मोदी नहीं, मोदी का बाप जाएगा! ए बाबू, हुआर बाप टा के... परबतिया!

जमीनी आवाज | विशेष व्यंग्यात्मक संपादकीय

पटना में राजनीतिक मंच से निकले कटाक्ष की गूंज अब सोशल मीडिया के रास्ते सुदूर पहाड़ी गांवों तक पहुंच गई है। परबतिया का मासूम सवाल नेताओं की भाषा, राजनीतिक संस्कार और लोकतंत्र की गिरती मर्यादा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

जिस राजनीतिक कटाक्ष की भाषा कभी सत्ता के समर्थकों की ओर से विपक्ष के लिए इस्तेमाल होती थी, उसी तरह की भाषा की गूंज अब विपक्ष और आम जनता के बीच भी सुनाई दे रही है। आखिर राजनीति में मुद्दों की जगह व्यक्तिगत तंज ने क्यों ले ली?

पहाड़ की पगडंडी पर मिला लोकतंत्र का सबसे सीधा सवाल!

सुदूर पहाड़ी गांव से असित भट्टाचार्य की कलम से

पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव। चारों तरफ हरियाली, कहीं ऊबड़-खाबड़ रास्ते, कहीं पत्थरों के बीच से गुजरती पगडंडियां और उन्हीं पगडंडियों पर संघर्ष करते लोगों की जिंदगी। शहरों की चकाचौंध से दूर इस गांव में भी जीवन की अपनी परेशानियां हैं। रोजी-रोटी की चिंता है, बच्चों के भविष्य की फिक्र है और हर दिन को किसी तरह पार लगा लेने की जद्दोजहद है।

इसी पहाड़ी गांव में जमीनी आवाज के संपादक की मुलाकात हो गई परबतिया से।

एक गरीब आदिवासी महिला। कुछ पढ़ी-लिखी, लेकिन इतनी समझदार कि उसके मन में उठने वाले सवालों को अनसुना नहीं किया जा सकता। साथ में उसके दो छोटे-छोटे बच्चे। चेहरे पर जिंदगी की थकान, आंखों में जिज्ञासा और जुबान पर ऐसा सवाल, जिसने देश की राजनीति को पहाड़ की पगडंडी पर लाकर खड़ा कर दिया।

वह मेरे पास आई और बड़ी मासूमियत से पूछ बैठी—

"बाबू, ई मोदी का बाप कौन है?"

मैंने उसकी ओर देखा। सवाल अचानक था, लेकिन उसके पीछे की कहानी आज की राजनीति का एक पूरा आईना थी।

मैंने पूछा, "परबतिया, तुम अचानक यह सब क्यों पूछ रही हो?"

वह बोली, "बाबू, सोशल मीडिया पर देख रही हूं। कोई कह रहा है मोदी नहीं, मोदी का बाप जाएगा। कोई किसी को मोदी का बाप बता रहा है। तरह-तरह के बड़े-बड़े लोगों की तस्वीर लगी है। हम तो समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर ई सब हो क्या रहा है!"

उसकी जिज्ञासा अभी खत्म नहीं हुई थी।

उसने आगे पूछा, "बाबू, ई जो तस्वीर में लोग हैं, क्या ई सब मोदी के बाप हैं?"

अब मेरे सामने सिर्फ एक ग्रामीण महिला का सवाल नहीं था। मेरे सामने भारतीय राजनीति की वह तस्वीर थी, जिसमें नेताओं की जुबान से निकले शब्द मोबाइल स्क्रीन के रास्ते गांव-गांव पहुंच रहे थे।

परबतिया को नाम नहीं मालूम, लेकिन राजनीति का तमाशा दिखने लगा है!

परबतिया ने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी तस्वीरें देखी थीं, जिनके साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और संयुक्त अरब अमीरात के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम जैसे नेताओं के नाम और तस्वीरें जोड़कर राजनीतिक व्यंग्य किया जा रहा था।

इन तस्वीरों को देखकर उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक था।

उसने शायद दुनिया की राजनीति का पूरा हिसाब नहीं पढ़ा था। उसे यह भी नहीं मालूम था कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अपनी जटिलताएं होती हैं। लेकिन उसने सोशल मीडिया पर एक अजीब नजारा जरूर देख लिया था—बड़े-बड़े देशों के बड़े-बड़े नेताओं को भारतीय राजनीति के एक व्यक्तिगत कटाक्ष से जोड़कर पेश किया जा रहा था।

मैंने उससे पूछा, "तुम्हें नरेंद्र मोदी के पिता का नाम नहीं मालूम?"

