संपादकीय: जमीनी आवाज
"जो जनेऊ पहनता है उसे करंट नहीं लगता, क्योंकि जनेऊ में 33 करोड़ देवता बसते हैं।"
जब किसी साधारण व्यक्ति के मुंह से ऐसी बात निकलती है तो उसे अज्ञान कहकर टाला जा सकता है। लेकिन जब यही बात एक बड़े धार्मिक मंच से, लाखों अनुयायियों वाले एक प्रतिष्ठित आचार्य के मुख से निकलती है, तब यह केवल एक कथन नहीं रह जाता—यह समाज की वैज्ञानिक चेतना पर सीधा आघात बन जाता है।
भारत वह देश है जिसने शून्य दिया, आर्यभट्ट दिया, सी.वी. रमन और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम दिए। उसी देश में यदि धर्म के नाम पर बिजली के नियमों को आस्था से बदलने की कोशिश होगी, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
करंट यह नहीं देखता कि शरीर पर जनेऊ है, ताबीज है, रुद्राक्ष है या कोई और धार्मिक प्रतीक। बिजली केवल चालक और कुचालक का नियम मानती है। विज्ञान किसी की आस्था का अपमान नहीं करता, लेकिन अंधविश्वास को विज्ञान का विकल्प भी नहीं बनने देता।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि ऐसे बयान बच्चों और युवाओं तक क्या संदेश पहुँचाते हैं? क्या हम उन्हें प्रयोगशाला की ओर भेजना चाहते हैं या अंधविश्वास की ओर? क्या हम चाहते हैं कि वे सुरक्षा के वैज्ञानिक नियम सीखें या ऐसे दावे, जिनकी कोई वैज्ञानिक कसौटी नहीं है?
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को विवेक, करुणा और सत्य की ओर ले जाना है। यदि धर्मगुरु ही ऐसे दावे करने लगें जो तर्क और विज्ञान से परे हों, तो नुकसान केवल धर्म का नहीं, पूरे समाज का होता है। श्रद्धा तब तक सुंदर है, जब तक वह विवेक के साथ चलती है; विवेक से अलग होते ही वही श्रद्धा अंधविश्वास बन जाती है।
आज आवश्यकता किसी धर्म का मज़ाक उड़ाने की नहीं, बल्कि उन बयानों का विरोध करने की है जो समाज को भ्रमित करते हैं। धार्मिक नेतृत्व जितना बड़ा होता है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। मंच पर बैठा व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं बोलता, वह लाखों लोगों के विश्वास और सोच को दिशा देता है।
आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन विज्ञान का अपमान नहीं। जनेऊ सम्मान का विषय हो सकता है, बिजली से सुरक्षा का नहीं। करंट तारों में दौड़ता है, अंधविश्वास दिमाग़ में। और समाज के लिए सबसे खतरनाक करंट वही है, जो सोच को झुलसा दे।





