संपादकीय — असित भट्टाचार्य
एक तस्वीर सोशल मीडिया पर घूम रही है। तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टी-शर्ट पहने दिखाई दे रहे हैं और उसके साथ ऐसी टिप्पणियां लिखी गई हैं, जिनमें राजनीतिक असहमति देखते-देखते व्यक्तिगत कटाक्ष और आपत्तिजनक भाषा में बदल जाती है।
सवाल यह नहीं है कि मोदी ने टी-शर्ट क्यों पहनी। सवाल यह है कि आखिर भारतीय राजनीति में विरोध की भाषा इतनी नीचे क्यों उतरती जा रही है?
कभी कपड़े राजनीति का संदेश हुआ करते थे। आज कपड़े ही राजनीति का हथियार बन गए हैं। कोई कुर्ते पर सवाल उठाता है, कोई जैकेट पर, कोई टी-शर्ट पर—और देखते ही देखते मुद्दे गायब, मीम और मजाक सामने! वाह रे लोकतंत्र!
महंगाई पर बहस चाहिए थी—टी-शर्ट आ गई। बेरोजगारी पर सवाल चाहिए था—चेहरा आ गया। स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था पर जवाब चाहिए था—फैशन की चर्चा शुरू हो गई। यानी जनता पूछे "काम कितना हुआ?", राजनीति जवाब दे—"कपड़ा देखो!" और यही हमारी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है।
प्रधानमंत्री से सवाल पूछना लोकतंत्र है। राहुल गांधी से सवाल पूछना भी लोकतंत्र है। किसी नेता की नीतियों की आलोचना करना भी लोकतंत्र है। लेकिन किसी की शक्ल, उम्र या निजी जीवन को निशाना बनाकर उसे राजनीतिक तर्क का विकल्प बना देना—क्या यही राजनीति की नई भाषा है?
अगर किसी नेता का निर्णय गलत है तो उसके निर्णय पर हमला कीजिए। नीति गलत है तो नीति पर सवाल कीजिए। सरकार असफल है तो आंकड़ों के साथ कटघरे में खड़ा कीजिए। लेकिन चेहरा देखकर राजनीति करना आखिर किस लोकतंत्र की निशानी है?
मोदी की टी-शर्ट से लेकर राहुल गांधी की फिटनेस तक...
सोशल मीडिया ने राजनीति को बेहद आसान बना दिया है। एक तस्वीर उठाइए, उस पर चार लाइन लिखिए, दो व्यंग्य जोड़िए, कुछ व्यक्तिगत टिप्पणियां कीजिए, और फिर उसे "राजनीतिक विश्लेषण" घोषित कर दीजिए!
मगर राजनीति मीम नहीं है, और लोकतंत्र सोशल मीडिया की टिप्पणी-पट्टी नहीं। जिस देश में करोड़ों लोग रोजगार, महंगाई, शिक्षा, इलाज और रोजमर्रा की परेशानियों से जूझ रहे हों, वहां नेताओं की टी-शर्ट और शरीर की फिटनेस पर घंटों बहस होना अपने आप में एक राजनीतिक व्यंग्य है। जनता रोटी तलाश रही है और राजनीति कॉलर तलाश रही है!
कटाक्ष हो, लेकिन स्तर भी हो
व्यंग्य लोकतंत्र की ताकत है। व्यंग्य सत्ता को आईना दिखाता है। व्यंग्य अहंकार को चुनौती देता है। व्यंग्य सवाल पूछने का हथियार है। लेकिन व्यंग्य और व्यक्तिगत अपमान के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। उस रेखा के पार जाते ही सत्ता पर सवाल कमजोर और भाषा मजबूत हो जाती है।
और जमीनी आवाज़ का सवाल यही है—क्या हम नेताओं से जवाब मांगने की अपनी ताकत खोकर उनके कपड़ों पर टिप्पणी करने की राजनीति तक पहुंच गए हैं?
मोदी टी-शर्ट पहनें या कुर्ता—यह उनकी पसंद है। राहुल गांधी फिटनेस करें या पैदल चलें—यह उनकी जिंदगी है। जनता को इससे कहीं बड़ा सवाल पूछना चाहिए—देश कैसा चल रहा है?
क्योंकि लोकतंत्र में नेता का पहनावा खबर नहीं होना चाहिए। उसका काम खबर होना चाहिए। और अगर काम पर सवाल उठाना मुश्किल हो गया है, तो शायद टी-शर्ट पर बहस करना सबसे आसान रास्ता है। यही हमारी राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
जमीनी आवाज़ की सीधी बात
नेताओं के कपड़े मत नापिए, उनके काम नापिए। चेहरा मत तौलिये, जवाबदेही तौलिये। फिटनेस मत गिनिए, जनता की मुश्किलें गिनिए।
क्योंकि लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि किसने क्या पहना। असली सवाल है—"जिसे जनता ने पहनाया है सत्ता का ताज, उसने जनता के लिए किया क्या?"





