अंतिम लाइव में बयां की पीड़ा, कथित जमीन माफिया और प्रशासनिक उपेक्षा पर उठाए सवाल; आदिवासी अधिकारों की लड़ाई के बीच अब निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग
जमीनी आवाज | विशेष रिपोर्ट
रांची। असित भट्टाचार्य की कलम से।
झारखंड की एक मुखर आदिवासी बेटी निशा भगत अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 6 नवंबर को रांची में उनकी मौत की खबर ने आदिवासी समाज से लेकर राजनीतिक गलियारों तक को झकझोर दिया। लेकिन इस घटना को और गंभीर बना दिया मौत से कुछ समय पहले फेसबुक पर प्रसारित उनके उस लाइव वीडियो ने, जिसमें वह रोते हुए अपनी पीड़ा, संघर्ष और व्यवस्था के प्रति नाराजगी जाहिर करती नजर आईं।
निशा भगत आदिवासी अधिकारों, सरना धर्म की पहचान और जल-जंगल-जमीन के सवालों पर मुखर होकर आवाज उठाती थीं। उनकी उम्र लगभग 38 वर्ष बताई जा रही है।
फेसबुक लाइव में छलका दर्द, व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल
निशा भगत ने अपने अंतिम फेसबुक लाइव में राज्य की हेमंत सोरेन सरकार, कथित जमीन माफिया और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने की बात कही।
उनके बयान में बीजेपी और आरएसएस के प्रति भी निराशा दिखाई दी। उनका कहना था कि जिनसे उन्हें समर्थन की उम्मीद थी, वे भी उनके संघर्ष में साथ खड़े नहीं हुए।
उन्होंने पुलिस प्रशासन से जुड़े सवाल भी उठाए। लाइव के दौरान पिठोरिया थाना प्रभारी से फोन पर बातचीत कर अपनी स्थिति बताने की बात भी सामने आई है।
आखिर क्या सवाल छोड़ गईं निशा भगत?
निशा भगत की मौत अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
क्या आदिवासी समाज की जमीन और अधिकारों के लिए आवाज उठाना इतना कठिन हो गया है? क्या किसी नागरिक की शिकायत पर कार्रवाई के लिए उसके संघर्ष का इस हद तक पहुंचना जरूरी है? यदि किसी महिला सामाजिक कार्यकर्ता को अपनी सुरक्षा को लेकर इतनी चिंता थी, तो उसकी शिकायतों पर पहले क्या कार्रवाई हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या राजनीतिक दलों के लिए किसी व्यक्ति का महत्व केवल तब तक रहता है, जब तक उसकी आवाज उनके राजनीतिक हितों के अनुकूल होती है?
यह सवाल सिर्फ एक सरकार या एक राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं है। यह पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही से जुड़ा है।
पुलिस जांच से ही सामने आएगा पूरा सच
निशा भगत को रिम्स ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित किया। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। घटना की परिस्थितियों, फेसबुक लाइव, फोन कॉल और पूर्व शिकायतों की जानकारी जुटाना जांच के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
इस बीच बीजेपी नेताओं ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग करते हुए सरकार और प्रशासन पर सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि, निशा भगत द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच और पुष्टि अभी बाकी है। जिन लोगों या संस्थाओं का नाम उनके बयानों में आया है, उनका पक्ष और जांच के निष्कर्ष भी सामने आना जरूरी है।
सवाल पूछना गुनाह नहीं, लोकतंत्र की ताकत है!
निशा भगत की मौत को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में सीमित कर देना उनके उठाए सवालों के साथ अन्याय होगा। उनकी मौत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनकी पूर्व शिकायतों, सुरक्षा संबंधी आशंकाओं और प्रशासनिक कार्रवाई की पूरी पड़ताल होनी चाहिए।
किसी व्यक्ति की आखिरी बात को बिना जांच अंतिम सच घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे अनसुना भी नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह नहीं है। सत्ता से जवाब मांगना नागरिक का अधिकार है। आदिवासी अस्मिता, जमीन, सुरक्षा और सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले किसी भी व्यक्ति को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है।
निशा भगत की मौत के बाद सबसे बड़ी मांग यही होनी चाहिए कि सच सामने आए, जिम्मेदारी तय हो और न्याय मिले।
जमीनी आवाज का सवाल है—क्या निशा भगत की शिकायतों को उनकी जिंदगी रहते गंभीरता से सुना गया था? अब जांच में इसका जवाब कौन देगा?
खबरें जमीन की, जमाने की।