“मैं पढ़ना सीख रही हूं ताकि अपनी किस्मत खुद लिख सकूं…” जिस स्कूल के गेट पर लिखी थी यह उम्मीद, वहीं बुझ गई 12 वर्षीय कुमकुम की जिंदगी!


मुसाबनी के आवासीय विद्यालय में छात्रा की मौत से इलाज में देरी, स्वास्थ्य निगरानी और वार्डन की भूमिका पर गंभीर सवाल

मेडिकल रिपोर्ट, छात्राओं की कथित शिकायतों और परिजनों के आरोपों के बीच निष्पक्ष जांच की मांग; सौरभ चक्रवर्ती, रामदेव हेंब्रम और मुखिया सुकुरमुनि हेंब्रम ने उठाई कार्रवाई की मांग


जमीनी आवाज | असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट

मुसाबनी (पूर्वी सिंहभूम)।

“मैं पढ़ना सीख रही हूं ताकि अपनी किस्मत खुद लिख सकूं।”

मुसाबनी के सुरदा क्रॉसिंग स्थित पीएम श्री कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय के मुख्य द्वार पर लिखी यह पंक्ति शायद यहां पढ़ने आने वाली हर बच्ची के सपने को बयान करती है। घर से दूर रहकर पढ़ाई करने वाली बच्चियां इसी उम्मीद के साथ विद्यालय आती हैं कि शिक्षा उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करेगी और वे अपने भविष्य की कहानी खुद लिखेंगी।

लेकिन इसी विद्यालय में छठी कक्षा में पढ़ने वाली 12 वर्षीय कुमकुम गोप की मौत ने उस उम्मीद के सामने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब केवल विद्यालय प्रबंधन या शिक्षा विभाग के बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।

कुमकुम की मौत के बाद परिजनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने विद्यालय की स्वास्थ्य व्यवस्था, बीमार छात्रा की देखभाल, समय पर इलाज और विद्यालय प्रबंधन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

परिजनों की ओर से वार्डन संगीता पांडे तथा शिक्षिकाओं नंदिता मैम और शिल्पा मैम की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का पूरा जवाब सामने आना अभी बाकी है।

यही वजह है कि इस पूरे मामले में सबसे जरूरी सवाल किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि आखिर कुमकुम की तबीयत कब बिगड़ी, किसे इसकी जानकारी थी, उसे कब चिकित्सा सुविधा मिली और उसकी स्थिति गंभीर होने के बाद क्या कदम उठाए गए।

कई दिनों से खराब थी तबीयत, फिर भी क्या समय पर मिला इलाज?

परिजनों और छात्राओं से मिली जानकारी के अनुसार कुमकुम कई दिनों से बीमार थी। बताया गया कि उसे बुखार था और उसकी तबीयत लगातार खराब हो रही थी।

छात्राओं से मिली जानकारी में यह भी कहा गया कि कुमकुम कक्षा और विद्यालय के अन्य स्थानों पर पेशाब कर देती थी। यदि यह जानकारी सही है, तो यह उसकी स्वास्थ्य स्थिति में असामान्य बदलाव का संकेत हो सकता था।

ऐसी स्थिति में एक आवासीय विद्यालय में मौजूद जिम्मेदार लोगों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

कुमकुम अपने माता-पिता के साथ घर पर नहीं थी। वह विद्यालय की निगरानी में थी। ऐसे में सवाल उठता है कि उसकी बीमारी की गंभीरता को कब पहचाना गया और क्या उसे समय रहते डॉक्टर के पास ले जाया गया?

