मंच जब से अर्थदायक हो गए,
तोतले भी गीत गायक हो गए।
राजनीतिक मूल कुछ ऐसे गिरे,
कि जेबकतरे प्रधान नायक हो गए...

जमीनी आवाज | विशेष संपादकीय
असित भट्टाचार्य की कलम से
मंच जब सरकारी हो, आयोजन सरकारी हो, खर्च जनता के खजाने से हो और सामने बैठे लोग भी सरकारी कार्यक्रम के सहभागी हों, तो उस मंच से देश और प्रदेश के विकास की बात होनी चाहिए, जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए और सरकार को अपने कामकाज का हिसाब देना चाहिए। लेकिन जब सरकारी मंच से विपक्ष की राजनीतिक आलोचना शुरू हो जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी आयोजन का उद्देश्य क्या रह गया है?
मध्य प्रदेश के हालिया सरकारी कार्यक्रम की तस्वीरों और भाषण को लेकर यही सवाल चर्चा के केंद्र में है। मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित सत्ता पक्ष के कई बड़े चेहरे मौजूद हैं। लोगों के बैठने के लिए खटिया की व्यवस्था भी दिखाई दे रही है। ग्रामीण परिवेश की इस तस्वीर को अपनी जगह देखा जा सकता है, लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में खटिया की व्यवस्था किसके लिए और किस उद्देश्य से की गई? क्या यह जनता से सहज संवाद का आयोजन था या राजनीतिक संदेश देने का एक और मंच?
खटिया पर बैठी जनता को सरकार से अपने सवालों के जवाब चाहिए। किसान को अपनी फसल का उचित मूल्य चाहिए, नौजवान को रोजगार चाहिए, गरीब को महंगाई से राहत चाहिए और आम नागरिक को सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ चाहिए। उसे इस बात से क्या हासिल होगा कि मंच से विपक्ष की राजनीतिक आलोचना की जाए?
सरकारी मंच पर विपक्ष क्यों?
प्रधानमंत्री का पद केवल किसी राजनीतिक दल का पद नहीं है। वह पूरे देश का संवैधानिक दायित्व है। प्रधानमंत्री जब किसी सरकारी कार्यक्रम में बोलते हैं तो उनसे अपेक्षा रहती है कि वे देश के सभी नागरिकों को संबोधित करेंगे, न कि केवल अपने राजनीतिक समर्थकों को।
विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है। सरकार का काम उन सवालों का जवाब देना है। यही लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था है। यदि विपक्ष की आलोचना का जवाब देना जरूरी है तो उसके लिए संसद है, राजनीतिक मंच हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हैं और खुली बहस के अनेक अवसर हैं। फिर सरकारी आयोजन को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मंच बनाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

राहुल गांधी की चुनौती और बहस का सवाल
इसी बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 2 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दी। उन्होंने किसी भी मंच पर और किसी भी समय बहस के लिए तैयार रहने की बात कही। उनके आरोप और चुनौती अपनी जगह राजनीतिक बहस का विषय हैं, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या देश के दो शीर्ष राजनीतिक नेताओं के बीच नीतियों, अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और देश की चुनौतियों पर खुली बहस की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए?
प्रधानमंत्री के पास देश की सत्ता है, सरकारी तंत्र है, संसद में बहुमत है और देश को संबोधित करने के लिए अनेक मंच हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहेगी कि राजनीतिक आरोपों का जवाब तथ्यों और नीतियों के आधार पर क्यों नहीं दिया जाता?
यहां किसी एक नेता को सही या गलत घोषित करना हमारा उद्देश्य नहीं है। सवाल केवल इतना है कि लोकतंत्र में चुनौती का जवाब तर्क से होना चाहिए, आरोप का जवाब तथ्य से और सवाल का जवाब जवाबदेही से।
प्रधान सेवक की कुर्सी, राजनीतिक दल की चौखट से बड़ी होती है!
प्रधानमंत्री स्वयं को प्रधान सेवक कहते हैं। सेवक की सबसे बड़ी पहचान उसका काम होता है, उसकी भाषा नहीं। जनता के पैसों से आयोजित कार्यक्रम में जनता के मुद्दे प्राथमिकता पाने चाहिए। सरकारी मंच की गरिमा और राजनीतिक मंच की स्वतंत्रता के बीच एक स्पष्ट अंतर रहना जरूरी है।
यदि हर सरकारी आयोजन में विपक्ष की आलोचना ही प्रमुख विषय बन जाए तो विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे सवाल पीछे छूटने का खतरा है। जनता को भाषणों की संख्या नहीं, अपने जीवन में बदलाव चाहिए।
और अंत में वही चार पंक्तियां फिर याद आती हैं, जिनमें आज की राजनीति पर एक तीखा व्यंग्य छिपा है—
मंच जब से अर्थदायक हो गए,
तोतले भी गीत गायक हो गए।
राजनीतिक मूल कुछ ऐसे गिरे,
कि जेबकतरे प्रधान नायक हो गए...
ये व्यंग्य की पंक्तियां हैं, किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक आरोप नहीं। लेकिन इनके पीछे छिपा सवाल राजनीतिक संस्कृति और सार्वजनिक जीवन में गिरते संवाद के स्तर को लेकर है।
जमीनी आवाज का सवाल सत्ता से भी है और विपक्ष से भी—
जनता के मंच पर जनता की बात कब होगी? सरकारी कार्यक्रमों में राजनीतिक भाषणों की जगह विकास का हिसाब कब दिया जाएगा? और देश के सामने उठ रहे बड़े सवालों पर नेताओं के बीच तथ्य आधारित खुली बहस कब होगी?
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल तालियां बजाने के लिए नहीं बैठती। वह अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने का अधिकार भी रखती है।
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