बर्फ में छिपे ‘भूतिया कणों’ ने खोला ब्रह्मांड का नया दरवाजा, फ्रांसिस हाल्जेन को भौतिकी का नोबेल

दक्षिणी ध्रुव की बर्फ को विशाल ‘न्यूट्रिनो टेलीस्कोप’ में बदलने वाले वैज्ञानिक को सम्मान, IceCube ने अंतरिक्ष के सबसे ऊर्जावान रहस्यों तक पहुंचाई इंसान की नजर

अरबों प्रकाश वर्ष दूर से आने वाले अदृश्य कणों ने सुनाई ब्रह्मांड की कहानी, ‘घोस्ट पार्टिकल्स’ की खोज ने खगोल विज्ञान को दी नई दिशा

विशेष विज्ञान रिपोर्ट | असित भट्टाचार्य

नई दिल्ली | 6 अक्टूबर 2026

ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमयी और लगभग अदृश्य संदेशवाहक कहे जाने वाले न्यूट्रिनो ने विज्ञान की दुनिया में एक नया अध्याय खोल दिया है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने वर्ष 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार बेल्जियम में जन्मे अमेरिकी भौतिक विज्ञानी फ्रांसिस हाल्जेन को देने की घोषणा की है।

हाल्जेन को यह सम्मान IceCube Neutrino Observatory में निर्णायक योगदान और खगोलीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है। नोबेल समिति के अनुसार उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नेतृत्व ने खगोल विज्ञान के लिए एक नई खिड़की खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फ्रांसिस हाल्जेन यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन–मैडिसन में प्रोफेसर और IceCube के प्रमुख वैज्ञानिक हैं। उनका जन्म 1944 में बेल्जियम के टिएनेन में हुआ था।

आखिर क्या हैं ये ‘भूतिया कण’?

न्यूट्रिनो ऐसे उप-परमाणु कण हैं जिन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता और उनका द्रव्यमान बेहद कम होता है। यही वजह है कि वे सामान्य पदार्थ के साथ बेहद कमजोर प्रतिक्रिया करते हैं।

ब्रह्मांड के अत्यंत ऊर्जावान क्षेत्रों से निकलने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो अंतरिक्ष की विशाल दूरियां तय करके पृथ्वी तक पहुंच सकते हैं।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि विद्युत आवेश न होने के कारण चुंबकीय क्षेत्र इनके रास्ते को आसानी से मोड़ नहीं पाते। इसलिए न्यूट्रिनो अपने स्रोत से हमारे पास लगभग सीधी जानकारी लेकर पहुंच सकते हैं।

यही गुण इन्हें ब्रह्मांड के उन हिस्सों का अध्ययन करने का अनोखा माध्यम बनाता है, जिन्हें केवल प्रकाश के जरिए समझना कठिन है।

नोबेल समिति के वैज्ञानिक संदर्भ के अनुसार न्यूट्रिनो लगातार पृथ्वी और हमारे शरीर से गुजरते रहते हैं, लेकिन बेहद कम अवसरों पर ही किसी परमाणु के साथ ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं जिसे वैज्ञानिक पकड़ सकें।

दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में कैसे बना दुनिया का अनोखा ‘टेलीस्कोप’?

फ्रांसिस हाल्जेन ने 1988 में एक असाधारण विचार सामने रखा—क्यों न दक्षिणी ध्रुव की विशाल और बेहद साफ बर्फ को न्यूट्रिनो पकड़ने वाले डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जाए?

यही विचार आगे चलकर IceCube Neutrino Observatory में बदल गया।

IceCube कोई पारंपरिक दूरबीन नहीं है। यह अंटार्कटिका की बर्फ के भीतर लगभग एक घन किलोमीटर क्षेत्र में फैला विशाल कण डिटेक्टर है।

इसमें हजारों डिजिटल ऑप्टिकल मॉड्यूल बर्फ के भीतर गहराई तक लगाए गए हैं। IceCube में कुल 5,160 Digital Optical Modules को 86 बोरहोल में स्थापित किया गया है।

जब कोई उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ में किसी परमाणु के साथ दुर्लभ प्रतिक्रिया करता है, तो उससे उत्पन्न आवेशित कण बर्फ में प्रकाश की बेहद क्षीण चमक पैदा कर सकते हैं। इस प्रकाश को चेरेनकोव विकिरण कहा जाता है।

IceCube के सेंसर इसी प्रकाश को रिकॉर्ड करते हैं। इसके बाद वैज्ञानिक उस संकेत का विश्लेषण करके यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि न्यूट्रिनो किस दिशा से आया, उसकी ऊर्जा कितनी थी और वह संभवतः किस ब्रह्मांडीय स्रोत से जुड़ा हो सकता है।

यानी जिस बर्फ को इंसान लंबे समय तक सिर्फ प्रकृति की कठोर परिस्थितियों के रूप में देखता रहा, वैज्ञानिकों ने उसी बर्फ को ब्रह्मांड की आवाज सुनने वाले उपकरण में बदल दिया।

2013 में आया वह ऐतिहासिक क्षण

IceCube की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में वर्ष 2013 की वह ऐतिहासिक खोज शामिल है, जब उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो का स्पष्ट प्रमाण सामने आया।

इन कणों की ऊर्जा इतनी अधिक थी कि इस खोज ने यह प्रमाणित करने में मदद की कि ब्रह्मांड में ऐसे प्राकृतिक ‘पार्टिकल एक्सेलेरेटर’ मौजूद हैं, जो अत्यंत ऊर्जावान कण पैदा कर सकते हैं।

यहीं से न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान को एक नई गति मिली।