वह बोली, "बाबू, कभी जरूरत ही नहीं पड़ी! हमको तो अपना घर-परिवार चलाना है। बच्चों को देखना है। खाने-पीने का इंतजाम करना है। मोदी के बाप का नाम जानकर हमको क्या मिलेगा? लेकिन आज सोशल मीडिया पर ई सब देखकर आश्चर्य हो रहा है कि बड़े-बड़े लोग एक-दूसरे के बाप क्यों बन रहे हैं!"

परबतिया की बात सुनकर हंसी भी आ सकती है। लेकिन ठहरिए!

इस हंसी के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है।

जिस देश में करोड़ों लोग अपने बच्चों की पढ़ाई, रोजगार, महंगाई, इलाज, सड़क, पानी और रोजी-रोटी की चिंता में दिन-रात लगे हैं, उस देश की राजनीति अगर व्यक्तिगत कटाक्षों के सहारे सुर्खियां बटोरने लगे, तो सवाल पूछना जरूरी है।

परबतिया को मोदी के पिता का नाम जानने की जरूरत नहीं थी। लेकिन सोशल मीडिया ने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि देश के बड़े-बड़े नेता आखिर एक-दूसरे को क्या साबित करने में लगे हैं!

पटना से पहाड़ तक: बदल रही है राजनीतिक भाषा की यात्रा!

पटना में विपक्ष के एक अध्यक्ष के कथन के रूप में सामने आई इस राजनीतिक टिप्पणी की गूंज सोशल मीडिया के माध्यम से दूर-दराज के गांवों तक पहुंच गई। उस बयान के पूरे संदर्भ और शब्दों की स्वतंत्र पुष्टि किए बिना उसके बारे में कोई अतिरिक्त दावा करना उचित नहीं होगा। लेकिन उसके नाम पर चल रही प्रतिक्रियाओं और व्यंग्यात्मक तस्वीरों ने एक नई बहस जरूर खड़ी कर दी है।

राजनीति में कटाक्ष कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में व्यंग्य का अपना महत्व है। सत्ता से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है और जनता को सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा हक है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक आलोचना का स्तर अब इस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां नीतियों की चर्चा पीछे छूट रही है और व्यक्तिगत तंज आगे निकल रहे हैं?

कभी सत्ता पक्ष के समर्थक विपक्षी नेताओं पर कटाक्ष करते हैं। कभी विपक्ष सत्ता पक्ष पर व्यंग्य के तीर चलाता है। कभी किसी नेता के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। फिर उन्हीं मीम्स पर हजारों टिप्पणियां होती हैं, वीडियो बनते हैं और राजनीतिक समर्थक अपनी-अपनी पसंद के अनुसार उनका इस्तेमाल करने लगते हैं।

इस पूरे खेल में एक बात धीरे-धीरे साफ दिखाई देती है—राजनीतिक संवाद अब केवल संसद, विधानसभा या चुनावी सभाओं तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन ने उसे हर घर तक पहुंचा दिया है।

अब पहाड़ों के बीच रहने वाली परबतिया भी राजनीतिक कटाक्ष देख रही है। वह भी सवाल पूछ रही है। उसे भी यह जानने की उत्सुकता है कि आखिर देश की राजनीति में चल क्या रहा है।

यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

परबतिया को किसी पार्टी की विचारधारा का विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं है। वह किसी राजनीतिक दल की प्रवक्ता भी नहीं है। लेकिन जब नेताओं के बयान उसकी जिज्ञासा का विषय बन जाते हैं, तो यह बताता है कि राजनीतिक भाषा का असर समाज के उन हिस्सों तक भी पहुंच रहा है, जिन्हें अक्सर चुनाव के समय याद किया जाता है।

कभी भाषा पर ताली, अब उसी भाषा पर सवाल!

