शिबू सोरेन के संघर्ष की अनकही ताकत थीं रूपी सोरेन, हंसुआ लेकर महाजन के सामने खड़ी हो गई थीं ‘दिशोम गुरु’ की जीवनसंगिनी

आंदोलन, जेल और संघर्ष के दौर में संभाला घर-परिवार, जमीन बचाने के लिए महाजन से भी भिड़ गई थीं रूपी सोरेन

रांची के हिल व्यू अस्पताल में निधन, झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज में शोक की लहर

रांची | असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट

झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन के इतिहास में दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम संघर्ष, जंगल-जमीन और महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज के साथ दर्ज है। लेकिन इस संघर्ष की कहानी का एक ऐसा अध्याय भी है, जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है—उनकी पत्नी रूपी सोरेन का।

बुधवार की रात रांची के हिल व्यू अस्पताल में लंबे समय से अस्वस्थ चल रहीं रूपी सोरेन का निधन हो गया। उनके निधन की खबर से सोरेन परिवार, झामुमो कार्यकर्ताओं, समर्थकों और आदिवासी समाज में शोक की लहर है।

रूपी सोरेन केवल शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी नहीं थीं। जिस दौर में शिबू सोरेन आंदोलन, संगठन और संघर्ष के सिलसिले में घर से दूर रहते थे और कई बार जेल भी गए, उस समय परिवार और जमीन से जुड़े मोर्चे की जिम्मेदारी रूपी सोरेन के कंधों पर थी।

जब खेत जोतने पहुंचा महाजन, हंसुआ लेकर सामने खड़ी हो गईं रूपी सोरेन

रूपी सोरेन से जुड़े एक पुराने प्रसंग में उन्होंने बताया था कि जब शिबू सोरेन जेल में थे, उस समय जमीन को लेकर महाजनों का दबाव बना हुआ था।

उनके अनुसार, विष्णु साहू नाम का एक महाजन कुछ लोगों के साथ उनके खेतों को जोतने पहुंचा था। रूपी सोरेन ने इसका विरोध किया। जब महाजन पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने हंसुआ उठा लिया और विरोध में डट गईं।

बताया जाता है कि अपनी ननद के साथ उन्होंने महाजन के खिलाफ मोर्चा लिया और उसे वहां से हटने के लिए मजबूर किया। रूपी सोरेन के अनुसार, उस घटना के बाद महाजन दोबारा उनकी जमीन पर खेत जोतने नहीं आया।

यह प्रसंग सिर्फ एक जमीन विवाद की कहानी नहीं है। इसके पीछे उस दौर के झारखंड की वह सामाजिक तस्वीर भी दिखाई देती है, जब आदिवासी जमीन, महाजनी दबाव और जमीन के अधिकार का सवाल बेहद गंभीर था।

शिबू सोरेन बाहर संघर्ष करते रहे, रूपी सोरेन ने घर के मोर्चे पर संभाली लड़ाई

शिबू सोरेन का संघर्ष सार्वजनिक था। वे जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों के सवाल पर आंदोलन करते रहे, संगठन खड़ा करते रहे और संघर्ष के कारण कई बार जेल भी गए।

लेकिन उस संघर्ष की दूसरी तस्वीर घर के भीतर थी।

जब शिबू सोरेन आंदोलन के कारण घर से दूर होते थे, तब परिवार की जिम्मेदारी रूपी सोरेन संभालती थीं। बच्चों और परिवार की देखभाल से लेकर जमीन-जायदाद से जुड़े विवादों तक, उन्हें कई मोर्चों पर खुद खड़ा होना पड़ा।

यही वजह है कि शिबू सोरेन की संघर्षगाथा को केवल एक व्यक्ति की कहानी मानना अधूरा होगा। उसके पीछे एक ऐसा परिवार भी था, जिसने उस संघर्ष की कीमत अपने तरीके से चुकाई।

‘दिशोम गुरु’ की कहानी में हमेशा याद रहेगा रूपी सोरेन का अध्याय

रूपी सोरेन के निधन के बाद उनके जीवन से जुड़े पुराने प्रसंग फिर चर्चा में हैं। एक तरफ शिबू सोरेन झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की अगली कतार में संघर्ष कर रहे थे, तो दूसरी तरफ रूपी सोरेन घर, परिवार और जमीन के मोर्चे पर मजबूती से खड़ी थीं।

महाजन के सामने हंसुआ लेकर खड़े होने का उनका पुराना प्रसंग उनके साहस और संघर्षशीलता की तस्वीर पेश करता है।

रूपी सोरेन का जाना सिर्फ सोरेन परिवार की निजी क्षति नहीं है। यह उस पीढ़ी की एक महत्वपूर्ण कड़ी का विदा होना भी है, जिसने झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के दौर को बेहद करीब से देखा और जिया।

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की संघर्षगाथा जब भी लिखी जाएगी, उसमें रूपी सोरेन का नाम भी दर्ज रहेगा—एक ऐसी जीवनसंगिनी के रूप में, जिसने संघर्ष के दिनों में घर संभाला और जरूरत पड़ी तो जमीन के सवाल पर खुद मोर्चे पर उतरने का साहस दिखाया।