सरायकेला : विजय कुमार गोप की रिपोर्ट


शिलान्यासों की चमक के बीच खुदियाडीह की 350 फीट सड़क की कहानी, सरकारी सड़क नहीं मिली तो आदिवासियों ने चंदा कर खुद बना डाली राह

चौका-ईचागढ़ मुख्य सड़क के किनारे बसा गांव, फिर भी बिजली-पानी-सड़क और स्कूल के लिए तरस रहे ग्रामीण

ग्रामीणों का आरोप—पंचायत फंड से स्वीकृत करीब 200 फीट पीसीसी सड़क गांव से हटाकर दूसरी जगह बनाई गई; वर्षों के इंतजार के बाद रोजी-रोटी की कमाई से चंदा कर बनाई 350 फीट सड़क

सरकार विकास की लंबी-लंबी बातें करती है। योजनाओं के शिलान्यास होते हैं, सड़क निर्माण की घोषणाएं होती हैं और गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के दावे किए जाते हैं। लेकिन सरायकेला-खरसावां जिले के चावलीबासा पंचायत के खुदियाडीह गांव पहुंचते ही विकास के इन दावों की जमीनी तस्वीर कई सवाल खड़े करती है।

चौका-ईचागढ़ मुख्य सड़क के किनारे बसे इस आदिवासी बहुल गांव के ग्रामीणों का कहना है कि वे आज भी सड़क, बिजली, पेयजल और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल गांव की सड़क को लेकर है।

ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत फंड से गांव के लिए करीब 200 फीट पीसीसी सड़क स्वीकृत हुई थी, लेकिन उसका निर्माण गांव में होने के बजाय दूसरी जगह कर दिया गया। वर्षों तक इंतजार और जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों से गुहार के बाद भी जब उन्हें अपेक्षित सड़क नहीं मिली तो ग्रामीणों ने सरकारी व्यवस्था का इंतजार छोड़ दिया।

ग्रामीणों ने अपनी रोजी-रोटी की कमाई से चंदा जुटाया और कंपनी से चारकोल खरीदकर करीब 350 फीट लंबी सड़क खुद बना डाली।

यह सिर्फ सड़क बनाने की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी है कि आखिर सरकारी विकास योजनाओं का लाभ उस गांव तक कब पहुंचेगा, जहां के लोग अपनी जरूरत की सड़क भी अपने पैसे से बनाने को मजबूर हो जाएं।

मुख्य सड़क के किनारे गांव, फिर भी अंदर जाने के लिए खुद बनानी पड़ी राह

खुदियाडीह गांव चौका-ईचागढ़ मुख्य मार्ग के बेहद करीब बसा है। इसके बावजूद गांव के अंदर बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी है।

ग्रामीणों के अनुसार गांव में बिजली की स्थिति संतोषजनक नहीं है। पेयजल की समस्या भी बनी हुई है। सड़क की स्थिति बरसात के दौरान और खराब हो जाती है, जिससे आवागमन में ग्रामीणों को परेशानी होती है।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों के समक्ष समस्याएं रखीं। सड़क निर्माण को लेकर आश्वासन भी मिले, लेकिन उनके मुताबिक धरातल पर अपेक्षित समाधान नहीं हो सका।

ग्रामीणों के अनुसार ईचागढ़ की विधायक सविता महतो के स्तर से क्षेत्र में कई सड़क योजनाओं के शिलान्यास और निर्माण की घोषणाएं हुई हैं। वर्ष 2026 में भी क्षेत्र में विभिन्न सड़क योजनाओं के शिलान्यास की खबरें सामने आई हैं।

लेकिन खुदियाडीह के ग्रामीणों का सवाल है—इन विकास योजनाओं की रोशनी उनके गांव तक कब पहुंचेगी?