राजनीति का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि भाषा का मूल्यांकन अक्सर वक्ता और श्रोता की राजनीतिक पसंद के हिसाब से होने लगता है।

जब अपने पक्ष का नेता तीखा कटाक्ष करता है, तो समर्थकों को उसमें साहस दिखाई देता है। जब विरोधी पक्ष का नेता वैसा ही कटाक्ष करता है, तो वही समर्थक उसे राजनीतिक मर्यादा के विरुद्ध बताने लगते हैं।

यह प्रवृत्ति किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों के समर्थकों को अपने-अपने खेमे की भाषा पर आत्ममंथन करने की जरूरत है।

अगर व्यक्तिगत टिप्पणी गलत है, तो वह अपने पक्ष के नेता की जुबान से निकलने पर भी गलत होनी चाहिए। अगर व्यंग्य लोकतंत्र का हिस्सा है, तो उसे सत्ता से सवाल पूछने का माध्यम भी होना चाहिए और विपक्ष की जवाबदेही तय करने का औजार भी।

लोकतंत्र में किसी नेता की आलोचना उसके काम, फैसलों, नीतियों और सार्वजनिक बयानों के आधार पर होनी चाहिए। उसके परिवार को राजनीतिक हथियार बनाना किसी भी पक्ष की उपलब्धि नहीं हो सकती।

लेकिन राजनीति में जब एक पक्ष की भाषा दूसरे पक्ष के लिए उदाहरण बन जाती है, तो यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा?

आज एक कटाक्ष पर तालियां बजेंगी। कल उसका जवाब और तीखे कटाक्ष से दिया जाएगा। फिर तीसरा पक्ष उससे भी आगे निकलने की कोशिश करेगा। देखते-देखते बहस इस बात पर होने लगेगी कि किसने किसको क्या कहा, न कि इस बात पर कि किसने जनता के लिए क्या किया।

और इसी बीच जनता के असली सवाल पीछे छूट जाएंगे।

परबतिया का घर छोटा है, लेकिन उसका सवाल बहुत बड़ा!

जरा परबतिया की जिंदगी के बारे में सोचिए।

उसके साथ दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। उसे उनके भविष्य की चिंता है। पहाड़ों के बीच बसे गांव में रहने वाले परिवार की अपनी जरूरतें हैं। उसे यह देखना है कि बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी, घर का खर्च कैसे निकलेगा और आने वाले दिनों में जिंदगी कुछ बेहतर कैसे होगी।

ऐसे में अगर वह सोशल मीडिया पर देश के बड़े नेताओं की तस्वीरें देखकर पूछती है कि ये सब किसके पिता हैं, तो उसके सवाल को केवल मजाक समझकर टाला नहीं जा सकता।

उसकी जिज्ञासा यह भी दिखाती है कि आज सूचना का प्रवाह कितना व्यापक हो गया है। इंटरनेट और मोबाइल ने दूरियों को कम किया है। अब किसी शहर में कही गई बात कुछ ही समय में गांव की चौपाल तक पहुंच सकती है।

लेकिन सूचना के साथ समझ भी पहुंचे, यह जरूरी है।

परबतिया को सोशल मीडिया पर दिख रही तस्वीरों के पीछे की पूरी राजनीतिक कहानी शायद मालूम न हो। इसलिए पत्रकार का काम केवल उसकी बात सुनकर हंस देना नहीं है। उसका काम संदर्भ समझना, तथ्य जांचना और पाठकों के सामने यह स्पष्ट करना भी है कि राजनीतिक कटाक्ष और वास्तविक घटनाओं में अंतर क्या है।

यही पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।

और यही वह अंतर है, जो वायरल पोस्ट और जिम्मेदार पत्रकारिता के बीच होना चाहिए।

सवाल मोदी के पिता का नहीं, राजनीति के स्तर का है!

अब लौटते हैं उस सवाल पर, जिसने इस पूरे व्यंग्य को जन्म दिया।

"मोदी का बाप कौन है?"

राजनीतिक कटाक्ष में यह सवाल भले ही किसी नेता को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया हो, लेकिन परबतिया की जिज्ञासा ने इसे एक अलग संदर्भ दे दिया।

उसके लिए यह किसी राजनीतिक मुकाबले का नारा नहीं था। वह सचमुच जानना चाहती थी कि तस्वीरों में दिख रहे लोग कौन हैं और उन्हें इस तरह क्यों पेश किया जा रहा है।

यहीं व्यंग्य का असली अर्थ खुलता है।

सवाल यह नहीं कि नरेंद्र मोदी के पिता कौन हैं। सवाल यह है कि देश की राजनीति में सार्वजनिक बहस का स्तर किस दिशा में जा रहा है।

