल के युवा आंदोलनों और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया है; UGC-NET के कुछ विषयों की परीक्षा रद्द होने पर भी सरकार को तीखी आलोचना झेलनी पड़ी।

तो फिर प्रधान जी की नींद क्यों खराब है?

क्योंकि पहली बार सवाल यह नहीं पूछा जा रहा कि "मोदी के सामने कौन?" सवाल पूछा जा रहा है—"मोदी के सामने जनता कब खड़ी होगी?"

यह सवाल किसी पार्टी का नहीं है। यह उस मां का है जिसने बेटे को पढ़ाने के लिए खेत बेचा। उस पिता का है जिसने कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज लिया। उस युवा का है जिसने उम्र की आखिरी सीमा तक सरकारी नौकरी का इंतजार किया। और उस लड़की का है जिसने परीक्षा की तैयारी में अपनी जवानी लगा दी।

इन्हें "दिमागी" कह देने से इनका भविष्य नहीं बनेगा। इनसे संवाद करना पड़ेगा। इनके सवाल सुनने पड़ेंगे। और सबसे जरूरी—इनके सवालों का जवाब देना पड़ेगा।

संसद का रास्ता भूल चुके प्रधान और उनके साथी शायद यह भूल रहे हैं कि संसद भवन से बाहर भी एक बहुत बड़ी संसद है। उसका नाम है—भारत की जनता।

और इस संसद में कोई व्हिप नहीं चलता। यहां कोई पार्टी लाइन नहीं चलती। यहां सिर्फ एक लाइन चलती है—"हिसाब दो।"

प्रधान जी, खिलाड़ी बदलते रहिए। कप्तान बदलिए या मत बदलिए। लेकिन मैदान अब बदल चुका है।

और खबरदार—हाइड्रोजन बम गांव में फट चुका है। अब उसकी गूंज दिल्ली तक पहुंच रही है।