विधायक के शिलान्यास से जगी उम्मीद, लेकिन ग्रामीणों की राह अब भी अधूरी

ग्रामीणों के अनुसार विधायक सविता महतो ने उनके गांव से संबंधित सड़क का शिलान्यास भी किया था और स्थल का निरीक्षण किया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि दो बार विधायक बनने के बावजूद उनके गांव की सड़क और अन्य बुनियादी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सका।

यह ग्रामीणों का आरोप है। इस संबंध में संबंधित जनप्रतिनिधि और विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है।

लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है—अगर किसी गांव के लोगों को अपनी मजदूरी और रोजी-रोटी की कमाई से सड़क बनाने के लिए चंदा जुटाना पड़े, तो सरकारी विकास योजनाओं की पहुंच पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्कूल था, विलय हुआ और अब बच्चों को मुख्य सड़क पार कर जाना पड़ता है

खुदियाडीह की समस्या केवल सड़क तक सीमित नहीं है। शिक्षा को लेकर भी ग्रामीणों में चिंता है।

ग्रामीणों के मुताबिक सर्व शिक्षा अभियान के तहत गांव में नव प्राथमिक विद्यालय खोला गया था। बाद में विद्यालय का विलय कर दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में गांव में करीब 5 से 12 वर्ष की उम्र के 35 से 40 बच्चे हैं।

स्कूल के विलय के बाद बच्चों को पढ़ाई के लिए करीब डेढ़ से दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि बच्चों को पढ़ने जाने के दौरान चौका-पातकुम मुख्य सड़क पार करनी पड़ती है।

ग्रामीणों का सवाल है कि जब गांव में पर्याप्त संख्या में बच्चे मौजूद हैं, तो उनके लिए नजदीकी विद्यालय की व्यवस्था क्यों नहीं है?

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि प्रखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे विद्यालय हैं जहां विद्यार्थियों की संख्या कम होने के बावजूद विद्यालय संचालित हैं। ऐसे में खुदियाडीह के विद्यालय के विलय को लेकर ग्रामीणों में असंतोष है।

शिलान्यास और जमीन की हकीकत के बीच कितना फासला?

सरकारी सड़क किसी गांव के लिए सिर्फ आवागमन का साधन नहीं होती। सड़क के साथ बच्चों की शिक्षा, मरीजों की अस्पताल तक पहुंच, बाजार, रोजगार और प्रशासन तक पहुंच भी जुड़ी होती है।

खुदियाडीह में ग्रामीणों की तस्वीर इसीलिए व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल खड़ा करती है।

एक तरफ इलाके में सड़क योजनाओं के शिलान्यास और विकास के दावे सामने आते हैं, दूसरी तरफ एक छोटा आदिवासी गांव अपनी रोजमर्रा की जरूरत के रास्ते के लिए ग्रामीणों के चंदे पर निर्भर दिखाई देता है।

कागज पर कितनी योजनाएं स्वीकृत हुईं और कितनी पूरी हुईं, इसका जवाब सरकारी रिकॉर्ड देगा। लेकिन खुदियाडीह में ग्रामीणों द्वारा खुद बनाई गई करीब 350 फीट सड़क विकास की जमीनी तस्वीर जरूर सामने रखती है| 

जमीनी आवाज का सवाल

क्या प्रशासन खुदियाडीह गांव की सड़क, बिजली, पेयजल और शिक्षा से जुड़ी समस्याओं की स्थायी जांच कराएगा?

क्या ग्रामीणों के उस आरोप की जांच होगी कि स्वीकृत करीब 200 फीट पीसीसी सड़क का निर्माण गांव से हटाकर दूसरी जगह कराया गया?

और क्या स्कूल विलय के बाद मुख्य सड़क पार कर पढ़ने जाने वाले बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा की समस्या का स्थायी समाधान होगा?

ग्रामीणों ने प्रशासन से गांव में सड़क, बिजली, पेयजल और शिक्षा की सुविधा सुनिश्चित कराने की मांग की है।

मौके पर अनिल बास्के, सोमचंद बास्के, रमेश हांसदा, समल सोरेन, फूलचंद टुडू, डेनियल मुर्मू, श्यामल हांसदा, रबींद्र सोरेन समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।

जमीनी आवाज का सवाल साफ है—शिलान्यास की तस्वीर से आगे बढ़कर क्या अब खुदियाडीह के लोगों को विकास की वास्तविक सड़क मिलेगी?