परिजनों का आरोप है कि बच्ची की हालत बिगड़ने के बावजूद उसे समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधा नहीं मिली।

लेकिन इस आरोप की सच्चाई जांच के बाद ही सामने आ सकती है।

इसके लिए यह देखना जरूरी होगा कि बीमारी की पहली शिकायत कब हुई, किस शिक्षक या वार्डन को जानकारी दी गई, क्या तापमान या स्वास्थ्य की कोई जांच हुई, अभिभावकों को कब सूचना दी गई और अस्पताल पहुंचाने का निर्णय कब लिया गया।

मेडिकल रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, यूरिया-क्रिएटिनिन को लेकर भी सवाल

परिजनों की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, कुमकुम की चिकित्सा जांच में यूरिन इंफेक्शन की बात सामने आई थी।

मेडिकल रिपोर्ट में यूरिया और क्रिएटिनिन के स्तर को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

हालांकि, इन जांच परिणामों का वास्तविक चिकित्सकीय महत्व और कुमकुम की मौत से उनका संबंध विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय तथा पूरी मेडिकल हिस्ट्री और रिपोर्ट की समीक्षा के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।

इसलिए केवल किसी एक जांच परिणाम के आधार पर मौत का कारण तय करना उचित नहीं होगा।

लेकिन यही मेडिकल रिकॉर्ड अब इस मामले की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर होना चाहिए।

यह पता लगाया जाना जरूरी है कि बच्ची की हालत अस्पताल पहुंचने के समय कैसी थी, डॉक्टरों ने क्या पाया, कौन-कौन सी जांच हुई, क्या उपचार दिया गया और उसकी हालत कितनी गंभीर थी।

परिजनों का कहना है कि यदि बीमारी की शुरुआत में ही बच्ची को गंभीरता से लिया जाता और उचित उपचार मिलता, तो शायद उसे बेहतर चिकित्सा अवसर मिल सकता था।

क्या ऐसा हुआ या नहीं—इसका जवाब मेडिकल रिकॉर्ड ही देगा।

अस्पताल में काटने पड़े बाल, स्वच्छता और स्वास्थ्य निगरानी पर सवाल

कुमकुम की मौत के बाद उसकी व्यक्तिगत स्वच्छता और देखभाल को लेकर भी कई बातें सामने आई हैं।

बताया गया कि उसके सिर में जुओं की काफी समस्या थी और अस्पताल ले जाने के बाद उसके बाल काट दिए गए।

यह बात अपने आप में कुमकुम की बीमारी का कारण साबित नहीं करती। जुओं की मौजूदगी को मौत का कारण मानना भी चिकित्सकीय रूप से उचित नहीं होगा।

लेकिन एक आवासीय विद्यालय में रहने वाली बच्चियों की नियमित स्वच्छता, स्वास्थ्य जांच और व्यक्तिगत देखभाल की व्यवस्था को लेकर सवाल जरूर उठते हैं।

क्या विद्यालय में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता था?

क्या बीमार बच्चियों के लिए अलग निगरानी व्यवस्था थी?

क्या वार्डन और शिक्षिकाओं को छात्राओं की स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई थी?

क्या विद्यालय में प्राथमिक उपचार की पर्याप्त सुविधा थी?

और सबसे महत्वपूर्ण—आपातकालीन स्थिति में बच्ची को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?

इन सभी सवालों की जांच जरूरी है।

वार्डन ने बच्ची को स्वस्थ बताया या बीमारी की जानकारी थी?

मामले में सबसे गंभीर सवालों में से एक विद्यालय की वार्डन संगीता पांडे की भूमिका को लेकर उठ रहा है।

परिजनों की ओर से आरोप लगाया गया है कि वार्डन ने बच्ची को स्वस्थ बताया था। वहीं दूसरी ओर, परिजनों और छात्राओं से मिली जानकारी में कहा गया कि कुमकुम कई दिनों से बीमार थी।

अगर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं तो जांच का रास्ता साफ है।

वार्डन को बच्ची की बीमारी की जानकारी कब मिली?

क्या किसी छात्रा ने बीमारी की शिकायत की थी?

क्या कुमकुम के अभिभावकों को फोन किया गया था?

क्या उसका स्वास्थ्य रजिस्टर में दर्ज हुआ?

क्या डॉक्टर से सलाह ली गई?

