असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट
जब शिष्या ने गीत गाकर गुरु को किया नमन, भावुक हो उठा शिक्षकों के सम्मान का मंच

बरुनिया स्कूल की प्राचार्य लक्ष्मी हांसदा ने अपने गुरु जय किशोर प्रसाद को गीत समर्पित कर पेश की गुरु-शिष्य परंपरा की अनुपम मिसाल।
SEVAK के आयोजन में सुरों के बीच जीवंत हुआ सम्मान, संस्कार और कृतज्ञता का रिश्ता; नई पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए भी बना प्रेरणादायक संदेश।
एक गीत, जिसमें सुरों से अधिक बोल रहा था सम्मान
घाटशिला। मंच सजा था, सामने शिक्षक बैठे थे और वातावरण में सम्मान, आत्मीयता तथा संगीत की मधुरता घुली हुई थी। अवसर था SEVAK (Social Empowerment Visionary and Kindness) की ओर से आयोजित ‘एक शाम शिक्षकों के नाम’ कार्यक्रम का। शिक्षकों के योगदान को सम्मान देने के उद्देश्य से आयोजित इस समारोह में एक ऐसा भावुक क्षण सामने आया, जिसने गुरु और शिष्य के रिश्ते की गहराई को नए सिरे से महसूस कराया।
जब बरुनिया स्कूल की प्राचार्य लक्ष्मी हांसदा ने अपने गुरु जय किशोर प्रसाद के सम्मान में गीत प्रस्तुत किया, तो यह केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं रह गई। वह गीत एक शिष्या के मन में अपने गुरु के प्रति वर्षों से बसे सम्मान, स्नेह और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति बन गया।
कभी गुरु के सामने बैठकर शिक्षा ग्रहण करने वाली शिष्या आज स्वयं विद्यालय की प्राचार्य हैं। समय बदला, जिम्मेदारियां बदलीं और जीवन ने उन्हें एक नई पहचान दी, लेकिन अपने गुरु के प्रति सम्मान का भाव कायम रहा। अपने गुरु के सामने खड़े होकर उन्हें गीत समर्पित करना इस बात का प्रतीक था कि जीवन में कितनी भी ऊंचाई हासिल कर ली जाए, अपनी शुरुआत और अपने मार्गदर्शकों को याद रखना ही सच्चे संस्कार हैं।

गुरु के सामने शिष्या की प्रस्तुति बनी यादगार
इस प्रसंग की विशेषता यह थी कि गुरु और शिष्या का रिश्ता किसी औपचारिक परिचय तक सीमित नहीं था। जय किशोर प्रसाद के सामने उनकी पूर्व छात्रा लक्ष्मी हांसदा आज एक विद्यालय की प्राचार्य के रूप में मौजूद थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने पद और उपलब्धियों के बजाय शिष्या होने के रिश्ते को प्राथमिकता दी।
यह दृश्य शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाता है। शिक्षक का काम केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देना नहीं होता। वे विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, उन्हें जीवन की चुनौतियों से जूझना सिखाते हैं और उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब वही विद्यार्थी जीवन में आगे बढ़कर अपनी पहचान बनाते हैं और अपने गुरु के योगदान को याद करते हैं, तो यह किसी भी शिक्षक के लिए गर्व और संतोष का क्षण होता है।
लक्ष्मी हांसदा की प्रस्तुति इसी भावना का सुंदर उदाहरण बनी। गीत के माध्यम से उन्होंने अपने गुरु के प्रति आदर व्यक्त किया और यह संदेश दिया कि शिक्षा का रिश्ता परीक्षा, प्रमाणपत्र या नौकरी मिलने के बाद समाप्त नहीं हो जाता। गुरु से मिली सीख और उनके दिए संस्कार जीवनभर व्यक्ति का मार्गदर्शन करते रहते हैं।
नई पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए बड़ी सीख
आज के दौर में शिक्षा को अक्सर परीक्षा के अंकों, प्रतियोगिता, डिग्री और रोजगार की कसौटी पर परखा जाता है। इन सबका अपना महत्व है, लेकिन शिक्षा की सफलता का एक दूसरा पक्ष भी है—व्यक्ति के भीतर मानवीय संवेदनाओं, कृतज्ञता और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना का विकास।
लक्ष्मी हांसदा की यह अभिव्यक्ति नई पीढ़ी को यही संदेश देती है कि जीवन में आगे बढ़ना जितना आवश्यक है, अपनी यात्रा में योगदान देने वाले लोगों को याद रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिस शिक्षक ने अक्षर ज्ञान दिया, कठिन समय में मार्गदर्शन किया और गलतियों को सुधारकर बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दी, उसके प्रति सम्मान केवल शिक्षक दिवस पर फूल भेंट करने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
गुरु के प्रति आदर का वास्तविक अर्थ है उनकी शिक्षा और संस्कारों को अपने जीवन में उतारना तथा अपने व्यवहार से उन मूल्यों को आगे बढ़ाना। बरुनिया स्कूल की प्राचार्य लक्ष्मी हांसदा ने अपने गुरु के सम्मान में गीत प्रस्तुत कर यही संदेश दिया कि पद व्यक्ति को पहचान दे सकता है, लेकिन संस्कार उसके व्यक्तित्व को ऊंचाई देते हैं।