देश के प्रधानमंत्री हों, विपक्ष के नेता हों, मुख्यमंत्री हों या किसी राजनीतिक दल के अध्यक्ष—सभी को यह याद रखना चाहिए कि उनकी कही गई बात केवल मंच पर मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहती।

वह बात समाचार बनती है। सोशल मीडिया पर फैलती है। समर्थकों के हाथों में राजनीतिक हथियार बनती है। विरोधियों के लिए जवाबी कटाक्ष का अवसर बनती है और आखिरकार किसी गांव की पगडंडी पर परबतिया जैसे सामान्य नागरिक के सवाल में बदल जाती है।

नेता सोचते हैं कि उनका बयान उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को चोट पहुंचाएगा। लेकिन कभी-कभी वही बयान राजनीतिक बहस की दिशा बदल देता है।

और तब नेता के शब्दों का अर्थ केवल वही नहीं रह जाता, जो उन्होंने कहना चाहा था। समाज उन्हें अपने अनुभव और समझ के आधार पर भी पढ़ता है।

जनता अब केवल सुनती नहीं, सवाल भी पूछती है!

एक समय था, जब राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा शहरों, अखबारों, सभाओं और राजनीतिक बैठकों तक सीमित रहता था। आज मोबाइल फोन ने इस व्यवस्था को बदल दिया है।

गांव का नौजवान वीडियो देखता है। किसान राजनीतिक बयान सुनता है। मजदूर काम के बाद सोशल मीडिया पर बहस पढ़ता है। महिलाएं भी मोबाइल के माध्यम से देश-दुनिया की घटनाओं से जुड़ रही हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति हर बयान का सही संदर्भ समझता है या हर वायरल पोस्ट सच होती है। सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी, अधूरी तस्वीरें और संदर्भ से काटे गए बयान भी फैलते हैं।

लेकिन इतना जरूर है कि जनता अब राजनीतिक घटनाओं से पहले की तुलना में कहीं अधिक सीधे जुड़ रही है।

परबतिया भी उसी बदलाव की एक छोटी-सी तस्वीर है।

वह किसी राजनीतिक दल के कार्यालय में नहीं बैठी। उसने किसी प्रवक्ता से सवाल नहीं पूछा। उसने किसी टीवी स्टूडियो में बहस नहीं की।

उसने पहाड़ के बीच अपनी साधारण जिंदगी से निकलकर संपादक से एक सवाल पूछा।

उस सवाल में न कोई राजनीतिक रणनीति थी, न किसी पार्टी का एजेंडा। उसमें सिर्फ जिज्ञासा थी।

और कभी-कभी एक साधारण नागरिक की जिज्ञासा ही सत्ता और विपक्ष, दोनों को आईना दिखाने के लिए काफी होती है।

लोकतंत्र में गाली नहीं, जवाबदेही की भाषा मजबूत होनी चाहिए!

राजनीतिक व्यंग्य का विरोध करना इस संपादकीय का उद्देश्य नहीं है। व्यंग्य लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विधा है। वह सत्ता के अहंकार को चुनौती दे सकता है, राजनीतिक पाखंड को उजागर कर सकता है और समाज को सोचने पर मजबूर कर सकता है।

लेकिन व्यंग्य और व्यक्तिगत अपमान के बीच एक अंतर होता है।

व्यंग्य तब सार्थक होता है, जब वह किसी नीति, फैसले, दावे, विरोधाभास या सार्वजनिक आचरण पर चोट करता है। व्यक्तिगत कटाक्ष जब मूल मुद्दे को ढकने लगे, तब व्यंग्य की धार भी कमजोर पड़ने लगती है।

देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार ने रोजगार के लिए क्या किया। महंगाई पर उसकी नीति क्या है। किसानों की समस्याओं का समाधान कैसे होगा। गरीब परिवारों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे मिलेंगी। गांवों में सड़क, पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति क्या है।

इसी तरह विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए कि वह केवल सरकार की आलोचना कर रहा है या जनता के सामने ठोस विकल्प भी रख रहा है।

विपक्ष का काम सवाल पूछना है, लेकिन उसे भी अपनी भाषा, तर्क और राजनीतिक आचरण की जिम्मेदारी उठानी होगी।

सत्ता की जवाबदेही जरूरी है। विपक्ष की जिम्मेदारी भी जरूरी है। और इन दोनों के बीच जनता का विवेक सबसे जरूरी है।

परबतिया के लिए राजनीति का मतलब क्या है?

कल्पना कीजिए, अगर परबतिया से फिर मुलाकात हो और वह पूछे—

"बाबू, ई सब नेता एक-दूसरे को कुछ भी बोलते रहते हैं। हमको बताइए, इससे हम गरीब लोगों का क्या भला होगा?"

तो इस सवाल का जवाब किसी एक राजनीतिक दल के पास नहीं है।

उसे जवाब उन कामों में मिलेगा, जो उसके जीवन को बेहतर बनाते हैं। उसे जवाब उस स्कूल में मिलेगा, जहां उसके बच्चे अच्छी शिक्षा पा सकें। उसे जवाब उस स्वास्थ्य केंद्र में मिलेगा, जहां जरूरत पड़ने पर इलाज उपलब्ध हो। उसे जवाब उन योजनाओं में मिलेगा, जिनका लाभ वास्तव में जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचे। उसे जवाब उस रोजगार में मिलेगा, जिससे उसका परिवार सम्मान के साथ जीवन जी सके।

नेताओं की राजनीतिक लड़ाई चलती रहेगी। बयान आते रहेंगे। उनके जवाब में नए बयान भी आते रहेंगे।

लेकिन परबतिया का जीवन किसी राजनीतिक बयान के इंतजार में नहीं रुक सकता।

उसके बच्चों को आज पढ़ना है। परिवार को आज भोजन चाहिए। जिंदगी की मुश्किलों का सामना उसे आज करना है।

इसलिए राजनीति का असली मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि जनता के जीवन में क्या बदला।

आखिरी सवाल: पहाड़ तक पहुंची आवाज, क्या पहाड़ की आवाज सत्ता तक पहुंचेगी?

परबतिया का सवाल सुनकर एक बात साफ हो जाती है कि राजनीतिक संवाद का दायरा कितना बढ़ चुका है। पटना में कही गई बात सोशल मीडिया के माध्यम से सुदूर गांव तक पहुंच सकती है। लेकिन क्या उसी गांव की समस्याएं सत्ता के गलियारों तक पहुंचती हैं?

क्या पहाड़ी गांवों में रहने वाली महिलाओं की परेशानियां भी उतनी ही तेजी से सुर्खियां बनती हैं?

क्या गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं पर भी उतनी ही बहस होती है, जितनी नेताओं के एक-दूसरे पर किए गए कटाक्षों पर होती है?

यही वे सवाल हैं, जिन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि नेता जनता तक पहुंच रहे हैं। उसकी सफलता इस बात में भी है कि जनता की आवाज नेताओं तक पहुंच रही है या नहीं।

परबतिया ने मोदी के पिता का नाम पूछा था। लेकिन उसके सवाल ने राजनीति की पूरी भाषा पर बहस का रास्ता खोल दिया।

उसकी जिज्ञासा को किसी एक पार्टी के पक्ष या विपक्ष में फैसला मान लेना भी गलत होगा। उसने किसी सरकार को प्रमाणपत्र नहीं दिया और न किसी विपक्षी नेता को विजेता घोषित किया।

उसने सिर्फ एक सवाल पूछा।

और उस सवाल में आज की राजनीति का एक बड़ा विरोधाभास छिपा था।

नेताओं की जुबान से निकला कटाक्ष पहाड़ की पगडंडी तक पहुंच गया। अब देखना यह है कि पहाड़ पर रहने वाली परबतिया की असली समस्याओं की आवाज सत्ता और विपक्ष के दरवाजे तक कब पहुंचती है।

क्योंकि लोकतंत्र में जनता को नेताओं के पारिवारिक रिश्तों की पहेली सुलझाने से ज्यादा जरूरत अपने भविष्य का रास्ता खोजने की है।

मोदी के पिता कौन हैं, यह परबतिया के जीवन का सबसे बड़ा सवाल नहीं है।

उसके लिए सबसे बड़ा सवाल है—उसके बच्चों का भविष्य कौन संवारेगा?

और यही सवाल किसी भी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।

जमीनी आवाज की कलम से—राजनीति में कटाक्ष चलता रहे, लेकिन जनता के मुद्दे कटघरे से बाहर नहीं होने चाहिए।