क्या अस्पताल ले जाने से पहले या बाद में कोई लिखित रिकॉर्ड तैयार किया गया?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि विद्यालय प्रबंधन ने अपनी जिम्मेदारी किस तरह निभाई।

शिक्षिकाओं की भूमिका पर भी उठे सवाल

परिजनों की ओर से शिक्षिकाओं नंदिता मैम और शिल्पा मैम की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।

दावा किया गया है कि छात्राओं की ओर से विद्यालय में देखभाल और व्यवहार को लेकर शिकायतें भी सामने आती रही थीं।

लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

इसलिए जांच एजेंसी या शिक्षा विभाग को छात्राओं के बयान संवेदनशील तरीके से लेने चाहिए। बच्चों पर किसी तरह का दबाव नहीं होना चाहिए और उनकी पहचान तथा सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।

यदि पहले कोई लिखित शिकायत की गई थी, तो उसका रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा बनना चाहिए।

कुमकुम की मौत के बाद विद्यालय पहुंचे सौरभ चक्रवर्ती

कुमकुम की मौत की सूचना मिलने के बाद सेवक संस्था के संस्थापक एवं समाजसेवी सौरभ चक्रवर्ती विद्यालय पहुंचे।

उन्होंने बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट और उपचार से जुड़े सवालों को लेकर विद्यालय प्रबंधन से जवाब मांगा।

सौरभ चक्रवर्ती ने सवाल उठाया कि यदि बच्ची की तबीयत पहले से खराब थी तो उसे समय रहते बेहतर चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं दी गई?

उन्होंने कहा कि आवासीय विद्यालय में रहने वाली बच्चियां अपने माता-पिता से दूर होती हैं। उनके अभिभावक इस भरोसे के साथ बच्चों को विद्यालय में छोड़ते हैं कि वहां उनकी पढ़ाई के साथ-साथ सुरक्षा और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाएगा।

उनका कहना था कि किसी बच्ची की तबीयत बिगड़ने पर विद्यालय प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी उसे समय पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना है।

सौरभ चक्रवर्ती ने मामले की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदारी तय करने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि विद्यालय की व्यवस्था को लेकर पहले से शिकायतें थीं तो उन शिकायतों पर विभाग ने क्या कार्रवाई की?

प्रखंड प्रमुख रामदेव हेंब्रम भी पहुंचे विद्यालय

मामले की जानकारी मिलने के बाद मुसाबनी प्रखंड प्रमुख रामदेव हेंब्रम भी विद्यालय पहुंचे।

उन्होंने बच्ची की मौत को गंभीर मामला बताते हुए विद्यालय की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रबंधन की भूमिका की जांच की मांग की।

रामदेव हेंब्रम का कहना था कि आवासीय विद्यालय में बच्चियों की जिम्मेदारी केवल उनकी पढ़ाई तक सीमित नहीं है।

बीमारी के समय उनकी देखभाल, स्वच्छता, सुरक्षा और समय पर इलाज उपलब्ध कराना भी विद्यालय की जिम्मेदारी है।

उन्होंने वार्डन की भूमिका की जांच तथा दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की।

वार्डन को निलंबित करने और संबंधित शिक्षिकाओं की भूमिका की भी जांच की मांग उठाई गई।

मुखिया सुकुरमुनि हेंब्रम ने पुराने आरोपों की जांच की मांग की

पंचायत की मुखिया सुकुरमुनि हेंब्रम ने भी विद्यालय की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए।

मुखिया के अनुसार, वार्डन और शिक्षिकाओं के व्यवहार को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं।

उन्होंने सवाल किया कि यदि पहले शिकायतें थीं तो उनकी जांच क्यों नहीं हुई?

क्या संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी?

यदि शिकायतें अधिकारियों तक पहुंची थीं तो क्या कोई कार्रवाई की गई?

