जमीनी आवाज | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन की प्रतीकात्मक जन महाभियोग कार्यवाही केवल आरोपों तक सीमित नहीं रही। 31 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित इस कार्यक्रम में विपक्ष ने चार प्रमुख मांगें भी सामने रखीं। इन मांगों के जरिए गठबंधन ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की अध्यक्षता में हुई इस कार्यवाही में विपक्षी दलों के नेताओं ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर सवाल उठाए।

कार्यक्रम में मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य रूप से चार मांगें रखीं। पहली मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की थी। विपक्ष का कहना है कि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास कायम रहना चाहिए और लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई होनी चाहिए।

दूसरी मांग मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया पर रोक लगाने की थी। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया से वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका है। गठबंधन का कहना है कि मतदाता सूची में सुधार के नाम पर किसी योग्य नागरिक का मतदान अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।

तीसरी मांग वर्ष 2023 के निर्वाचन आयुक्त नियुक्ति कानून में संशोधन की थी। खड़गे ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों तथा कार्यकाल से संबंधित कानून में बदलाव की आवश्यकता उठाई। विपक्ष का तर्क है कि नियुक्ति व्यवस्था में संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्षता को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।

चौथी मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ देशद्रोह के आरोप में कार्रवाई करने की थी। खड़गे ने अपने संबोधन में यह मांग भी रखी। हालांकि, यह विपक्ष की राजनीतिक मांग है, इसे किसी अदालत द्वारा स्थापित अपराध या दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित वर्ष 2023 का कानून लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।

विपक्ष का तर्क है कि इस व्यवस्था में सरकार का प्रभाव अधिक हो सकता है। वहीं, इस कानून के तहत नियुक्ति प्रक्रिया एक निर्धारित वैधानिक ढांचे के अंतर्गत संचालित होती है। इस बहस का संबंध केवल किसी एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त से नहीं, बल्कि भविष्य में निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और नियुक्ति व्यवस्था से भी है।

इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अंतर समझना जरूरी है। खड़गे के आवास पर आयोजित कार्यक्रम को INDIA गठबंधन ने जन महाभियोग नाम दिया है, लेकिन यह संसद में चलने वाली वास्तविक संवैधानिक हटाने की प्रक्रिया नहीं है।

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी प्रक्रिया और आधार लागू होते हैं। इसके लिए संसद में निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसलिए विपक्ष का सार्वजनिक कार्यक्रम राजनीतिक विरोध और जनमत तैयार करने का माध्यम है, न कि अपने आप में पद से हटाने का कानूनी आदेश।

विपक्ष की इन मांगों के बाद अब राजनीतिक बहस का केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग का पक्ष भी है। क्या निर्वाचन आयोग SIR से संबंधित सभी सवालों का विस्तृत जवाब देगा? क्या नियुक्ति कानून में बदलाव की मांग पर संसद में चर्चा होगी? और क्या विपक्ष अपने आरोपों को दस्तावेजों तथा प्रमाणों के साथ संवैधानिक मंचों पर आगे बढ़ाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।

लोकतंत्र में किसी संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाना और उसके जवाब मांगना नागरिक तथा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है। लेकिन किसी भी आरोप को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले उसकी निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता का अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र से जुड़ा विषय है।

जमीनी आवाज का सवाल है—क्या देश में निर्वाचन व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर पारदर्शी संवैधानिक चर्चा के माध्यम से होगा?

खबरें जमीन की, जमाने की।असित भट्टाचार्य

संस्थापक एवं प्रधान संपादक...जमीनी आवाज