कैसे मनाएं दिवाली? लाला, हमारा तो बारहों महीने दिवाला!


धनतेरस पर खरीदने से लक्ष्मी आती हैं तो बेचने वाले के घर क्या जाता है? आस्था, बाजार और आर्थिक असमानता के बीच एक जरूरी सवाल।

कर्ज लेकर खरीदारी करने की मजबूरी क्यों? त्योहार की असली खुशी महंगे सामान में नहीं, हर घर में जलते एक दीये में है।

जमीनी आवाज | विशेष संपादकीय

असित भट्टाचार्य की कलम से

धनतेरस आते ही बाजार सज जाते हैं। सोने-चांदी, गाड़ियों, बर्तनों और महंगे सामान की खरीदारी को शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन कुछ नया खरीदने से घर में मां लक्ष्मी का वास होता है और सुख-समृद्धि आती है।

लेकिन इस मान्यता के बीच एक सवाल उठना भी जरूरी है।

अगर खरीदारी करने वाले के घर मां लक्ष्मी जाती हैं, तो जो दुकानदार सालभर सामान बेचता है, उसके घर कौन जाता है?

जो व्यापारी धनतेरस पर करोड़ों का कारोबार करता है, क्या उसके घर लक्ष्मी नहीं आतीं? जो दुकानदार हर दिन सामान बेचता है, क्या वह हर दिन समृद्ध नहीं होता? और अगर खरीदने वाला ही धनवान बनता है, तो बेचने वाला गरीब क्यों नहीं हो जाता?

बात थोड़ी व्यंग्यात्मक जरूर है, लेकिन सवाल गंभीर है।

हकीकत यह है कि खरीदने वाला और बेचने वाला दोनों अपनी मेहनत, पूंजी और कारोबार से आर्थिक स्थिति बनाते हैं। धनतेरस पर खरीदारी को लक्ष्मी आगमन का एक शुभ प्रतीक माना जा सकता है, लेकिन इसे समृद्धि की गारंटी मानना कहां तक उचित है?

धनतेरस का संदेश क्या केवल खरीदारी है?

धनतेरस का संबंध भगवान धन्वंतरि और आयुर्वेद की परंपरा से भी जुड़ा है। यह पर्व स्वास्थ्य, आरोग्य और मंगलकामना का संदेश देता है। समय के साथ सोना, चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा लोकप्रिय हुई। लेकिन क्या इस परंपरा का अर्थ यह है कि जिसके पास खरीदने के पैसे नहीं हैं, उसके घर लक्ष्मी नहीं आएंगी?

आज महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी है। रसोई का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में त्योहार के नाम पर कर्ज लेकर खरीदारी करना क्या समझदारी है?

एक तरफ बाजार में महंगे सामान की चमक है, दूसरी तरफ ऐसे परिवार हैं जिनके घर में दीपावली पर मिठाई खरीदने तक का बजट नहीं है।

किसी के घर नई गाड़ी आ रही है तो किसी के बच्चे पुराने कपड़ों में ही त्योहार मनाने को मजबूर हैं।

लाला, तुम्हारे लिए धनतेरस साल में एक बार आती है, लेकिन हमारा तो बारहों महीने दिवाला रहता है!

खरीदारी से ज्यादा जरूरी है खुशियां बांटना

हमारा उद्देश्य न धनतेरस की परंपरा पर सवाल उठाना है और न व्यापारियों की मेहनत पर। बाजार चलेगा तो दुकानदार, कारीगर, मजदूर और छोटे कारोबारियों के घर भी खुशियां पहुंचेंगी। कुम्हार के दीये खरीदना भी स्थानीय मेहनत को सम्मान देना है।

लेकिन त्योहार का अर्थ दिखावा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं होना चाहिए।

अगर आपकी जेब अनुमति देती है तो सोना खरीदिए, चांदी खरीदिए, नई गाड़ी खरीदिए। लेकिन अगर आर्थिक स्थिति कमजोर है तो केवल समाज या धार्मिक मान्यता के दबाव में कर्ज लेकर खरीदारी मत कीजिए।

किसी गरीब के घर दीया जला देना, किसी जरूरतमंद बच्चे को मिठाई खिला देना और किसी परिवार की मुस्कान की वजह बनना भी तो समृद्धि का ही एक रूप है।

आखिर में एक सवाल...

अगर धनतेरस पर खरीदने वाले के घर लक्ष्मी आती हैं, तो बेचने वाले के घर क्या जाती हैं? और जो न खरीद सकता है, क्या उसके घर लक्ष्मी के आने का रास्ता बंद हो जाता है?

शायद अब समय है कि हम त्योहार को केवल खरीदारी के चश्मे से देखना बंद करें।

लक्ष्मी का स्वागत अपनी सामर्थ्य के अनुसार कीजिए, लेकिन किसी गरीब के घर की आर्थिक मजबूरी को उसकी किस्मत या आस्था की कमी मत समझिए।

क्योंकि दीपावली का असली अर्थ केवल अपने घर को रोशन करना नहीं, बल्कि किसी दूसरे के घर का अंधेरा भी मिटाना है।

जमीनी आवाज की ओर से धनतेरस, दीपावली और काली पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं।

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