व्यंग्यात्मक संपादकीय | असित भट्टाचार्य
“आलकी पालकी, जय कन्हैया लाल की…” और सामने कैमरा LIVE! तस्वीर देखकर हंसी भी आती है और लोकतंत्र पर तरस भी।
जिस राजनीति को जनता ने सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और सुरक्षा के सवालों के लिए चुना था, वह धीरे-धीरे मंदिर-मंच, धार्मिक नारों और चुनावी कैमरों की राजनीति में बदलती दिखाई देती है। चुनाव अभी आया भी नहीं और लगता है राम को फिर से राजनीतिक पालकी पर बैठाने की तैयारी शुरू हो गई है।
पिछले 14 वर्षों की राजनीतिक कहानी को जरा पीछे मुड़कर देखिए। जनता के सामने विकास की बातें, मंच पर धर्म की बातें और चुनाव आते ही भावनाओं की ऐसी फसल कि मूल सवाल कहीं खेत की मेड़ के नीचे दब जाएं।
जनता पूछती है—राम आस्था हैं या चुनावी रणनीति?
राम करोड़ों लोगों की आस्था हैं। कन्हैया भी आस्था हैं। धर्म जनता के विश्वास का विषय है। लेकिन जब आस्था को वोट की सीढ़ी और धार्मिक प्रतीकों को चुनावी बैसाखी बना दिया जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। क्योंकि लोकतंत्र में नेता को जनता के कंधे पर चढ़कर सत्ता तक पहुंचना चाहिए, जनता को धर्म के कंधे पर चढ़ाकर सत्ता तक नहीं पहुंचना चाहिए।
बैसाखी मजबूत होती गई, कमर भी!
विडंबना देखिए—राजनीति में कुछ लोग जनता के सवालों पर अपने पैरों से चलने के बजाय हमेशा किसी न किसी बैसाखी का सहारा लेते रहे हैं। कभी धर्म की बैसाखी, कभी जाति की बैसाखी, कभी भावनाओं की बैसाखी, कभी डर की बैसाखी… और जनता सोचती रही—नेता चल रहे हैं या बैसाखियां उन्हें चला रही हैं?
व्यंग्य तो यह है कि बैसाखी का सहारा लेते-लेते नेता की कमर का आकार बढ़ता गया, लेकिन जनता की कमर महंगाई के बोझ से झुकती चली गई।
कैमरा LIVE है साहब… जनता भी LIVE है!
अब हर धार्मिक आयोजन के साथ कैमरा है, लाइव प्रसारण है, तस्वीर है, पोस्ट है और राजनीतिक संदेश भी। लेकिन जिस दिन कैमरा गरीब की खाली थाली पर जाएगा, जिस दिन कैमरा बेरोजगार की फाइल पर जाएगा, जिस दिन कैमरा अस्पताल की अव्यवस्था पर जाएगा, जिस दिन कैमरा सरकारी स्कूल की हालत पर जाएगा—उस दिन शायद असली राजनीति दिखाई देगी।
क्योंकि जनता अब सिर्फ यह नहीं पूछती कि कौन राम का नाम ले रहा है? जनता यह भी पूछ रही है—राम के नाम पर वोट मांगने वाला मेरे गांव में सड़क कब देगा? मेरे बच्चे को रोजगार कब मिलेगा? अस्पताल में इलाज कब मिलेगा? महंगाई से राहत कब मिलेगी? और मेरे हिस्से का विकास कब आएगा?
राम को पालकी से उतारिए नहीं… राजनीति को पालकी से उतारिए!
राम को राजनीति से हटाने की बात नहीं है। बात इतनी सी है कि राम को चुनावी पालकी का भार मत बनाइए। धर्म जनता के दिल में रहने दीजिए और राजनीति को जनता के सवालों के बीच रहने दीजिए। क्योंकि जिस दिन मतदाता ने यह तय कर लिया कि नारा नहीं, काम देखेंगे; चेहरा नहीं, हिसाब देखेंगे; धर्म नहीं, शासन का परिणाम देखेंगे, उस दिन बैसाखी के सहारे चलने वाली राजनीति को अपने पैरों पर खड़ा होना ही पड़ेगा।
जमीनी आवाज़ का सवाल सीधा है—चुनाव जीतने के लिए हर बार भगवान की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या नेता के पास अपने काम का इतना भी भरोसा नहीं कि वह जनता से सिर्फ अपने काम के नाम पर वोट मांग सके?
पहले राम… अब राम और श्याम… कल कौन?
चुनाव 2027 की तैयारी शुरू हो चुकी है। पालकी भी तैयार है, कैमरा भी LIVE है… अब देखना यह है कि इस बार जनता पालकी उठाती है या सवाल उठाती है।





