3 माह में समाधान नहीं तो चांडिल बांध विस्थापित करेंगे बड़ा आंदोलन, विधानसभा घेराव की चेतावनी

15 सूत्री मांगों को लेकर एक दिवसीय धरना, पुनर्वास, मुआवजा, पट्टा और रोजगार के लंबित मामलों पर प्रशासन को दिया अल्टीमेटम

सरायकेला : विजय कुमार गोप की रिपोर्ट

चांडिल बांध से विस्थापित परिवारों के वर्षों पुराने लंबित अधिकारों को लेकर मंगलवार को सुबर्णरेखा चांडिल बांध कार्यालय परिसर में विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन और विस्थापित मुक्ति वाहिनी के संयुक्त बैनर तले एक दिवसीय शांतिपूर्ण धरना दिया गया। धरने में बड़ी संख्या में विस्थापित महिला-पुरुष शामिल हुए।

धरना समाप्त होने के बाद संबंधित पदाधिकारी को 15 सूत्री मांगों का ज्ञापन सौंपते हुए विस्थापित संगठनों ने प्रशासन को तीन माह का अल्टीमेटम दिया। संगठनों ने स्पष्ट किया कि निर्धारित अवधि में मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से और तेज किया जाएगा।

विस्थापितों का कहना है कि चांडिल बांध परियोजना के कारण प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और अधिकारों का सवाल लंबे समय से लंबित है। कई परिवार आज भी मुआवजा, पुनर्वास स्थल पर भूखंड का पट्टा, सीमांकन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

उनका कहना है कि विस्थापन का समाधान केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि समयबद्ध और जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से होना चाहिए।

15 सूत्री मांगों में पुनर्वास से लेकर रोजगार तक के सवाल

विस्थापित अधिकार मंच और विस्थापित मुक्ति वाहिनी की ओर से सौंपे गए मांग पत्र में झारखंड विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग के गठन और उसके प्रभावी क्रियान्वयन की मांग प्रमुख रूप से शामिल है।

इसके अलावा पुनर्वास स्थलों के भूखंडों का पट्टा देने, सीमांकन कराने और अवैध कब्जे हटाने की मांग की गई है। आंशिक रूप से प्रभावित गांवों का दोबारा सर्वे कर पात्र परिवारों को पूर्ण विस्थापित का दर्जा देने की मांग भी उठाई गई।

विस्थापितों ने भूमि, पेड़, तालाब, कुआं और बाउंड्री वॉल समेत लंबित मुआवजे का भुगतान कराने की मांग की है।

आजीविका का सवाल भी आंदोलन के केंद्र में

विस्थापित संगठनों ने जलाशय में मत्स्य पालन और नौकायन के कार्यों में स्थानीय विस्थापित परिवारों को प्राथमिकता देने की मांग की है। मत्स्य पालन पर निर्भर परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराने की मांग भी रखी गई।


विस्थापितों का कहना है कि पुनर्वास का अर्थ केवल जमीन उपलब्ध कराना नहीं है। जिन परिवारों की आजीविका परियोजना और जलाशय के कारण प्रभावित हुई है, उनके लिए स्थायी आय और रोजगार की व्यवस्था भी जरूरी है।

मंच ने सभी 116 प्रभावित गांवों में समान प्रावधान लागू करने तथा विकास पुस्तिका में दर्ज कार्यों को पूरा कराने की मांग की। साथ ही पुनर्वास नीति-2012 के तहत मिलने वाले आवास, परिवहन और स्वरोजगार अनुदान की राशि को वर्तमान महंगाई के अनुरूप बढ़ाने की मांग भी की गई।

सोलर प्रोजेक्ट से पहले ग्रामसभा की सहमति की मांग

विस्थापित संगठनों ने पुनर्वास कार्यालय-2 और विशेष भू-अर्जन कार्यालय में कथित दलाल प्रथा पर रोक लगाने की मांग की।

जलाशय में प्रस्तावित सोलर प्रोजेक्ट को लेकर मंच ने कहा कि किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले प्रभावित गांवों में ग्रामसभा आयोजित की जानी चाहिए तथा स्थानीय लोगों की सहमति और आपत्तियों को दर्ज किया जाना चाहिए।

इसके अलावा भर्ती नियमावली-2025 के तहत रोजगार प्रक्रिया शुरू करने, विस्थापितों के अधिकारों का समाधान होने तक जल भंडारण पर रोक लगाने और प्रत्येक माह प्रगति रिपोर्ट मंच को उपलब्ध कराने की मांग भी की गई।

प्राकृतिक आपदा और वन्यजीवों से होने वाली क्षति पर तत्काल मुआवजा देने तथा सभी विस्थापित गांवों में सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करने की मांग भी ज्ञापन में शामिल है।

तीन माह का अल्टीमेटम, फिर आंदोलन तेज करने का ऐलान

धरना के दौरान विस्थापित संगठनों ने कहा कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ नहीं है, बल्कि वर्षों से लंबित अधिकार, न्याय और सम्मान की मांग को लेकर है।

संगठनों ने प्रशासन को तीन माह का समय देते हुए कहा कि इस अवधि में यदि मांगों पर ठोस और दिखाई देने वाली कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को अगले चरण में ले जाया जाएगा।

विस्थापित संगठनों ने अनिश्चितकालीन धरना, भूख हड़ताल, मशाल जुलूस, विधानसभा घेराव और मुख्यमंत्री आवास घेराव जैसे शांतिपूर्ण आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

‘अब आश्वासन नहीं, समयबद्ध समाधान चाहिए’

विस्थापित नेताओं का कहना है कि विकास की कीमत जिन परिवारों ने अपनी जमीन, घर, खेत और आजीविका गंवाकर चुकाई है, उनके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

116 प्रभावित गांवों के विस्थापितों से जुड़े इन सवालों के बीच अब प्रशासन के सामने चुनौती केवल मांगों को सुनने की नहीं, बल्कि लंबित मामलों पर समयबद्ध कार्रवाई दिखाने की भी है।

धरने में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष विस्थापित मौजूद रहे। प्रदर्शनकारियों ने मांगों के समर्थन में आवाज बुलंद करते हुए प्रशासन से तीन माह के भीतर ठोस कदम उठाने की मांग की।

अब देखना यह होगा कि तीन माह के इस अल्टीमेटम के दौरान प्रशासन और विस्थापित संगठनों के बीच समाधान की कोई ठोस राह निकलती है या आंदोलन अगले चरण में प्रवेश करता है।