जमीनी आवाज | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर।

देश की चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद शनिवार को एक नए मोड़ पर पहुंच गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित INDIA गठबंधन की प्रतीकात्मक जन महाभियोग कार्यवाही में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छह गंभीर आरोप सार्वजनिक रूप से रखे गए। विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाता सूची में नामों के कथित विलोपन और निर्वाचन आयोग की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए।

कार्यक्रम में खड़गे ने आरोप लगाया कि चुनावी व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए गए हैं, जिनसे मतदाताओं के अधिकार और चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत प्राप्त वयस्क मताधिकार आज गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

कार्यक्रम में मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छह आरोप रखे। विपक्ष के अनुसार इनमें चुनावों को प्रभावित करने की कथित साजिश, SIR प्रक्रिया के दौरान 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का दावा, संसद की स्वीकृति के बिना फॉर्म-6 की व्यवस्था में बदलाव, ECINET के माध्यम से मतदाता सूची के प्रबंधन और नियंत्रण पर सवाल, अन्य निर्वाचन आयुक्तों को निर्णय प्रक्रिया से अलग रखने तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर काम करने जैसे आरोप शामिल हैं।

ये सभी विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब आवश्यक है।

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम नागरिक का मतदान अधिकार है। मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम नहीं होना उसके लिए गंभीर समस्या बन सकता है। इससे वह चुनाव में मतदान करने के अवसर से वंचित हो सकता है।

कार्यक्रम में ऐसे नागरिकों को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया, जिनका दावा है कि SIR के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। विपक्षी नेताओं के साथ नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और प्रभावित नागरिकों की भागीदारी भी रही।

इस मुद्दे पर मूल सवाल यह है कि यदि किसी योग्य मतदाता का नाम सूची से हटता है, तो उसे इसकी जानकारी कैसे मिलेगी? नाम हटाने का कारण क्या होगा? और उसे समय रहते अपना नाम दोबारा जुड़वाने का अवसर किस प्रकार मिलेगा?

खड़गे ने अपने संबोधन में कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत दुश्मनी रखना नहीं है। विपक्ष का दावा है कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है। राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने भी निर्वाचन प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए।

हालांकि, किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है। खड़गे के आवास पर हुई प्रतीकात्मक कार्यवाही अपने आप में कोई कानूनी महाभियोग नहीं है।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलते रहेंगे, लेकिन एक आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका मताधिकार है। यदि किसी व्यक्ति ने सभी निर्धारित योग्यताएं पूरी की हैं, तो उसे मतदाता सूची में अपना नाम सुनिश्चित कराने के लिए स्पष्ट और सरल व्यवस्था मिलनी चाहिए।

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखते हुए किसी भी योग्य नागरिक का अधिकार प्रभावित न हो। वहीं राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे अपने आरोपों को प्रमाण और दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक करें।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच जमीनी आवाज पांच सीधे सवाल जनता और संबंधित संस्थाओं के सामने रखता है—

1. विपक्ष द्वारा बताए गए 13.2 करोड़ नाम हटाए जाने के दावे का आधिकारिक आधार और पूरा विवरण क्या है?

2. SIR के दौरान नाम हटाने की प्रक्रिया में प्रभावित मतदाताओं को कितनी जानकारी और सुनवाई का अवसर मिला?

3. फॉर्म-6 और ECINET से जुड़े बदलावों का पूरा विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

4. निर्वाचन आयोग इन आरोपों पर अपना तथ्यात्मक पक्ष कब और किस माध्यम से स्पष्ट करेगा?

5. क्या देश में प्रत्येक योग्य नागरिक के मतदान अधिकार की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है?

चुनाव लोकतंत्र का आधार हैं और मतदाता उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी भी राजनीतिक बहस से ऊपर नागरिक का मतदान अधिकार होना चाहिए। आरोपों की निष्पक्ष जांच, निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और जनता के सामने स्पष्ट जवाब—यही लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास मजबूत करने का रास्ता है।

जमीनी आवाज इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए रखेगा। हमारा उद्देश्य किसी आरोप को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं, बल्कि उन सवालों को जनता के सामने रखना है जिनका जवाब लोकतंत्र के हित में जरूरी है।

खबरें जमीन की, जमाने की।असित भट्टाचार्य

संस्थापक एवं प्रधान संपादक...जमीनी आवाज