विधायिका से अदालत तक : अंबा प्रसाद की राजनीति का नया अध्याय
विधानसभा में उठे सवाल अब अदालत तक पहुंचाने की तैयारी, AIBE पास करने के बाद अंबा प्रसाद की राजनीतिक भूमिका का नया स्वरूप
झारखंड की राजनीति में अंबा प्रसाद का नाम पिछले कुछ वर्षों में एक सक्रिय और मुखर महिला राजनीतिक चेहरे के रूप में सामने आया है। बड़कागांव की पूर्व विधायक अंबा प्रसाद अब अपनी राजनीतिक भूमिका में एक नया आयाम जोड़ रही हैं। हाल ही में उन्होंने ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) परीक्षा उत्तीर्ण की है। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया है कि जनता से जुड़े मुद्दों की लड़ाई अब केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर न्यायालय का रास्ता भी अपनाया जाएगा।
राजनीति के बाद कानून की पढ़ाई, जनता की लड़ाई का नया रास्ता?


अंबा प्रसाद ने AIBE परीक्षा पास करने के बाद कहा है कि उन्होंने विधायिका के कामकाज को समझा है और कार्यपालिका की कार्यशैली को भी करीब से देखा है। उनका कहना है कि इन दोनों के बीच फंसी जनता के लिए अब न्यायालय में भी न्याय की गुहार लगाने का प्रयास करेंगी।
खासमहल के सवाल पर भी मुखर
हाल के दिनों में खासमहल जमीन और उससे जुड़े पट्टेदारों के सवाल को लेकर भी अंबा प्रसाद सक्रिय दिखाई दी हैं। उन्होंने खासमहल मैनुअल के नवीकरण और लंबे समय से लंबित लीज नवीकरण का मुद्दा उठाते हुए कहा कि नीति की स्पष्टता के अभाव में वर्षों से रह रहे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने खासमहल मैनुअल में संशोधन तक दंडात्मक कार्रवाई रोकने की मांग भी रखी है।
पिता योगेंद्र साव के मामले में भी अलग रुख
मार्च 2026 में कांग्रेस से उनके पिता योगेंद्र साव के निष्कासन के बाद अंबा प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से इस कार्रवाई पर सवाल उठाए थे और केंद्रीय नेतृत्व तक मामला ले जाने की बात कही थी। उन्होंने दावा किया था कि उनके पिता के खिलाफ कार्रवाई उचित प्रक्रिया के बिना की गई। ये उनके स्वयं के सार्वजनिक आरोप और दावे थे।
घाटशिला में भी दिखाई दी सक्रियता
घाटशिला विधानसभा उपचुनाव के दौरान अंबा प्रसाद की मौजूदगी ने पूर्वी सिंहभूम की राजनीति में भी ध्यान खींचा। नवंबर 2025 में घाटशिला में कांग्रेस के एक सम्मेलन में वे अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ मौजूद थीं। घाटशिला जैसे विधानसभा क्षेत्र में जमीन, विस्थापन, खनन, रोजगार, आदिवासी अधिकार, उद्योग और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे सवाल लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहते हैं।
एक महिला नेता से अब अधिवक्ता तक
अंबा प्रसाद की मौजूदा राजनीतिक पहचान को केवल पूर्व विधायक के रूप में देखना उनकी वर्तमान गतिविधियों की पूरी तस्वीर नहीं देता। एक ओर वे कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव के रूप में राजनीतिक संगठन से जुड़ी हुई हैं, दूसरी ओर पूर्व विधायक के रूप में विधायी अनुभव उनके पास है और अब AIBE पास करने के बाद कानूनी क्षेत्र में भी प्रवेश का रास्ता खुला है।
घाटशिला के लिए असली सवाल
घाटशिला की जनता के लिए फिलहाल असली सवाल यह नहीं है कि अंबा प्रसाद भविष्य में किस राजनीतिक भूमिका में होंगी। सवाल यह है कि क्या जमीन, विस्थापन, रोजगार, उद्योग और स्थानीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता आगे भी बनी रहती है? अगर राजनीतिक आवाज के साथ कानूनी लड़ाई भी जुड़ती है, तो जनमुद्दों की लड़ाई का एक नया रास्ता खुल सकता है।





