टिकर गांव में खाता संख्या 583 और प्लॉट संख्या 3817 की सार्वजनिक भूमि को लेकर बढ़ा विवाद; फर्जी दस्तावेजों के सहारे अतिक्रमण की आशंका जताई
ग्रामसभा ने 18 अक्टूबर को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर अवैध निर्माण रोकने की मांग की; न्यायालयों के फैसलों का हवाला देकर प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की अपील

जमीनी आवाज | सरायकेला-खरसावां | विशेष रिपोर्ट
सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ अंचल अंतर्गत टिकर गांव में 24.80 एकड़ सार्वजनिक भूमि को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ग्रामीणों ने इस जमीन पर कथित अवैध कब्जे और निर्माण की कोशिश का आरोप लगाते हुए अंचल अधिकारी के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कराई है। ग्रामीणों की मांग है कि सार्वजनिक उपयोग की इस भूमि पर किसी भी तरह का अवैध निर्माण और हस्तक्षेप तत्काल रोका जाए।
खाता-प्लॉट के विवरण के साथ उठाया सार्वजनिक जमीन का सवाल
अंचल अधिकारी, ईचागढ़ को सौंपे गए आवेदन के मुताबिक विवादित भूमि मौजा टिकर, थाना संख्या 45, खाता संख्या 583 और प्लॉट संख्या 3817 में दर्ज है। आवेदन में जमीन की प्रकृति 'पोखर' और कुल रकबा 24.80 एकड़ बताया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह जमीन वर्षों से गांव के सामुदायिक उपयोग में रही है। इसका इस्तेमाल तालाब, गोचर, खेल मैदान, छठ घाट, श्मशान घाट सहित विभिन्न सार्वजनिक और सामुदायिक कार्यों के लिए होता रहा है। ग्रामीणों का दावा है कि यह किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि गांव की सार्वजनिक उपयोग की भूमि है।
फर्जी दस्तावेजों के जरिए कब्जे की कोशिश का आरोप
आवेदन में आरोप लगाया गया है कि कुछ भू-माफिया कथित तौर पर स्वर्गीय लस्सी महतानी के वंशजों के माध्यम से फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर इस सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया तो गांव की सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
सिविल कोर्ट में भी विचाराधीन है भूमि विवाद
ग्रामीणों ने अपने आवेदन में सिविल कोर्ट, सरायकेला में चल रहे मुकदमे का भी उल्लेख किया है। आवेदन के अनुसार, Original (Title) Suit No. 14/2020 में भारत सिंह एवं अन्य बनाम लस्सी महतानी एवं अन्य के बीच भूमि विवाद विचाराधीन है।
ग्रामीणों ने संबंधित मुकदमे की प्रति और शपथपत्र भी अपने आवेदन के साथ संलग्न करने की बात कही है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
इस मामले में ग्रामीणों ने झारखंड हाईकोर्ट के W.P.(C) No. 3116 of 2026 में 29 अप्रैल 2026 को पारित आदेश का हवाला दिया है। आवेदन में उल्लेख किया गया है कि भूमि विवाद के मामलों में संबंधित प्राधिकारी हस्तक्षेप या सीमांकन नहीं करेंगे और विवाद की स्थिति में पक्षकार सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त ग्रामीणों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के PIL No. 1474 of 2019 में 16 सितंबर 2019 को दिए गए निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले 'हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी' (2001) 6 SCC 496 का भी उल्लेख किया है।
ग्रामीणों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में सार्वजनिक उपयोग के तालाबों और जलस्रोतों की भूमि को सुरक्षित रखने तथा अवैध कब्जे हटाकर उन्हें उनकी पूर्व स्थिति में बहाल करने के सिद्धांत पर जोर दिया गया है।
18 अक्टूबर की ग्रामसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ प्रस्ताव
आवेदन में बताया गया है कि 18 अक्टूबर 2026 को आयोजित ग्रामसभा की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें विवादित सार्वजनिक भूमि पर किसी भी तरह के अवैध निर्माण और कार्य को तत्काल रोकने की मांग की गई।
ग्रामीणों का कहना है कि ग्रामसभा की सामूहिक सहमति के बावजूद यदि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण होता है तो इससे गांव के लोगों के पारंपरिक और सामुदायिक अधिकार प्रभावित होंगे।
अंचल प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
ग्रामीणों ने अंचल अधिकारी से पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराने, विवादित सार्वजनिक भूमि पर अवैध निर्माण रोकने और आवश्यक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की है।
आवेदन के साथ सिविल कोर्ट के मुकदमे की प्रति, झारखंड हाईकोर्ट का आदेश, ग्रामसभा की बैठक का प्रस्ताव, पूर्व में दिया गया आवेदन और न्यायालयों के फैसलों की प्रतियां भी संलग्न किए जाने की बात कही गई है।
अब प्रशासन की भूमिका पर टिकी निगाहें
टिकर गांव का यह मामला एक अहम सवाल खड़ा करता है कि सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखी गई जमीन की रक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि ग्रामीणों के दावे और दस्तावेज सही पाए जाते हैं तो सार्वजनिक संपत्ति को अतिक्रमण से बचाने के लिए प्रशासन को नियमानुसार कार्रवाई करनी होगी।
वहीं, जमीन के स्वामित्व को लेकर कानूनी विवाद होने की स्थिति में उसका समाधान सक्षम न्यायालय और संबंधित राजस्व अभिलेखों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
फिलहाल ग्रामीणों ने अपनी शिकायत प्रशासन के समक्ष रख दी है। अब देखना होगा कि ईचागढ़ अंचल प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और 24.80 एकड़ सार्वजनिक भूमि की वास्तविक स्थिति को लेकर जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं।
जमीनी आवाज की नजर इस मामले पर बनी रहेगी। क्योंकि सार्वजनिक संपत्ति का सवाल किसी एक गांव का नहीं, पूरे समाज के अधिकारों का सवाल है।