एक तरफ केंद्र में भाजपा की सरकार, दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह का ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान; आखिर लोकतंत्र को खतरा किससे है और उसकी रक्षा की जवाबदेही किसकी है?
SIR, मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता और विपक्ष के सवालों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का नारा है या संविधान से मिला जनता का अधिकार?

जमीनी आवाज | विशेष संपादकीय
लोकतंत्र को बचाने की आवाज उठना अच्छी बात है, लेकिन जब यह आवाज देश की सत्ता के सबसे ताकतवर गलियारों से उठे तो कुछ असहज सवाल भी खड़े होते हैं। सवाल पूछना जरूरी है, क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने की आजादी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
2 नवंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैदराबाद में भाजपा के ‘सेव डेमोक्रेसी, रिमूव एनार्की’ यानी ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत आयोजित पदयात्रा में शामिल हुए। इस अभियान के दौरान उन्होंने कांग्रेस पर चुनावी हार के बाद अराजकता के रास्ते सत्ता हासिल करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाए। साथ ही SIR का समर्थन करते हुए मतदाता सूची से कथित अवैध घुसपैठियों के नाम हटाने की बात कही।
लेकिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच एक सवाल ऐसा है, जिसका जवाब देश की जनता जानना चाहती है।
जब केंद्र में भाजपा की सरकार है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और देश के गृह मंत्री अमित शाह हैं, तो लोकतंत्र बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्या लोकतंत्र की रक्षा केवल विपक्ष की जिम्मेदारी है? क्या सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी केवल विपक्ष को कटघरे में खड़ा करना है? और क्या लोकतंत्र बचाने का अर्थ केवल अपने राजनीतिक विरोधियों को अराजकता का प्रतीक बताना रह गया है?
लोकतंत्र किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। न भाजपा की, न कांग्रेस की और न ही किसी गठबंधन की। यह देश के करोड़ों नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है।
सरकार के पास सत्ता है, प्रशासन है, कानून बनाने की शक्ति है और नीतियों को लागू करने की जिम्मेदारी है। इसलिए सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का विशेषाधिकार ही नहीं, बल्कि नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार भी है।
SIR पर सवाल घुसपैठियों को बचाने का नहीं, मतदाता के अधिकार की सुरक्षा का भी है।
यदि मतदाता सूची में विदेशी नागरिकों के नाम हैं तो उनकी पहचान होनी चाहिए। यदि मृत व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं या दोहरी प्रविष्टियां हैं तो उनका सुधार होना चाहिए। लेकिन इसी प्रक्रिया में यदि किसी वास्तविक भारतीय नागरिक का नाम कट जाता है, किसी गरीब, मजदूर, आदिवासी, बुजुर्ग या विस्थापित व्यक्ति को अपने मतदान के अधिकार के लिए भटकना पड़ता है, तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा?
मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है प्रत्येक पात्र भारतीय नागरिक का नाम सुरक्षित रखना। एक भी पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित नहीं होना चाहिए।
यहां सवाल SIR के विरोध या समर्थन का नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, प्रक्रिया और जवाबदेही का है।
अगर सरकार और चुनावी व्यवस्था के पास सब कुछ सही होने के पर्याप्त प्रमाण हैं तो सवालों का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। विपक्ष के आरोपों को केवल राजनीतिक शोर बताकर खारिज करना भी समाधान नहीं है। उसी तरह विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अराजकता नहीं, जवाबदेही तय करने का संवैधानिक तरीका है।
आज देश के सामने एक और बड़ा प्रश्न है। क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले सवालों का समाधान राजनीतिक रैलियों से होगा या संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता से?
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर जनता का भरोसा बना रहना चाहिए। संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। सरकार को आलोचना सुनने का लोकतांत्रिक साहस दिखाना चाहिए और विपक्ष को भी तथ्यों तथा जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
गृह मंत्री अमित शाह कांग्रेस से सवाल पूछ रहे हैं, कांग्रेस भाजपा से सवाल पूछ रही है, राहुल गांधी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं और भाजपा विपक्ष के आरोपों को चुनौती दे रही है। लेकिन इन राजनीतिक सवाल-जवाब के बीच आम नागरिक का सवाल कहीं पीछे नहीं छूटना चाहिए।
आम नागरिक को न राजनीतिक आरोपों से रोजगार मिलता है, न नारों से महंगाई कम होती है और न ही एक-दूसरे पर दोषारोपण से उसकी समस्याओं का समाधान होता है। उसे चाहिए निष्पक्ष व्यवस्था, सुरक्षित अधिकार, जवाबदेह सरकार और ऐसी संस्थाएं जिन पर वह बिना किसी भय के भरोसा कर सके।
सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र बचाने का प्रमाण पदयात्रा नहीं, बल्कि अपने शासन में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है।
लोकतंत्र की रक्षा केवल तब नहीं होती जब कोई पार्टी विपक्ष में होती है। उसकी असली परीक्षा तब होती है जब वही पार्टी सत्ता में होती है और उसके सामने असहमति, आलोचना तथा विरोध के स्वर उठते हैं।
भारत का संविधान किसी सरकार को लोकतंत्र का मालिक नहीं बनाता। वह सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
इसलिए सवाल अमित शाह से भी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी है, कांग्रेस से भी है और देश के हर राजनीतिक दल से है।
लोकतंत्र बचाना है तो सबसे पहले नागरिकों के अधिकार बचाइए। चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कायम रखिए। संस्थाओं को निष्पक्ष रहने दीजिए। असहमति को दुश्मनी मत समझिए और सवाल पूछने वालों को अराजकता का पर्याय मत बनाइए।
क्योंकि लोकतंत्र किसी एक नेता, किसी एक पार्टी या किसी एक सरकार की जागीर नहीं है।
आखिर में सवाल सिर्फ इतना है—जिस देश की सरकार जनता चुनती है, उस देश में लोकतंत्र बचाने की जिम्मेदारी भी जनता पर ही छोड़ दी जाएगी या सत्ता अपने हिस्से की जवाबदेही भी निभाएगी?
जमीनी आवाज की नजर में लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक न कोई नेता है, न कोई राजनीतिक दल। लोकतंत्र का असली मालिक भारत का नागरिक है और उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा भारतीय संविधान है।
चाय गरम रखिए... सवाल अभी बाकी हैं!