संपादकीय

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। उसकी असली ताकत संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और न्यायपालिका पर जनता के भरोसे से तय होती है। जब किसी नागरिक को दोषी ठहराने से पहले ही वर्षों तक जेल में रहना पड़े, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या न्याय समय पर मिल रहा है?

भारत में गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, यानी UAPA, राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया कानून है। सरकार का कहना है कि आतंकवाद और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से लड़ने के लिए ऐसे सख्त कानून आवश्यक हैं। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि इसकी कठोर ज़मानत व्यवस्था और लंबी न्यायिक प्रक्रिया कई बार ऐसे लोगों को भी वर्षों तक जेल में रख देती है, जिनका दोष अभी अदालत में सिद्ध नहीं हुआ होता।

भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है—"दोष सिद्ध होने तक हर व्यक्ति निर्दोष है।" दूसरा सिद्धांत कहता है—"ज़मानत नियम है, जेल अपवाद।" लेकिन UAPA से जुड़े मामलों में अक्सर यही दोनों सिद्धांत सबसे बड़ी कसौटी पर दिखाई देते हैं।

भीमा कोरेगांव प्रकरण हो या CAA विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले—कई अभियुक्त वर्षों से विचाराधीन कैदी हैं। उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मामलों में अदालतों के सामने यह प्रश्न लगातार बना हुआ है कि यदि मुकदमे में असाधारण देरी हो रही हो, तो किसी नागरिक को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना क्या न्याय के अनुरूप है?

इन बहसों के केंद्र में फादर स्टैन स्वामी का मामला हमेशा याद किया जाएगा। 84 वर्ष की आयु, गंभीर बीमारियाँ और बार-बार मेडिकल आधार पर अंतरिम ज़मानत की अपील। अदालत में उन्होंने कहा था कि जेल में रहते-रहते वे अपनी बुनियादी शारीरिक क्षमता तक खो चुके हैं। कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया। यह घटना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी; इसने न्याय, मानवाधिकार और संवैधानिक मूल्यों पर देशव्यापी बहस को जन्म दिया।

यह संपादकीय किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने का प्रयास नहीं है। यह केवल एक मूल प्रश्न उठाता है—क्या मुकदमे की धीमी रफ्तार किसी नागरिक के लिए स्वयं सज़ा बन जानी चाहिए?

राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता। आतंकवाद और हिंसा के विरुद्ध कानून कठोर होने चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते हुए अपनी आज़ादी, स्वास्थ्य और जीवन न खो दे।

लोकतंत्र की पहचान केवल कठोर कानूनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी संविधान और नागरिक अधिकारों का संतुलन कैसे बनाए रखा जाता है।

"जमीनी आवाज" का मानना है कि लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। और न्याय तभी पूर्ण कहलाएगा, जब वह समय पर, निष्पक्ष और सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो।

— संपादकीय, जमीनी आवाज
"खबरें ज़मीन की, ज़माने की।"