डुमरिया में सड़कों और पुलों के लिए उमड़ा जनआक्रोश, प्रखंड मुख्यालय पहुंची ग्रामीणों की विशाल रैली

पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की बेटी एवं युवा समाजसेवी दुखनी सोरेन के नेतृत्व में ग्रामीणों ने बुलंद की आवाज; बीडीओ-सीओ की अनुपस्थिति पर भड़के लोग, कार्यालय में तालाबंदी की दी चेतावनी।

जमीनी आवाज | डुमरिया | विशेष ग्राउंड रिपोर्ट

असित भट्टाचार्य की कलम से

पूर्वी सिंहभूम जिले के डुमरिया प्रखंड में बदहाल सड़कों और पुल-पुलियों की समस्या अब ग्रामीणों के लिए सिर्फ आवागमन की परेशानी नहीं, बल्कि दैनिक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुकी है। वर्षों से बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे ग्रामीणों का धैर्य आखिरकार जवाब दे गया। सोमवार को बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की बेटी एवं युवा समाजसेवी दुखनी सोरेन के नेतृत्व में रैली निकालकर डुमरिया प्रखंड मुख्यालय पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए सड़कों, पुलों और पुलियों के शीघ्र निर्माण की मांग उठाई। ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी ने स्पष्ट कर दिया कि डुमरिया की बुनियादी समस्याओं को अब नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

डुमरिया प्रखंड के कई गांव आज भी बेहतर सड़क संपर्क और सुरक्षित आवागमन की सुविधा से वंचित हैं। हरेबेड़ा से नरसिंहबहाल को जोड़ने वाली नदी पर पुलिया का निर्माण नहीं होने से ग्रामीणों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहीं जय नदी और शंख नदी पर समुचित पुल की व्यवस्था नहीं होने से आसपास के गांवों के लोगों की परेशानी और बढ़ जाती है।

बरसात के दिनों में नदी, नाले और जलस्रोत ग्रामीणों के रास्ते रोक देते हैं। कई बार गांवों का संपर्क मुख्य सड़क और आसपास की बस्तियों से कट जाता है। इसका सबसे अधिक खामियाजा स्कूली बच्चों, मरीजों, किसानों, मजदूरों और रोजमर्रा के काम से बाहर निकलने वाले ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है, जब किसी मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे समय में पुल और सड़क के अभाव में आवागमन बड़ी चुनौती बन जाता है। ग्रामीणों का सवाल है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी उन्हें सुरक्षित रास्तों और पुलों के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?

प्रदर्शन में पुल-पुलियों के साथ प्रखंड की विभिन्न पंचायतों में जर्जर ग्रामीण सड़कों की मरम्मत और नई सड़कों के निर्माण की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई। ग्रामीणों ने उन स्थानों पर पुल-पुलियों के निर्माण की मांग की, जहां छोटी-बड़ी नदियां और नाले आवागमन में बाधा बनते हैं।

इसके साथ ही सड़क निर्माण के दौरान जिन ग्रामीणों की रैयती जमीन का उपयोग किया गया, उन्हें अब तक उचित मुआवजा नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर उनकी जमीन का इस्तेमाल हुआ, लेकिन मुआवजे के मामले में उन्हें अब भी इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे में सड़क, पुल और मुआवजे के सवालों पर प्रशासन को जवाब देना चाहिए।

प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों की नाराजगी उस समय और बढ़ गई, जब प्रखंड मुख्यालय स्थित बीडीओ और सीओ कार्यालय में संबंधित पदाधिकारी मौजूद नहीं मिले। अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर मुख्यालय पहुंचे ग्रामीणों ने अधिकारियों की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए।

ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जब जनता अपनी समस्याएं लेकर प्रखंड मुख्यालय पहुंचती है, तब जिम्मेदार अधिकारियों का कार्यालय में मौजूद रहना जरूरी है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारियों की इसी तरह अनुपस्थिति और समस्याओं की अनदेखी जारी रही, तो आने वाले समय में बीडीओ-सीओ कार्यालय में तालाबंदी की जाएगी।

इस पूरे प्रदर्शन में युवा समाजसेवी दुखनी सोरेन की भूमिका विशेष रूप से चर्चा में रही। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की बेटी के रूप में उनकी पहचान के साथ-साथ ग्रामीण मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता ने इस आंदोलन को सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया।

डुमरिया जैसे क्षेत्र में सड़क, पुल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर ग्रामीणों के बीच पहुंचना और उनकी मांगों को प्रखंड मुख्यालय तक ले जाना महत्वपूर्ण पहल है। इस प्रदर्शन के जरिए दुखनी सोरेन ने ग्रामीणों की समस्याओं को सार्वजनिक मंच पर उठाया।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ग्रामीणों ने प्रदर्शन क्यों किया, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि उनकी आवाज जिम्मेदार अधिकारियों और सरकार तक कितनी गंभीरता से पहुंचती है?

डुमरिया के ग्रामीण कोई असाधारण सुविधा नहीं मांग रहे। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके गांव तक सड़क पहुंचे, नदियों पर पुल बने, बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी न हो और किसी मरीज की जिंदगी रास्ते के अभाव में संकट में न पड़े।

विकास की असली तस्वीर बड़े-बड़े दावों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि गांवों तक पहुंचने वाली सड़कों और लोगों को जोड़ने वाले पुलों से तय होती है।

डुमरिया की जनता की यह आवाज अब प्रशासन के सामने सीधा सवाल है—क्या ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बार-बार प्रखंड मुख्यालय में प्रदर्शन और तालाबंदी की चेतावनी देनी पड़ेगी, या उनकी समस्याओं का समाधान जमीन पर भी दिखाई देगा?

जमीनी आवाज — खबरें जमीन की, जमाने की।