जमीनी आवाज | नई दिल्ली
नई दिल्ली। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन की ओर से 31 अक्टूबर को आयोजित ‘जन महाभियोग’ कार्यक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अध्यक्षता की और विपक्षी नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ आरोपों को सामने रखा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल भी है—क्या किसी राजनीतिक दल या गठबंधन की ओर से आयोजित जन महाभियोग से मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है?
इसका जवाब है—नहीं। खड़गे के आवास पर आयोजित कार्यक्रम एक प्रतीकात्मक राजनीतिक आयोजन था। इसका अपना राजनीतिक संदेश हो सकता है, लेकिन इससे मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद स्वतः समाप्त नहीं होता और न ही यह संविधान में निर्धारित पद से हटाने की प्रक्रिया का विकल्प है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिन आधारों और प्रक्रिया के तहत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसका अर्थ है कि पद से हटाने के लिए गंभीर संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
इस प्रक्रिया में संसद की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। संबंधित सदन में निर्धारित नियमों के अनुसार प्रस्ताव लाया जाता है। इसके बाद आरोपों की जांच निर्धारित प्रक्रिया के तहत होती है। संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। केवल राजनीतिक आरोप, विरोध प्रदर्शन, सार्वजनिक प्रस्ताव या किसी आयोजन में पारित प्रतीकात्मक प्रस्ताव से यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती।
INDIA गठबंधन का कहना है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और कथित तौर पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामलों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं, इन आरोपों पर चुनाव आयोग का पक्ष और स्वतंत्र तथ्यात्मक जांच भी महत्वपूर्ण है।
लोकतंत्र में विपक्ष को सवाल उठाने, विरोध करने और सरकार तथा संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने का अधिकार है। लेकिन किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने का निर्णय राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि संविधान में तय प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम से जनता के सामने दो महत्वपूर्ण बातें आती हैं—पहली, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर उठने वाले सवालों का तथ्यात्मक जवाब मिलना चाहिए; दूसरी, संवैधानिक संस्थाओं के संबंध में किसी भी कार्रवाई में संविधान की निर्धारित मर्यादा का पालन अनिवार्य है। लोकतंत्र की मजबूती केवल सवाल उठाने में नहीं, बल्कि उन सवालों का जवाब संवैधानिक व्यवस्था के भीतर सुनिश्चित करने में भी है।
खबरें जमीन की, जमाने की।असित भट्टाचार्य
संस्थापक एवं प्रधान संपादक...जमीनी आवाज