हुनर था, हौसला था… बस एक मशीन की कमी थी; माधुरी देवी ने अपनी मेहनत से बदल दी जिंदगी की राह
“अपने हुनर से कुछ करना चाहती थी, लेकिन सिलाई मशीन खरीदने के पैसे नहीं थे”—मठिला की माधुरी देवी ने छोटी बचत से शुरू किया सफर, आज सिलाई से कमा रहीं करीब ₹500 प्रतिदिन
स्वयं सहायता समूह से मिली बचत की सीख और मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की ₹10 हजार की मदद बनी सहारा, अब अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश में जुटी हैं माधुरी
“हुनर तो मेरे पास पहले से था, लेकिन मशीन नहीं थी। मन में हमेशा यही रहता था कि अगर अपनी सिलाई मशीन होती तो मैं भी अपने हाथों से कुछ कमा सकती।”
बक्सर जिले के डुमरांव प्रखंड के मठिला गांव की माधुरी देवी की कहानी किसी बड़े शहर की चमक-दमक के बीच शुरू नहीं होती। यह कहानी गांव के उस घर से निकलती है, जहां सीमित आमदनी में परिवार चलाने की जद्दोजहद है, जहां खेती ही आय का प्रमुख सहारा है और जहां बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक हर खर्च सोच-समझकर करना पड़ता है।
हुनर था, लेकिन मशीन नहीं थी
माधुरी देवी के परिवार में पति, एक बेटा और एक बेटी समेत चार सदस्य हैं। उनके पति खेती-बाड़ी का काम करते हैं। खेती से होने वाली आमदनी से परिवार की जरूरतें पूरी करना हमेशा आसान नहीं रहा। ऐसे में माधुरी के मन में एक सवाल लगातार बना रहा—क्या उनके हाथों का हुनर परिवार की आमदनी का सहारा बन सकता है?
जवाब उनके पास था—सिलाई। माधुरी को पहले से सिलाई आती थी और वह चाहती थीं कि घर के कामकाज के साथ-साथ अपने हुनर का इस्तेमाल कर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में योगदान दें। लेकिन चाहत और हकीकत के बीच एक मशीन खड़ी थी। सिलाई मशीन खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।
हर सप्ताह 10 रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर
माधुरी देवी जीविका के पार्वती स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने सिर्फ सामूहिक गतिविधियों में हिस्सा लेना नहीं सीखा, बल्कि बचत का महत्व भी समझा। उन्होंने हर सप्ताह 10 रुपये बचाने शुरू किए।
रकम छोटी थी, लेकिन माधुरी के लिए उसका महत्व बड़ा था। यह 10 रुपये केवल बचत नहीं थे, बल्कि उस विश्वास की शुरुआत थे कि अगर थोड़ी-थोड़ी रकम बचाई जाए तो एक दिन अपने पैरों पर खड़े होने का रास्ता भी बनाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की ₹10 हजार की मदद
समय के साथ माधुरी को मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपये की वित्तीय सहायता मिली। माधुरी ने इस पैसे को घरेलू खर्च में खत्म करने के बजाय अपने हुनर में लगाने का फैसला किया और सिलाई मशीन खरीद ली।
मशीन मिलने के बाद उन्होंने आसपास के लोगों के कपड़े सिलने शुरू किए। धीरे-धीरे काम बढ़ा और सिलाई उनके लिए सिर्फ घर के काम का हिस्सा नहीं रही, बल्कि आमदनी का जरिया बन गई। माधुरी के अनुसार, उन्हें अब सिलाई के काम से प्रतिदिन करीब 500 रुपये तक की आय हो जाती है।
ग्रामीण महिला को सहायता नहीं, अवसर चाहिए
उनकी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि उन्हें 10 हजार रुपये की सहायता मिली। असली कहानी यह है कि उन्होंने उस सहायता को अपनी ताकत बनाने का फैसला किया। जिस मशीन को खरीदने के लिए कभी पूंजी नहीं थी, आज वही मशीन उनके हाथों को काम दे रही है।
माधुरी की कहानी में एक और बात साफ दिखाई देती है—ग्रामीण महिला को सिर्फ सहायता नहीं, अवसर चाहिए। हुनर पहले से मौजूद हो सकता है, मेहनत करने की इच्छा भी हो सकती है, लेकिन अगर साधन नहीं मिले तो वह हुनर अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर ही रह जाता है। सिलाई मशीन ने उस चारदीवारी को एक नए रास्ते में बदलने का काम किया।
माधुरी देवी की कहानी किसी चमत्कार की कहानी नहीं है। यह उस ग्रामीण महिला की कहानी है जिसने अपनी परिस्थिति को स्वीकार करने के बजाय अपने हुनर को सहारा बनाया, छोटी-सी बचत से शुरुआत की, समय पर आर्थिक मदद पाई और उस मदद को अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में लगा दिया।
मठिला गांव की माधुरी आज भी संघर्ष कर रही हैं और मंजिल अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन फर्क इतना है कि अब उनके हाथ खाली नहीं हैं। 10 रुपये की बचत से शुरू हुआ यह सफर आज करीब 500 रुपये प्रतिदिन की कमाई तक पहुंचा है।
शायद यही किसी योजना की सबसे जमीनी तस्वीर है—जब सहायता किसी के हाथ में पहुंचकर सिर्फ खर्च नहीं होती, बल्कि हुनर के साथ जुड़कर रोजी-रोटी का साधन बन जाती है।
बिहार से जमीनी आवाज के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस महिला की कहानी है जो अपने हाथों से अपना भविष्य सिलने की कोशिश कर रही है।


