स्वच्छ घाटशिला के दावों की खुली पोल! पूर्व विधायक प्रदीप कुमार बालमुचू के बनाए भवन के आसपास शराब की बोतलों और प्लास्टिक के गिलासों का अंबार

सक्रिय संवेदना के बार-बार आवेदन और सफाई व्यवस्था पर लगातार सवाल, बीडीओ की रिपोर्ट की जमीनी हकीकत जांचने की मांग


घाटशिला | जमीनी आवाज | असित भट्टाचार्जी की विशेष रिपोर्ट

घाटशिला को स्वच्छ और सुंदर बनाने के दावे आखिर किस आधार पर किए जा रहे हैं? क्या सरकारी फाइलों में सफाई व्यवस्था दुरुस्त होने की रिपोर्ट दे देना ही प्रशासन की जिम्मेदारी पूरी कर देता है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर घाटशिला की ये तस्वीरें व्यवस्था पर सवाल क्यों खड़े कर रही हैं?

साफ-सफाई और स्वच्छ समाज के उद्देश्य से सक्रिय संवेदना संस्था की ओर से लगातार उपायुक्त को आवेदन देकर क्षेत्र की बदहाल सफाई व्यवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट कराया जाता रहा है। मामले को गंभीरता से लेते हुए उपायुक्त ने प्रखंड विकास पदाधिकारी अनिका शर्मा को आवश्यक जानकारी देने को कहा था। इसके बाद बीडीओ की ओर से उपायुक्त को पत्र लिखकर स्थिति दुरुस्त होने की जानकारी दिए जाने की बात सामने आई है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किस आधार पर सफाई व्यवस्था को दुरुस्त बताया गया?

जमीनी आवाज के पास मौजूद तस्वीरें घाटशिला की सफाई व्यवस्था की एक अलग ही तस्वीर पेश कर रही हैं। पूर्व विधायक प्रदीप कुमार बालमुचू द्वारा बनवाए गए भवन के आसपास शराब की खाली बोतलें, प्लास्टिक के गिलास और कचरे का अंबार दिखाई दे रहा है। भवन के बाहर लगे शिलापट्ट के आसपास भी गंदगी नजर आ रही है। स्थिति इतनी खराब है कि शिलापट्ट के आसपास खुले में पेशाब किए जाने के निशान भी दिखाई देते हैं।

यह केवल गंदगी का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के रखरखाव, सामाजिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

पूर्व विधायक प्रदीप कुमार बालमुचू ने अपने कार्यकाल में जनता की सुविधा और क्षेत्र के विकास के उद्देश्य से भवन का निर्माण कराया था। सार्वजनिक उपयोग के लिए किए गए ऐसे कार्य सराहनीय हैं। लेकिन निर्माण के बाद यदि उस संपत्ति का दुरुपयोग हो रहा है और रखरखाव नहीं हो पा रहा है, तो इसके लिए निर्माण कराने वाले जनप्रतिनिधि को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। सवाल उन लोगों और संबंधित विभागों से है, जिनके जिम्मे सार्वजनिक संपत्तियों की देखरेख होनी चाहिए।

यदि प्रशासन के पास भवन की देखभाल की समुचित व्यवस्था नहीं है, तो क्या किसी सामाजिक संस्था या जिम्मेदार व्यक्ति को इसकी निगरानी की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती? आखिर जनता के पैसे से बनी सार्वजनिक संपत्ति को शराब की बोतलों और गंदगी के हवाले क्यों छोड़ दिया जाए?

उल्लेखनीय है कि जमीनी आवाज इससे पहले भी घाटशिला के कॉमर्स प्लाजा की गंदगी और बदहाल सफाई व्यवस्था को लेकर तीन बार खबर प्रकाशित कर चुका है। इसके बावजूद यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ है, तो यह प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल है।

सक्रिय संवेदना संस्था लगातार आवेदन दे रही है और मीडिया तस्वीरों के माध्यम से समस्याएं सामने रख रहा है। इसके बावजूद कार्रवाई का अभाव क्यों दिखाई दे रहा है? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल आवेदन प्राप्त करने और उसके जवाब में पत्र भेज देने तक सीमित रह गई है?

अब उपायुक्त से सीधे सवाल है कि जब क्षेत्र की सफाई व्यवस्था दुरुस्त होने की रिपोर्ट दी गई, तो क्या संबंधित स्थलों का भौतिक निरीक्षण भी किया गया था? क्या केवल कागजी जानकारी के आधार पर पूरे क्षेत्र की सफाई व्यवस्था को बेहतर मान लिया गया? यदि रिपोर्ट सही है तो फिर तस्वीरों में दिखाई दे रही गंदगी और सार्वजनिक संपत्ति की बदहाली के लिए जिम्मेदार कौन है?

कॉमर्स प्लाजा और अन्य स्थानों पर बार-बार गंदगी की शिकायतें सामने आने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या अब संबंधित अधिकारियों और सफाई व्यवस्था की निगरानी करने वालों की जवाबदेही तय होगी?

घाटशिला में गंदगी की समस्या केवल एक भवन या एक स्थान तक सीमित नहीं है। अलग-अलग इलाकों से ऐसी तस्वीरें सामने आती रही हैं। इसलिए जरूरत केवल कागजी जवाब देने की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का निष्पक्ष भौतिक निरीक्षण कराने की है।

जमीनी आवाज की मांग है कि तस्वीरों में दिखाई दे रही स्थिति की जांच कराई जाए, सार्वजनिक भवन की तत्काल सफाई हो, उसके रखरखाव की स्थायी व्यवस्था बनाई जाए और लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।

स्वच्छता किसी राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि या अधिकारी की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि आम जनता के सम्मान, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन से जुड़ा विषय है। जनता के पैसे से बनी सार्वजनिक संपत्तियों को इस तरह बदहाल छोड़ देना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

अब देखना यह है कि उपायुक्त तस्वीरों में दिखाई दे रही हकीकत को संज्ञान में लेकर जमीनी जांच कराते हैं या फिर स्वच्छ घाटशिला का दावा सरकारी पत्रों और रिपोर्टों तक ही सीमित रह जाएगा।

जमीनी आवाज का सवाल साफ है—जब तस्वीरें खुद गवाही दे रही हैं, तो फिर व्यवस्था को दुरुस्त बताने वाली रिपोर्ट की सच्चाई कौन जांचेगा?