उन्होंने मांग की कि पुराने मामलों और शिकायतों की भी जांच की जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जाए।

प्रिंसिपल कार्यालय में हुई तीखी बहस

कुमकुम की मौत के बाद विद्यालय के प्रिंसिपल कार्यालय में बच्ची की बीमारी, उपचार और देखभाल को लेकर तीखी बहस होने की जानकारी सामने आई है।

बताया गया कि सौरभ चक्रवर्ती ने मेडिकल रिपोर्ट दिखाते हुए बच्ची की बीमारी और उपचार को लेकर सवाल पूछे।

प्रखंड प्रमुख रामदेव हेंब्रम और मुखिया सुकुरमुनि हेंब्रम ने भी विद्यालय की व्यवस्था और कथित शिकायतों को लेकर सवाल उठाए।

घटना के दौरान विद्यालय प्रबंधन से जवाब मांगे जाने की बात सामने आई है।

हालांकि, विद्यालय प्रबंधन और संबंधित शिक्षिकाओं का विस्तृत पक्ष भी सामने आना जरूरी है। किसी भी निष्पक्ष रिपोर्ट के लिए आरोप लगाने वाले पक्ष के साथ-साथ आरोपों से जुड़े लोगों का पक्ष जानना भी आवश्यक है।

जिला शिक्षा पदाधिकारी तक पहुंचा मामला

घटना के बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी को मामले की जानकारी दी गई।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, विद्यालय के गेट पर बच्ची के शव के साथ बैठे लोगों ने जिला शिक्षा पदाधिकारी से फोन पर बातचीत की और वार्डन को विद्यालय से हटाने तथा निलंबित करने की मांग की।

सौरभ चक्रवर्ती के अनुसार, बातचीत के दौरान जिला शिक्षा पदाधिकारी ने वार्डन के खिलाफ पहले भी शिकायतें मिलने की बात कही और वार्डन को तत्काल विद्यालय से चले जाने का निर्देश देने तथा निलंबन की कार्रवाई का आश्वासन दिया।

हालांकि, इस संबंध में औपचारिक लिखित आदेश और निलंबन की अंतिम स्थिति की पुष्टि होना अभी आवश्यक है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि विद्यालय से हटने का निर्देश और औपचारिक निलंबन दो अलग-अलग प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं। इसलिए शिक्षा विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

शव के साथ गेट पर बैठे परिजनों और लोगों का विरोध

कुमकुम की मौत के बाद विद्यालय के गेट पर लोगों के जमा होने और शव के साथ विरोध किए जाने की जानकारी सामने आई।

लोगों की मांग थी कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, बच्ची की मौत की वास्तविक वजह सामने आए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

जिला शिक्षा पदाधिकारी से बातचीत और वार्डन को हटाने के निर्देश की जानकारी के बाद शव को गेट से हटाया गया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मामला केवल तत्काल विरोध शांत करने तक सीमित रहेगा या शिक्षा विभाग इसकी विस्तृत जांच कराएगा?

आवासीय विद्यालय में आखिर बच्चों की जिम्मेदारी किसकी?

कुमकुम की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है।

यह उन सभी आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था पर सवाल है जहां बच्चे अपने माता-पिता से दूर रहकर शिक्षा प्राप्त करते हैं।

ऐसे विद्यालयों में केवल कक्षा और किताबों की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।

जरूरी है कि वहां नियमित स्वास्थ्य जांच हो।

बीमार बच्चों की निगरानी हो।

अभिभावकों को समय पर सूचना दी जाए।

प्राथमिक उपचार की सुविधा उपलब्ध हो।

डॉक्टर से तत्काल संपर्क की व्यवस्था हो।

और गंभीर स्थिति में बिना किसी देरी के अस्पताल पहुंचाने की स्पष्ट प्रक्रिया हो।

कुमकुम के मामले में जांच के दौरान इन सभी व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए।

जांच में किन दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी?

