जमीनी आवाज | विशेष खोजपरक रिपोर्ट

घाटशिला | असित भट्टाचार्य

शहर की सड़कें चमकाने में जुटा प्रशासन, कॉमर्स प्लाजा के नीचे सड़ रहा पानी! आखिर किसकी शह पर पनप रहा मच्छरों का खतरा?

एक तरफ दुर्गापूजा की तैयारी, दूसरी तरफ बहुमंजिला व्यावसायिक इमारत के नीचे जमा पानी और जलनिकासी पर गंभीर सवाल; क्या आम नागरिकों के लिए ही हैं स्वच्छता और कानून के नियम?

पंचवटी और मधुकुंज के सामने स्थित पुरानी एलआईसी बिल्डिंग के नाम से चर्चित कॉमर्स प्लाजा की स्थिति पर उठे सवाल—जमीनी आवाज ने किया परिसर का मुआयना, अब संबंधित विभागों की जांच और जवाबदेही जरूरी।

मां दुर्गा के स्वागत में शहर तैयार, लेकिन इस गंदगी पर किसकी नजर?

घाटशिला। मां दुर्गा के आगमन और विसर्जन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बीच इस वर्ष दुर्गापूजा को लेकर तैयारियां तेज हैं। परंपरा के अनुसार, मां दुर्गा का आगमन घोड़े पर और प्रस्थान नौका पर माना जा रहा है। पूजा पंडालों से लेकर सड़कों तक साफ-सफाई और व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारी विभिन्न स्थलों का निरीक्षण कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं की सक्रियता भी दिखाई दे रही है।

सड़कों की सफाई हो रही है, नालियों को साफ किया जा रहा है और त्योहार के दौरान लोगों को परेशानी से बचाने के लिए व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं।

लेकिन इसी साफ-सफाई के बीच एक सवाल घाटशिला के जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांग रहा है—जब सार्वजनिक स्थलों की सफाई पर इतनी निगरानी है, तो शहर के बीच स्थित एक बहुमंजिला व्यावसायिक इमारत के नीचे जमा पानी पर कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती?

क्या स्वच्छता की जिम्मेदारी केवल सड़कों, पूजा पंडालों और आम नागरिकों तक सीमित है? क्या बड़े व्यावसायिक परिसरों की जवाबदेही तय करने की भी जरूरत नहीं है?

कॉमर्स प्लाजा: बाहर से भव्य, नीचे जमा पानी पर सवाल

पंचवटी और मधुकुंज के ठीक सामने स्थित पुरानी एलआईसी बिल्डिंग, जिसे स्थानीय स्तर पर कॉमर्स प्लाजा के नाम से भी जाना जाता है, घाटशिला की प्रमुख व्यावसायिक इमारतों में गिनी जाती है। ऊंची इमारत, विभिन्न संस्थानों के कार्यालय और व्यावसायिक गतिविधियां इसे एक महत्वपूर्ण स्थान बनाती हैं।

लेकिन इस इमारत के निचले हिस्से में जमा पानी की स्थिति अब गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

जमीनी आवाज के संपादक असित भट्टाचार्य ने परिसर का मुआयना किया। निरीक्षण के दौरान निचले हिस्से में पानी जमा दिखाई देने की बात सामने आई। स्थानीय स्तर पर इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर यह पानी कहां से आता है, इसकी निकासी की व्यवस्था क्या है और लंबे समय तक जमा रहने के बावजूद इसे हटाने के लिए नियमित कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती?

जमा पानी में छोटी-बड़ी मछलियां दिखाई देने की बात भी सामने आई है। पहली नजर में यह किसी छोटे स्विमिंग पूल जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन यदि यह पानी वास्तव में ठहरा हुआ और अनुपचारित है, तो इसकी नियमित सफाई तथा जलनिकासी की व्यवस्था की जांच जरूरी है।

सवाल इमारत की ऊंचाई या उसकी भव्यता का नहीं, बल्कि उसके रखरखाव और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेही का है।

क्या यहां मच्छरों के पनपने की आशंका को नजरअंदाज किया जा रहा है?

लंबे समय तक जमा रहने वाला पानी मच्छरों के प्रजनन का ठिकाना बन सकता है। खासकर जब पानी की नियमित निकासी, सफाई और लार्वा नियंत्रण की व्यवस्था न हो, तब डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छरजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।

हालांकि, इस परिसर में मच्छरों के प्रजनन या किसी बीमारी के फैलने की पुष्टि संबंधित स्वास्थ्य विभाग की जांच के बिना नहीं की जा सकती। लेकिन संभावित खतरे को देखते हुए जांच में देरी भी उचित नहीं होगी।

यदि जमा पानी में शौचालयों या अन्य गंदे जलस्रोतों का पानी मिल रहा है, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे पानी के संपर्क में आने से संक्रमण का खतरा पैदा हो सकता है। दुर्गंध, गंदगी और आसपास की स्वच्छता पर भी इसका असर पड़ सकता है।