SEVAK का मंच बना भावनाओं और सम्मान का संगम
SEVAK की ओर से 11 अक्टूबर 2026 को घाटशिला के होटल जे.एन. पैलेस में आयोजित ‘एक शाम शिक्षकों के नाम’ कार्यक्रम ने शिक्षकों के योगदान को सम्मान देने के साथ उनकी प्रतिभा और सांस्कृतिक अभिरुचियों को भी मंच प्रदान किया। इस आयोजन का भावनात्मक पक्ष तब और खास हो गया, जब एक पूर्व छात्रा ने अपने गुरु के सम्मान में गीत प्रस्तुत किया।
शिक्षक समाज में केवल किसी विद्यालय या कक्षा तक सीमित भूमिका नहीं निभाते। वे आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व निर्माण में योगदान देते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, पत्रकार, कलाकार और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले अनेक लोगों की यात्रा में किसी न किसी शिक्षक का मार्गदर्शन शामिल होता है। ऐसे में शिक्षकों को सम्मान देने वाले आयोजन समाज को शिक्षा के इस व्यापक महत्व की याद दिलाते हैं।
लक्ष्मी हांसदा की प्रस्तुति ने इस आयोजन को व्यक्तिगत और भावनात्मक अर्थ दिया। यहां सम्मान केवल मंच पर मिलने वाले किसी प्रतीक तक सीमित नहीं था, बल्कि एक शिष्या के मन में अपने गुरु के लिए मौजूद आदर की सहज अभिव्यक्ति भी था। सामान्य बातचीत के बजाय संगीत को माध्यम बनाकर उन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया।
गुरु-शिष्य का रिश्ता: समय बदलता है, सम्मान नहीं
गुरु और शिष्य का रिश्ता भारतीय शिक्षा परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर रहा है। समय के साथ शिक्षा की पद्धतियां बदली हैं, विद्यालयों का स्वरूप बदला है और तकनीक ने सीखने के नए रास्ते खोले हैं। इसके बावजूद शिक्षक के मार्गदर्शन और विद्यार्थी के सम्मान का महत्व आज भी बना हुआ है।
एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताता कि उसे क्या पढ़ना है, बल्कि यह भी सिखाता है कि जीवन में किस तरह आगे बढ़ना है। वह सवाल पूछने, गलतियों से सीखने और अपनी क्षमताओं को पहचानने की प्रेरणा देता है। वहीं, एक संवेदनशील विद्यार्थी अपने शिक्षक के योगदान को अतीत की स्मृति बनाकर नहीं छोड़ता, बल्कि जीवन में मिली सीख के महत्व को स्वीकार करता है।
लक्ष्मी हांसदा और जय किशोर प्रसाद के बीच दिखाई देने वाला यह जुड़ाव इसी रिश्ते की याद दिलाता है। एक ओर शिक्षा प्राप्त कर आगे बढ़ी शिष्या हैं, तो दूसरी ओर उनकी शैक्षणिक यात्रा में मार्गदर्शन देने वाले गुरु। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन उन्हें जोड़ने वाली डोर सम्मान और आत्मीयता की है।
यह प्रसंग उन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। अपनी सफलता का उत्सव मनाइए, लक्ष्य हासिल कीजिए और अपनी पहचान बनाइए, लेकिन उन लोगों को मत भूलिए जिन्होंने आपकी यात्रा की शुरुआत में आपका मार्गदर्शन किया था।

जमीनी आवाज की बात: डिग्रियों से आगे भी है शिक्षा की असली पहचान
लक्ष्मी हांसदा द्वारा अपने गुरु जय किशोर प्रसाद को गीत के माध्यम से सम्मानित करने का यह प्रसंग समाज के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखता है—क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल पेशेवर बनाना है, या एक संवेदनशील, जिम्मेदार और कृतज्ञ इंसान तैयार करना भी है?
इसका उत्तर ऐसे ही प्रसंगों में दिखाई देता है। जब कोई विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर आगे बढ़ता है, स्वयं किसी संस्थान की जिम्मेदारी संभालता है और फिर भी अपने गुरु के सामने सम्मान से खड़ा होता है, तो वह अपने आचरण से शिक्षा के मानवीय पक्ष को सामने लाता है।
इस भाव को व्यक्त करने के लिए न किसी बड़े भाषण की जरूरत थी, न किसी लंबे उपदेश की। एक शिष्या ने गीत गाया और अपने गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त किया। लेकिन इस छोटी-सी प्रस्तुति में छिपा संदेश बहुत बड़ा है। गुरु का सम्मान केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि उस ज्ञान, विश्वास और संस्कार के प्रति कृतज्ञ होना है, जिसने जीवन को दिशा दी।
SEVAK के ‘एक शाम शिक्षकों के नाम’ कार्यक्रम का यह प्रसंग इसलिए याद रखने योग्य है, क्योंकि यह बताता है कि समय के साथ भूमिकाएं बदल सकती हैं, विद्यार्थी अपने क्षेत्र में नई ऊंचाइयां हासिल कर सकते हैं, लेकिन सच्चे गुरु के प्रति सम्मान जीवनभर बना रह सकता है।
एक शिष्या का गीत भले ही कुछ क्षणों में समाप्त हो गया हो, लेकिन उसमें व्यक्त कृतज्ञता का संदेश लंबे समय तक लोगों के मन में गूंजता रह सकता है। शायद किसी गुरु के लिए यही सबसे बड़ा सम्मान है—जब उसका विद्यार्थी जीवन में आगे बढ़कर अपनी पहचान बनाए, लेकिन अपनी सफलता की कहानी में गुरु के योगदान को कभी न भूले।