इस मामले में निष्पक्ष जांच के लिए विद्यालय और अस्पताल से जुड़े कई रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

कुमकुम का स्वास्थ्य रिकॉर्ड।

विद्यालय का उपस्थिति रजिस्टर।

बीमारी की जानकारी से संबंधित कोई रिकॉर्ड।

अभिभावकों से फोन या संपर्क का विवरण।

डॉक्टर की पर्ची और मेडिकल रिपोर्ट।

अस्पताल में भर्ती और उपचार से संबंधित दस्तावेज।

विद्यालय से अस्पताल ले जाने का समय और विवरण।

यदि विद्यालय में सीसीटीवी कैमरे उपलब्ध हैं तो संबंधित समय की फुटेज।

इन रिकॉर्डों की जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि बीमारी की शुरुआत से लेकर मौत तक घटनाक्रम वास्तव में क्या था।

छात्राओं की शिकायतों की भी हो स्वतंत्र जांच

यदि छात्राओं की ओर से वार्डन या शिक्षिकाओं के व्यवहार को लेकर पहले शिकायतें की गई थीं, तो उन शिकायतों की भी जांच होनी चाहिए।

लेकिन यह जांच बेहद संवेदनशील तरीके से की जानी चाहिए।

बच्चियों को डराकर या दबाव डालकर बयान लेने के बजाय स्वतंत्र वातावरण में उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

यदि शिकायतें सही पाई जाती हैं तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि उन शिकायतों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

जमीनी आवाज के पांच बड़े सवाल

1. कुमकुम की बीमारी की जानकारी विद्यालय प्रबंधन को कब मिली?

2. उसकी बिगड़ती हालत के बावजूद उसे समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधा मिली या नहीं?

3. वार्डन और शिक्षिकाओं के खिलाफ कथित पुरानी शिकायतों पर पहले क्या कार्रवाई हुई?

4. बच्ची की मौत से पहले विद्यालय, अस्पताल और परिवार के बीच क्या-क्या संपर्क हुआ?

5. भविष्य में किसी दूसरी बच्ची के साथ ऐसी स्थिति न हो, इसके लिए शिक्षा विभाग क्या ठोस कदम उठाएगा?

एक बच्ची की मौत, लेकिन सवाल पूरी व्यवस्था से

कुमकुम अब इस दुनिया में नहीं है।

उसके परिवार के लिए यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द है।

लेकिन कुमकुम की मौत के बाद उठे सवालों का जवाब मिलना इसलिए जरूरी है क्योंकि आवासीय विद्यालयों में आज भी हजारों बच्चे अपने परिवार से दूर रहकर पढ़ते हैं।

उनके माता-पिता अपने बच्चों को विद्यालय के भरोसे छोड़ते हैं।

यह भरोसा केवल किताब और परीक्षा तक सीमित नहीं होता।

यह भरोसा बच्चे की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान से जुड़ा होता है।

विद्यालय के गेट पर लिखी पंक्ति—

“मैं पढ़ना सीख रही हूं ताकि अपनी किस्मत खुद लिख सकूं…”

आज उसी विद्यालय के सामने व्यवस्था से पूछ रही है—

क्या बच्चियों को अपनी किस्मत लिखने का मौका देने से पहले उनकी जिंदगी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पूरी की जा रही है?

इस सवाल का जवाब किसी बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।

जमीनी आवाज की मांग है कि कुमकुम की मौत की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो। मेडिकल रिकॉर्ड, विद्यालय के दस्तावेज, कथित शिकायतों और संबंधित लोगों के बयानों की जांच की जाए। सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए और जांच में जिस किसी की भी जिम्मेदारी या लापरवाही सामने आए, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

साथ ही, मुसाबनी सहित सभी आवासीय विद्यालयों में बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच, आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था, अभिभावकों को सूचना देने की प्रणाली और स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था की समीक्षा की जाए।

क्योंकि किसी विद्यालय की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितने बच्चे परीक्षा में पास हुए।

विद्यालय की असली परीक्षा तब होती है, जब कोई बच्चा बीमार पड़ता है।

तब पता चलता है कि उसकी आवाज कौन सुनता है।

उसकी परेशानी को कौन गंभीरता से लेता है।

और जरूरत पड़ने पर उसे कितनी जल्दी मदद मिलती है।

कुमकुम के मामले में अब सबसे जरूरी है—सच्चाई सामने आए, जिम्मेदारी तय हो और किसी दूसरी बच्ची के परिवार को ऐसी पीड़ा से न गुजरना पड़े।

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असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट