सरायकेला | विजय कुमार गोपक की रिपोर्ट
बांदना और सोहराय की तैयारियों से गुलजार हुए ग्रामीण बाजार, कुकड़ू हाट में उमड़ी खरीदारों की भीड़
पारंपरिक मिट्टी के बर्तन, गुड़, सरसों तेल और बांस से बनी पूजन सामग्री की बढ़ी मांग; पांच दिनों तक प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करेंगे ग्रामीण।
सरायकेला। झारखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और कृषि परंपरा का प्रतीक बांदना एवं सोहराय परब नजदीक आते ही चांडिल अनुमंडल के ग्रामीण इलाकों में उत्सव का माहौल बनने लगा है। पर्व की तैयारियों को लेकर ग्रामीण बाजारों में रौनक बढ़ गई है। शुक्रवार को कुकड़ू साप्ताहिक हाट में खरीदारी के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने पारंपरिक पूजा सामग्री और पर्व में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की जमकर खरीदारी की।
कुकड़ू हाट में मिट्टी के बर्तन, गुड़, सरसों तेल, बांस से बने सूप, टोकरी, सिंदूर सहित विभिन्न पूजन सामग्रियों की दुकानों पर दिनभर खरीदारों की चहल-पहल बनी रही। खासकर पारंपरिक वस्तुओं की मांग अधिक देखने को मिली। पर्व के कारण बाजार में बढ़ी रौनक से छोटे दुकानदारों और स्थानीय कारोबारियों के चेहरे भी खिल उठे।
पशुधन के सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व
बांदना और सोहराय केवल त्योहार नहीं, बल्कि झारखंड की ग्रामीण जीवनशैली, कृषि संस्कृति और प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे रिश्ते का उत्सव हैं। खेती-किसानी में गाय और बैलों के महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार करते हुए इन पर्वों में पशुधन की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीण अपने मवेशियों को नहलाते-सजाते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।

पांच दिनों तक निभाई जाएंगी पारंपरिक रस्में
इस संबंध में झामुमो के पूर्व कुकड़ू प्रखंड अध्यक्ष इंद्रजीत महतो ने बताया कि बांदना परब पांच दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान गोवर्धन पूजा यानी गौहाल पूजा, गाय चुमान, बांदना खूंटा सहित कई पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं। ग्रामीण अपने गाय-बैलों को सजाकर उनकी पूजा करते हैं तथा पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से खुशियां मनाते हैं। उन्होंने बताया कि यह पर्व पशुधन के प्रति सम्मान और खेती-किसानी में उनके अमूल्य योगदान को याद करने का अवसर है।
आधुनिकता के बीच जीवित है लोकसंस्कृति की पहचान
आधुनिकता की दौड़ में जहां कई पारंपरिक रीति-रिवाज पीछे छूटते जा रहे हैं, वहीं बांदना और सोहराय जैसे पर्व ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। कुकड़ू हाट में उमड़ी भीड़ इस बात की गवाह है कि नई पीढ़ी के बीच भी अपनी परंपराओं, लोकगीतों और प्रकृति से जुड़े उत्सवों के प्रति उत्साह कायम है।
बांदना और सोहराय हमें यह याद दिलाते हैं कि किसान की समृद्धि केवल खेतों की उपज से नहीं, बल्कि उस पशुधन और प्रकृति से भी जुड़ी है, जो उसकी आजीविका का आधार हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी खूबसूरती और झारखंड की लोकसंस्कृति की असली पहचान है।