1988 में सामने आया हाल्जेन का विचार आगे चलकर IceCube के रूप में विकसित हुआ और 2013 में इसने उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो के अवलोकन की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

अब तक ब्रह्मांड को समझने के लिए वैज्ञानिक मुख्य रूप से प्रकाश और अन्य विद्युतचुंबकीय संकेतों पर निर्भर रहे हैं। लेकिन न्यूट्रिनो एक अलग तरह के ब्रह्मांडीय संदेशवाहक हैं।

वे अत्यंत घनी और ऊर्जावान खगोलीय परिस्थितियों से निकलकर लगभग बिना दिशा बदले पृथ्वी तक पहुंच सकते हैं। इसलिए वे उन प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी दे सकते हैं, जिन्हें केवल प्रकाश के माध्यम से समझना कठिन है।

इसी वजह से न्यूट्रिनो को ‘कॉस्मिक मैसेंजर’ कहा जाता है।

आज वैज्ञानिक प्रकाश, गुरुत्वीय तरंगों, कॉस्मिक किरणों और न्यूट्रिनो जैसे अलग-अलग संदेशवाहकों को साथ लेकर ब्रह्मांड को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इस दृष्टिकोण को मल्टी-मैसेंजर एस्ट्रोनॉमी कहा जाता है।

IceCube ने इस नई दिशा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक हमारी आकाशगंगा और उससे बाहर के स्रोतों से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो का अध्ययन कर रहे हैं।

एक कण, जिसकी कहानी 1930 में शुरू हुई थी

न्यूट्रिनो की कहानी फ्रांसिस हाल्जेन से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।

वर्ष 1930 में वोल्फगैंग पाउली ने बीटा क्षय में ऊर्जा संरक्षण को समझाने के लिए एक अदृश्य कण की परिकल्पना की थी। बाद में एनरिको फर्मी ने इस कण के लिए ‘न्यूट्रिनो’ नाम का इस्तेमाल किया।

वर्ष 1956 में क्लाइड कोवान और फ्रेडरिक रेइन्स ने प्रयोग के माध्यम से न्यूट्रिनो के अस्तित्व का प्रमाण दिया। बाद में फ्रेडरिक रेइन्स को 1995 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

अब 2026 में इसी रहस्यमयी कण की ब्रह्मांडीय यात्रा को समझने की दिशा में निर्णायक योगदान के लिए फ्रांसिस हाल्जेन को नोबेल सम्मान मिला है।

यह विज्ञान की उस लंबी यात्रा की कहानी है जिसमें पहले एक कण की कल्पना हुई, फिर उसका अस्तित्व साबित हुआ और अंततः उसी कण को ब्रह्मांड के दूरस्थ और अत्यंत ऊर्जावान स्रोतों तक पहुंचने वाले संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया गया।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है IceCube की सफलता?

फ्रांसिस हाल्जेन की उपलब्धि भारत के विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश रखती है।

भारत लंबे समय से न्यूट्रिनो भौतिकी में अपनी बड़ी वैज्ञानिक परियोजना India-based Neutrino Observatory (INO) को लेकर काम करता रहा है। प्रस्तावित INO का उद्देश्य न्यूट्रिनो के अध्ययन के लिए भूमिगत प्रयोगशाला और डिटेक्टर सुविधाएं विकसित करना है।

IceCube और INO की वैज्ञानिक परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन दोनों यह दिखाते हैं कि न्यूट्रिनो जैसे बेहद दुर्लभ कणों को समझने के लिए प्राकृतिक संरचनाओं और अत्याधुनिक डिटेक्टर तकनीक का कितना महत्वपूर्ण उपयोग किया जा सकता है।

इस उपलब्धि से भारतीय युवा शोधकर्ताओं के सामने यह संदेश भी स्पष्ट होता है कि ब्रह्मांड के सबसे बड़े सवालों का जवाब पाने के लिए हमेशा सबसे चमकदार उपकरण की जरूरत नहीं होती। कई बार एक असाधारण वैज्ञानिक विचार ही पूरी दुनिया की दिशा बदल सकता है।

बर्फ से ब्रह्मांड तक—एक विचार जिसने विज्ञान बदल दिया

फ्रांसिस हाल्जेन की कहानी केवल एक नोबेल पुरस्कार की कहानी नहीं है।

यह एक ऐसे वैज्ञानिक विचार की कहानी है, जिसे कभी असंभव जैसा समझा जा सकता था—अंटार्कटिका की बर्फ के भीतर एक विशाल डिटेक्टर बनाकर उन कणों को पकड़ना, जो लगभग बिना किसी बाधा के पूरी पृथ्वी को पार कर जाते हैं।

लेकिन यही विचार आगे चलकर IceCube बना।

और IceCube ने वैज्ञानिकों को यह क्षमता दी कि वे ब्रह्मांड को केवल उसकी रोशनी से नहीं, बल्कि उसके सबसे रहस्यमयी कणों से भी पढ़ सकें।

वर्ष 2026 का भौतिकी नोबेल इसलिए भी खास है क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि ब्रह्मांड की सबसे बड़ी आवाजें हमेशा दिखाई नहीं देतीं।

कभी-कभी वे अरबों प्रकाश वर्ष दूर से आने वाले उन बेहद छोटे कणों में छिपी होती हैं, जिन्हें इंसान प्यार से ‘भूतिया कण’ कहता है।

और दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में लगे हजारों सेंसर अब उन्हीं अदृश्य संदेशों को पढ़ रहे हैं।

जमीनी आवाज | विशेष विज्ञान रिपोर्ट

खगोलविद अमर पाल सिंह की वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर।