जमीनी आवाज | असित भट्टाचार्य की कलम से


न सोना, न चांदी, न लाखों की मूर्ति—शिवली के फूलों से जमीन पर उतरा मां दुर्गा का पूरा परिवार, यही है जमीनी आस्था

महालया के साथ शारदीय नवरात्रि का संदेश: पूजा की भव्यता से बड़ा है मन का समर्पण, आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार मनाएं त्योहार

जमीन पर बिखरे शिवली के फूल, उनसे उकेरी गईं मां दुर्गा, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और मां के सिंह की आकृतियां। न महंगी मूर्ति, न सोने-चांदी का प्रदर्शन—प्रकृति से मिले फूलों के सहारे आस्था की एक ऐसी तस्वीर, जो बहुत कुछ कह जाती है।

शिवली के फूलों में सजी मां दुर्गा, सादगी में दिखी भक्ति की सुंदरता

शरद ऋतु की सुबह, प्रकृति की गोद से गिरे शिवली के फूल और जमीन पर उकेरा गया मां दुर्गा का पूरा परिवार। मां दुर्गा के साथ गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और उनका सिंह भी इस कलात्मक रचना का हिस्सा हैं।

न लाखों रुपये की मूर्ति, न सोने-चांदी की सजावट और न ही किसी महंगे कारीगर की जरूरत। एक व्यक्ति ने अपने हाथों से प्रकृति में सहज रूप से उपलब्ध फूलों को सजाकर भक्ति की एक अनूठी तस्वीर साकार कर दी।

यह तस्वीर केवल एक कलात्मक प्रयास नहीं है। यह उस भावना की याद दिलाती है, जिसमें प्रकृति के साधारण से उपहार भी श्रद्धा, कल्पना और समर्पण के साथ असाधारण बन जाते हैं।

आज जब दुर्गापूजा के अवसर पर बड़े-बड़े पंडाल, आकर्षक सजावट और भव्य प्रतिमाएं उत्सव का हिस्सा बनती हैं, तब शिवली के फूलों से जमीन पर बनाई गई यह आकृति एक अलग संदेश देती है—आस्था को अभिव्यक्त करने के लिए महंगे साधनों का होना जरूरी नहीं।

कभी-कभी जमीन पर बिखरे कुछ फूल भी वह संदेश दे जाते हैं, जिसे करोड़ों रुपये खर्च करके तैयार की गई सजावट भी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती।

महंगाई के दौर में उन परिवारों के लिए उम्मीद, जिनका बजट नहीं देता बड़े आयोजन की इजाजत

महालया के साथ मां दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा शुरू होती है। घरों में पूजा की तैयारियां होती हैं, बाजारों में रौनक बढ़ती है और लोग अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार त्योहार मनाने की योजना बनाते हैं।

लेकिन इस उत्सव के बीच उन परिवारों की चिंता भी समझना जरूरी है, जो महंगाई, सीमित आमदनी और रोजगार की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।

कई घरों में मां दुर्गा की पूजा करने की इच्छा होती है, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के बाद अतिरिक्त खर्च के लिए पैसे नहीं बचते। ऐसे परिवार कभी-कभी दूसरों के भव्य आयोजन देखकर मन ही मन अपनी परिस्थितियों से तुलना करने लगते हैं।

उन्हें यह समझने की जरूरत है कि श्रद्धा का मूल्य खर्च की रकम से तय नहीं होता।

घर में मां दुर्गा की तस्वीर के सामने एक दीपक जलाकर, कुछ फूल अर्पित करके और परिवार के साथ प्रार्थना करके भी पूरे मन से पूजा की जा सकती है। इसके लिए कर्ज लेना, बच्चों की पढ़ाई के पैसे खर्च करना या दवाइयों और राशन जैसी जरूरी जरूरतों से समझौता करना आवश्यक नहीं है।

त्योहार खुशियां बांटने के लिए हैं, परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ाने के लिए नहीं।

यह संदेश केवल आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है। सामर्थ्य के अनुसार भव्य आयोजन करना अपनी जगह उचित है, लेकिन किसी दूसरे परिवार की सादगी को उसकी कमजोरी समझना ठीक नहीं।

सनातन परंपरा का संदेश: श्रद्धा, प्रकृति और समर्पण

भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में फूलों का विशेष स्थान रहा है। प्रकृति से मिले फूलों को पूजा में अर्पित करना हमारी परिचित परंपरा का हिस्सा है। शिवली के फूलों से मां दुर्गा के पूरे परिवार की आकृतियां बनाना इसी प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय रचनात्मकता का एक सुंदर उदाहरण है।

इस तस्वीर को देखकर मन में एक सहज विचार आता है—यदि प्रकृति में उपलब्ध साधारण फूलों से भी मां के पूरे परिवार की सुंदर आकृति बनाई जा सकती है, तो पूजा के लिए अनिवार्य रूप से महंगे साधनों की जरूरत क्यों महसूस की जाए?