इसलिए स्वास्थ्य विभाग और नगर निकाय को यह पता लगाना चाहिए कि जमा पानी सामान्य वर्षाजल है, किसी पाइपलाइन से रिसाव का परिणाम है या किसी अन्य स्रोत से आ रहा है।

बीमारी फैलने का इंतजार करना प्रशासनिक सतर्कता नहीं हो सकती। संभावित खतरे की पहचान और समय पर रोकथाम ही जनस्वास्थ्य की जिम्मेदारी है।

जलनिकासी का रास्ता कहां है? जांच के दायरे में आए पूरी व्यवस्था

परिसर के निरीक्षण के दौरान जलनिकासी की व्यवस्था को लेकर सवाल उठे। स्थानीय लोगों की शिकायतों के अनुसार, पानी की निकासी के लिए समुचित रास्ता उपलब्ध नहीं है। इन शिकायतों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।

यदि जांच में यह पाया जाता है कि भवन में जलनिकासी की उचित व्यवस्था नहीं है, तो संबंधित विभाग को यह पता लगाना होगा कि भवन के स्वीकृत नक्शे, निर्माण संबंधी अनुमतियों और लागू स्वच्छता मानकों का पालन किया गया है या नहीं।

इतनी बड़ी इमारत में कई संस्थानों के कार्यालय होने के कारण शौचालय और स्वच्छता की पर्याप्त व्यवस्था भी जरूरी है।

स्थानीय स्तर पर यह शिकायत भी सामने आई है कि इमारत के शौचालय बंद रखे जाते हैं। यदि ऐसा है, तो सवाल उठता है कि यहां काम करने वाले कर्मचारियों, कार्यालयों में आने वाले लोगों और अन्य आगंतुकों के लिए शौचालय की व्यवस्था क्या है?

क्या भवन प्रबंधन के पास पर्याप्त और चालू शौचालय हैं? क्या उनका रखरखाव नियमित रूप से होता है? क्या अपशिष्ट जल के निपटान के लिए उचित व्यवस्था है?

इन सवालों का जवाब केवल भवन प्रबंधन ही नहीं, बल्कि संबंधित निकाय की जांच से भी सामने आना चाहिए।

पहले भी सफाई हुई थी, फिर स्थिति जस की तस कैसे?

स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ वर्ष पहले इस इमारत की स्थिति को लेकर मीडिया में खबरें प्रकाशित हुई थीं, जिसके बाद सफाई कराई गई थी। लेकिन लोगों का दावा है कि समय बीतने के साथ स्थिति फिर पहले जैसी हो गई।

यदि यह शिकायत सही है, तो यह केवल सफाई की समस्या नहीं, बल्कि नियमित निगरानी और जवाबदेही का भी मामला है।

एक बार सफाई करा देना पर्याप्त नहीं है। व्यावसायिक भवनों में जलनिकासी, शौचालय, अपशिष्ट जल प्रबंधन और मच्छर नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं का नियमित रखरखाव होना चाहिए।

सवाल यह भी है कि क्या पहले प्रकाशित खबरों के बाद संबंधित विभाग ने कोई निरीक्षण किया था? यदि किया था, तो उसकी रिपोर्ट क्या थी? क्या भवन प्रबंधन को कोई निर्देश दिया गया था? यदि निर्देश दिए गए थे, तो उनका पालन हुआ या नहीं?

जमीनी आवाज इन सवालों पर संबंधित विभागों से स्पष्ट जवाब चाहता है।

दो दिन पहले विधायक आए, फिर भी समस्या पर सवाल कायम

स्थानीय जानकारी के अनुसार, दो दिन पहले विधायक सोमेश चंद्र सोरेन भी इसी इलाके में आए थे। जिस स्थान पर उनके बैठने की बात बताई गई है, उसके ठीक सामने यह इमारत स्थित है।

यह उल्लेख किसी जनप्रतिनिधि पर सीधे आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि इस सवाल को सामने रखने के लिए है कि शहर की ऐसी समस्याएं जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की नजर में कैसे लाई जाएं और उनके समाधान की जवाबदेही किसकी हो।

किसी जनप्रतिनिधि का किसी स्थान पर आना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उन्हें वहां की हर समस्या की जानकारी थी। लेकिन जब किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े संभावित खतरे की जानकारी सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से कार्रवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है।

अब जरूरत है कि संबंधित विभाग परिसर का निरीक्षण करें, पानी के स्रोत और निकासी की जांच करें तथा आवश्यक सुधार के लिए समयबद्ध निर्देश जारी करें।

