नई दिल्ली, 31 अक्टूबर।
लोकतंत्र में सरकार चुनने का अधिकार जनता के पास होता है। एक मतदाता का वोट केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी भागीदारी का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देशभर में राजनीतिक बहस तेज हो रही है, तब सबसे महत्वपूर्ण सवाल आम नागरिक के सामने खड़ा है—यदि मतदाता सूची से किसी योग्य नागरिक का नाम गायब हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
31 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित INDIA गठबंधन की प्रतीकात्मक जन महाभियोग कार्यवाही में भी मतदाता सूची और नागरिकों के मतदान अधिकार को प्रमुखता से उठाया गया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

हालांकि, 13.2 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा खड़गे द्वारा लगाया गया राजनीतिक आरोप है। इसे योग्य मतदाताओं के अवैध रूप से हटाए जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, इस आंकड़े पर राजनीतिक बहस के बीच मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अनुपलब्ध मतदाताओं की श्रेणियों को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
किसी मतदाता का नाम सूची में नहीं होना उसके लिए गंभीर परेशानी पैदा कर सकता है। कोई व्यक्ति वर्षों से एक ही क्षेत्र में रह रहा हो, उसके पास मतदाता पहचान पत्र भी हो, लेकिन मतदान के समय सूची में नाम नहीं मिले तो वह अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। यही वजह है कि मतदाता सूची में पारदर्शिता और सुधार की प्रक्रिया आम नागरिक के लिए आसान होनी चाहिए।
निर्वाचन आयोग की आधिकारिक व्यवस्था में मतदाता अपना नाम ऑनलाइन खोज सकते हैं, आवेदन की स्थिति देख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर संबंधित फॉर्म के माध्यम से दावा या सुधार कर सकते हैं। फॉर्म-6 का इस्तेमाल नया नाम मतदाता सूची में जुड़वाने के लिए, फॉर्म-7 का इस्तेमाल नाम हटाने के अनुरोध या किसी प्रविष्टि पर आपत्ति के लिए तथा फॉर्म-8 का इस्तेमाल नाम, पता और अन्य विवरणों में सुधार एवं स्थानांतरण के लिए किया जाता है। इसके अलावा मतदाता ऑनलाइन अपना नाम खोज सकते हैं, आवेदन की स्थिति देख सकते हैं और शिकायत दर्ज करा सकते हैं। निर्वाचन आयोग की हेल्पलाइन संख्या 1950 भी नागरिकों के लिए उपलब्ध है।
निर्वाचन आयोग की 26 सितंबर 2026 की बैठक के बाद जारी सरकारी जानकारी के अनुसार, जिन लोगों को SIR के दौरान अनमैप्ड या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी हुआ है, उनके घर BLO जाकर दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं और उन्हें ECINET पर अपलोड कर सकते हैं। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे लोगों को ERO/AERO कार्यालय में बुलाने की आवश्यकता नहीं बताई गई है। विशेष परिस्थितियों में सुनवाई हो सकती है।
सरकार ने गरीबों, मजदूरों, बेघर लोगों और रैन बसेरों में रहने वाले नागरिकों के लिए पर्याप्त सहायता केंद्र और विशेष शिविर बनाने की बात भी कही है। इस व्यवस्था का वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित होगा, जब सूचना और सहायता उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
एक ओर विपक्ष निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप लगा रहा है, दूसरी ओर निर्वाचन आयोग और सरकार की ओर से SIR प्रक्रिया के लिए नियमों और सुरक्षा उपायों का हवाला दिया गया है। इस पूरे विवाद में आम नागरिक को राजनीतिक बयानबाजी के बीच नहीं छोड़ा जा सकता।
यदि किसी योग्य नागरिक का नाम हटता है तो उसे स्पष्ट कारण बताया जाना चाहिए। उसे आपत्ति दर्ज कराने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, गलत तरीके से हटाए गए नामों को नियमानुसार वापस जोड़ने की प्रक्रिया भी प्रभावी होनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जमीनी आवाज सात सीधे सवाल जनता और संबंधित संस्थाओं के सामने रखता है—
1. क्या प्रत्येक मतदाता को अपने नाम की स्थिति जांचने की पर्याप्त जानकारी दी जा रही है?
2. यदि किसी योग्य मतदाता का नाम हटता है तो उसे इसकी सूचना किस माध्यम से मिलेगी?
3. क्या ग्रामीण, गरीब, मजदूर और बेघर नागरिकों के लिए सहायता केंद्र पर्याप्त हैं?
4. क्या BLO और निर्वाचन अधिकारियों के पास प्रत्येक शिकायत के समाधान के लिए पर्याप्त व्यवस्था है?
5. क्या नाम हटाने के कारणों और आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से जांचने योग्य बनाया जा रहा है?
6. क्या प्रभावित नागरिकों को समय पर दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिल रहा है?
7. यदि किसी योग्य मतदाता का नाम गलती से हटाया गया है तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी और व्यवस्था की होगी?
चुनाव में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह जनता तय करती है। लेकिन जनता को चुनाव में भाग लेने का अवसर मिलना भी उतना ही आवश्यक है। मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी भी योग्य नागरिक का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।
SIR को लेकर राजनीतिक दलों के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहे और किसी भी गलती की स्थिति में उसे न्याय पाने का सरल रास्ता मिले।
लोकतंत्र में सरकार जनता चुनती है। इसलिए मतदाता सूची में जनता का नाम सुरक्षित रखना केवल प्रशासनिक काम नहीं, लोकतांत्रिक भरोसे की बुनियादी जिम्मेदारी है।
जमीनी आवाज इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग, सरकार, विपक्ष और प्रभावित नागरिकों के पक्ष को तथ्यों के साथ सामने लाने का प्रयास जारी रखेगा।
खबरें जमीन की, जमाने की।असित भट्टाचार्य
संस्थापक एवं प्रधान संपादक...जमीनी आवाज