यह किसी की भव्य पूजा का विरोध नहीं है। यह केवल इतना याद दिलाने का प्रयास है कि भक्ति को बाजार की कीमतों से नहीं तौला जाना चाहिए।

सनातन परंपरा की विविधता में सादगी, सेवा, श्रद्धा और समर्पण का भी अपना स्थान है। किसी की पूजा बड़ी है या छोटी, इसका निर्णय केवल उसके खर्च से नहीं किया जा सकता।

शिवली के फूलों से बनी यह रचना हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और उपलब्ध साधनों का रचनात्मक उपयोग करने की प्रेरणा भी देती है।

अपनी परेशानी से आगे बढ़कर दूसरों की चिंता करना भी समाज के प्रति जिम्मेदारी

एक पत्रकार जब समाज की समस्याओं को करीब से देखता है, तो उसे समझ आता है कि हर घर की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। किसी परिवार के लिए त्योहार बड़ी खुशी लेकर आता है, तो किसी के लिए सीमित बजट के बीच खुशियां बचाए रखने की चुनौती बन जाता है।

मैं स्वयं आर्थिक कठिनाइयों के दौर से गुजर रहा हूं। लेकिन इस आलेख का उद्देश्य अपनी परेशानी को सामने रखना नहीं, बल्कि उन परिवारों के बारे में बात करना है, जो इसी तरह की परिस्थितियों में रहते हुए भी अपने घर में त्योहार की रोशनी देखना चाहते हैं।

एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना और जरूरत के समय सम्मानपूर्वक सहायता करना ही समाज को मजबूत बनाता है।

यदि हमारे आसपास कोई परिवार आर्थिक परेशानी के कारण दुर्गापूजा की खुशियों से दूर महसूस कर रहा है, तो हम उसके साथ खुशियां बांट सकते हैं। किसी बच्चे के लिए जरूरी सामान जुटाना, किसी जरूरतमंद परिवार की मदद करना या किसी अकेले व्यक्ति को पूजा में शामिल करना भी त्योहार को सार्थक बना सकता है।

मदद करते समय यह भी याद रखना चाहिए कि किसी की मजबूरी को सार्वजनिक करके उसका स्वाभिमान आहत न हो। सहायता का उद्देश्य सम्मान बचाना होना चाहिए, न कि किसी को छोटा दिखाना।

जमीनी आवाज का सवाल: क्या भक्ति की कीमत भी तय होने लगी है?

महालया और नवरात्रि के इस पावन अवसर पर एक सवाल हम सभी के सामने है—क्या त्योहार की सुंदरता केवल भव्य सजावट, महंगी प्रतिमाओं और बड़े खर्च में है, या उस श्रद्धा में भी है जो एक व्यक्ति को सुबह-सुबह शिवली के फूल चुनकर जमीन पर मां दुर्गा का पूरा परिवार बनाने के लिए प्रेरित करती है?

क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी पूरे सम्मान के साथ अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा करने और खुशियां मनाने का अधिकार नहीं है?

शिवली के फूलों से बनी यह कलाकृति हमें याद दिलाती है कि साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन मन की श्रद्धा और कल्पना सीमित होना जरूरी नहीं।

न सोना चाहिए, न चांदी और न लाखों की मूर्ति—इनके बिना भी मां की आराधना संभव है। एक दीपक, कुछ फूल और सच्चे मन का समर्पण भी पूजा को आत्मीय बना सकता है।

जमीनी आवाज ऐसी ही जमीनी आस्था, सादगी और मानवीय संवेदना को सलाम करता है। हमारा प्रयास उन आवाजों और भावनाओं को सामने लाना है, जो चमक-दमक के बीच कभी-कभी पीछे छूट जाती हैं।

जमीनी आवाज की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं

महालया के पावन अवसर पर तथा शारदीय नवरात्रि और दुर्गापूजा के लिए जमीनी आवाज के सभी पाठकों, दर्शकों और शुभचिंतकों को हार्दिक शुभकामनाएं।

मां दुर्गा सभी परिवारों को सुख, शांति, स्वास्थ्य, साहस और समृद्धि प्रदान करें। जिन घरों में आर्थिक कठिनाइयां हैं, वहां भी उम्मीद की रोशनी बनी रहे। हर परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से त्योहार मना सके और किसी को भी आर्थिक मजबूरी के कारण स्वयं को छोटा महसूस न करना पड़े।

इस नवरात्रि आइए, दिखावे से अधिक श्रद्धा को, फिजूलखर्ची से अधिक समझदारी को और प्रतिस्पर्धा से अधिक आपसी सहयोग को महत्व दें।

क्योंकि मां की आराधना के लिए सबसे जरूरी चीज महंगी सजावट नहीं, बल्कि सच्चे मन का समर्पण है।