कानून क्या कहता है? लापरवाही साबित होने पर कार्रवाई संभव

किसी भवन के परिसर में पानी जमा होने मात्र से हर स्थिति में अपराध साबित नहीं होता। लेकिन यदि जांच में सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा, मच्छरों के प्रजनन की स्थिति, दूषित जल का अनुचित निपटान, स्वच्छता नियमों का उल्लंघन या स्वीकृत भवन मानकों की अनदेखी सामने आती है, तो संबंधित कानूनों और स्थानीय उपविधियों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

1. नगर निकाय की जिम्मेदारी: संबंधित स्थानीय निकाय लागू नगर निकाय कानूनों, स्वच्छता उपविधियों और अपने अधिकार क्षेत्र के अनुसार निरीक्षण कर सकता है। उल्लंघन पाए जाने पर नोटिस, सफाई के निर्देश तथा कानून में उपलब्ध अन्य कार्रवाई की जा सकती है।

2. सार्वजनिक स्वास्थ्य और मच्छर नियंत्रण: यदि परिसर में मच्छरों के प्रजनन या स्वास्थ्य संबंधी खतरे की पुष्टि होती है, तो सक्षम स्वास्थ्य अथवा स्थानीय प्राधिकारी लागू नियमों के तहत रोकथाम और सुधार के निर्देश दे सकते हैं।

3. पर्यावरण और अपशिष्ट जल: यदि दूषित जल का अनुचित निपटान हो रहा है या उससे पर्यावरण प्रदूषण की स्थिति बन रही है, तो मामले के तथ्यों के अनुसार जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के प्रावधानों की प्रासंगिकता की जांच की जा सकती है। इन कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई का आधार संबंधित परिस्थितियों और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।

4. भवन संबंधी नियम: यदि भवन के स्वीकृत नक्शे, जलनिकासी, शौचालय या अन्य अनिवार्य सुविधाओं से जुड़े नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो सक्षम भवन प्राधिकरण लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी विशेष अधिनियम के तहत दंड या जुर्माना तभी निर्धारित किया जा सकता है, जब संबंधित उल्लंघन और उस पर लागू कानूनी प्रावधानों की पुष्टि हो। इसलिए प्रशासन को पहले निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए।

जमीनी आवाज के सीधे सवाल

घाटशिला के संबंधित अधिकारियों, स्वास्थ्य विभाग और भवन प्रबंधन से कुछ सवालों के जवाब अपेक्षित हैं:

कॉमर्स प्लाजा के निचले हिस्से में पानी जमा होने का वास्तविक कारण क्या है?

क्या भवन में जलनिकासी की समुचित व्यवस्था है? यदि है, तो पानी जमा क्यों रहता है?

क्या परिसर में नियमित सफाई और मच्छर नियंत्रण कराया जाता है?

शौचालयों के बंद रहने की शिकायत सही है या नहीं? यदि सही है, तो कर्मचारियों और आगंतुकों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या है?

क्या संबंधित विभाग ने पहले इस परिसर का निरीक्षण किया है? यदि हां, तो क्या कार्रवाई की गई?

क्या भवन के स्वीकृत नक्शे और लागू स्वच्छता मानकों के अनुपालन की जांच की जाएगी?

क्या प्रशासन सार्वजनिक स्वास्थ्य के संभावित खतरे को देखते हुए तत्काल निरीक्षण और आवश्यक सफाई सुनिश्चित करेगा?

इन सवालों का जवाब मिलना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं रहता।

जमीनी आवाज की टिप्पणी: सफाई की जिम्मेदारी सबकी, नियमों से छूट किसी को नहीं

दुर्गापूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिक स्वच्छता का भी अवसर है। प्रशासन सड़कों और नालियों की सफाई करा रहा है, यह स्वागतयोग्य है। लेकिन स्वच्छता का अभियान तभी प्रभावी होगा, जब उसका दायरा हर उस स्थान तक पहुंचे जहां गंदगी या जलजमाव से लोगों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो सकता है।

सवाल किसी की हैसियत का नहीं, जवाबदेही का है। सवाल किसी इमारत की भव्यता का नहीं, उसके रखरखाव का है। और सवाल किसी को पहले से दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाने का है।

यदि एक सामान्य नागरिक से अपने आसपास सफाई रखने की अपेक्षा की जाती है, तो बड़े व्यावसायिक भवनों के प्रबंधन से भी समान रूप से जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा होनी चाहिए।

घाटशिला प्रशासन को चाहिए कि वह कॉमर्स प्लाजा की स्थिति की जांच करे, पानी के स्रोत और निकासी का पता लगाए, शौचालय संबंधी शिकायतों का सत्यापन करे और यदि कोई नियम उल्लंघन सामने आए, तो नियमानुसार कार्रवाई करे।

जमीनी आवाज इस मामले में संबंधित भवन प्रबंधन और प्रशासन का पक्ष भी प्रकाशित करने के लिए तैयार है।

क्योंकि हमारा सवाल साफ है—शहर को स्वच्छ बनाने की जिम्मेदारी जब सबकी है, तो नियमों का पालन भी सबको करना होगा।