संपादकीय...
लोकतंत्र के इस नए डिजिटल युग में अब भाषणों से ज़्यादा रीलों का दौर है। पहले नेता जनता के बीच दिखाई देते थे, अब कैमरे के सामने। पहले विकास के काम गिनाए जाते थे, अब व्यूज़ और लाइक्स गिने जाते हैं।
सत्ता जब तक मज़बूत रहती है, तब तक कैमरा अक्सर जनता की ओर नहीं घूमता। लेकिन जैसे ही कुर्सी के चारों पाये चरमराने लगते हैं, अचानक मोबाइल का फ्रंट कैमरा चालू हो जाता है। हर दिन एक नई रील... कभी भावुक संगीत के साथ, कभी देशभक्ति की धुन पर, कभी विरोधियों पर तंज, तो कभी अपनी उपलब्धियों का सिनेमाई ट्रेलर।
ऐसा लगता है कि लोकतंत्र अब चुनाव आयोग नहीं, बल्कि एल्गोरिदम चला रहा है। जनता का विश्वास कमाने से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है—"रीच" बढ़ाना। नीतियों से ज़्यादा फ़िक्र अब "ट्रेंडिंग" की है। सवालों के जवाब कम और बैकग्राउंड म्यूज़िक ज़्यादा सुनाई देता है।
विडंबना देखिए, जिन लोगों ने कभी पत्रकारों के सवालों से दूरी बनाई, वे आज कैमरे के सामने हर कोण से मुस्कुराने का अभ्यास कर रहे हैं। जो आलोचना को "नकारात्मकता" कहते थे, वे अब हर टिप्पणी पर सफ़ाई देने वाली रील बना रहे हैं। लगता है कुर्सी की हलचल ने सोशल मीडिया का सबसे बड़ा कंटेंट क्रिएटर पैदा कर दिया है।
जनता भी कम दिलचस्प नहीं है। सड़क टूटी हो, अस्पताल में डॉक्टर न हों, युवाओं के हाथ खाली हों—इन सब पर बहस कम होती है। लेकिन किस नेता की रील में कौन-सा गाना बजा, किसने किसे ट्रोल किया, किसकी एक्टिंग बेहतर रही—यह राष्ट्रीय चर्चा बन जाती है।
सवाल रील बनाने का नहीं है। रील भी संवाद का एक माध्यम है। सवाल यह है कि क्या रील, हक़ीक़त की जगह ले सकती है? क्या 30 सेकंड का वीडियो पाँच साल के काम का विकल्प बन सकता है? क्या कैमरे की मुस्कान, जनता की परेशानियों को छिपा सकती है?
कुर्सियाँ आती हैं, जाती हैं। ट्रेंड भी बदलते हैं। लेकिन जनता की याददाश्त, जितनी समझी जाती है, उससे कहीं लंबी होती है। वह रील भी देखती है और अपनी ज़िंदगी की रियलिटी भी।
इसलिए याद रखिए—जब कुर्सी हिलती है, तब रीलें बढ़ जाती हैं; लेकिन जब जनता जागती है, तब सिर्फ़ रील नहीं, पूरी पटकथा बदल जाती है।
— संपादकीय, जमीनी आवाज़





