कांदरबेड़ा-दोमुहानी सड़क परियोजना पर बड़ा सवाल
कांदरबेड़ा से दोमुहानी तक करीब 7.996 किलोमीटर फोरलेन सड़क परियोजना अब सिर्फ एक सड़क का मामला नहीं रह गई है। यह सरकारी व्यवस्था, विभागीय निगरानी, राजनीतिक जवाबदेही और जनता के पैसे के इस्तेमाल पर बड़ा सवाल बनती जा रही है।

परियोजना की प्रशासनिक स्वीकृति करीब ₹101.07 करोड़ बताई गई है। उपलब्ध सरकारी प्रगति संबंधी आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2025 में भौतिक प्रगति करीब 18 प्रतिशत थी, जबकि अप्रैल 2026 तक यह बढ़कर महज 22 प्रतिशत दर्ज हुई। दूसरी ओर, परियोजना की निर्धारित पूर्णता तिथि 24 मार्च 2026 बीत चुकी है।
सवाल सीधा है—समय सीमा खत्म होने के बाद भी अगर सड़क का काम 22 प्रतिशत के आसपास है, तो आखिर इसकी निगरानी कौन कर रहा था? विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने इसी मुद्दे को लेकर सरकार और सड़क निर्माण विभाग पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जनता को शिलान्यास, घोषणा और फाइलों में करोड़ों रुपये की योजनाएं नहीं चाहिए, जनता को जमीन पर सड़क चाहिए।
₹101 करोड़ की योजना, लेकिन सड़क का काम इतना पीछे क्यों?
यह परियोजना कोई अचानक सामने आई योजना नहीं है। दिसंबर 2023 में राज्य सरकार द्वारा कांदरबेड़ा-दोमुहानी सड़क को फोरलेन में बदलने के लिए करीब ₹106 करोड़ की स्वीकृति की खबर सामने आई थी। बाद में परियोजना के क्रियान्वयन और लागत को लेकर करीब ₹101 करोड़ के आंकड़े सामने आए। 2024 में परियोजना के काम शुरू होने और लगभग 16 महीने में पूरा किए जाने की बात सामने आई थी।
तो फिर सवाल यह है—अगर समय सीमा तय थी, तो समय पर काम क्यों नहीं हुआ? अगर काम धीमा था, तो विभाग ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? अगर संवेदक जिम्मेदार था, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? और सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकारी परियोजनाओं में तारीखें सिर्फ कागज पर तय होती हैं?
काम 22 प्रतिशत, लेकिन जवाबदेही कितने प्रतिशत?
राकेश रंजन महतो ने सरकार और विभाग से पूछा है कि परियोजना में अब तक कितना भुगतान हुआ है और उस भुगतान के मुकाबले जमीन पर कितना काम हुआ है। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी निर्माण परियोजना में भुगतान, मापी, बिल, गुणवत्ता जांच और भौतिक प्रगति—इन सभी का रिकॉर्ड होना चाहिए। जनता जानना चाहती है:
- अब तक संवेदक को कुल कितनी राशि का भुगतान हुआ?
- किस-किस कार्य के लिए भुगतान किया गया?
- भुगतान के समय वास्तविक भौतिक प्रगति कितनी थी?
- मापी पुस्तिका में कितना काम दर्ज किया गया?
- गुणवत्ता की जांच किस अधिकारी या एजेंसी ने की?
- समय विस्तार दिया गया या नहीं, और यदि दिया गया तो उसका आधार क्या है?
- देरी के लिए संवेदक पर जुर्माना या अन्य कार्रवाई हुई या नहीं?
इन सवालों का जवाब फाइलों में नहीं, सार्वजनिक रूप से मिलना चाहिए।
कमीशनखोरी की चर्चा है तो जांच क्यों नहीं?
क्षेत्र में सरकारी सड़क परियोजनाओं को लेकर कमीशन और भुगतान संबंधी चर्चाएं होना अपने आप में किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी साबित नहीं करता। लेकिन जब किसी करोड़ों की परियोजना में समय सीमा समाप्त हो जाए और काम अपेक्षित गति से काफी पीछे रह जाए, तब भुगतान, मापी, गुणवत्ता और विभागीय निगरानी की स्वतंत्र जांच की मांग को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
राकेश रंजन महतो का सवाल है—"अगर पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है तो भुगतान का पूरा हिसाब जनता के सामने रखने में परेशानी क्या है?" यही वह बिंदु है जहां सरकार को बयान नहीं, दस्तावेज सामने रखने चाहिए।
अधिकारी सिर्फ फाइल देखेंगे या सड़क भी?
सरकारी विभागों में योजनाएं स्वीकृत होती हैं, टेंडर निकलते हैं, एग्रीमेंट होते हैं, मापी होती है और भुगतान की प्रक्रिया चलती है। लेकिन जनता के लिए अंतिम सवाल सिर्फ एक है—सड़क बनी या नहीं? यदि सड़क की भौतिक प्रगति समय सीमा खत्म होने के बाद भी केवल 22 प्रतिशत है, तो विभागीय निगरानी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या अधिकारियों ने नियमित स्थल निरीक्षण किया? क्या संवेदक को समय पर नोटिस दिया गया? क्या कार्य की गति बढ़ाने के लिए निर्देश जारी हुए? क्या विलंब के कारणों की रिपोर्ट तैयार हुई? और यदि सब कुछ नियम के अनुसार हुआ, तो 22 प्रतिशत प्रगति की स्थिति तक पहुंचने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
नेता भी सवालों से बाहर क्यों?
सड़क जनता के बीच से गुजरती है, लेकिन उसकी फाइलें दफ्तरों में रहती हैं। चुनाव के दौरान सड़क विकास का मुद्दा जोर पकड़ता है। शिलान्यास के समय मंच सजता है, भाषण होते हैं और विकास के दावे किए जाते हैं। लेकिन जब महीनों तक काम जमीन पर दिखाई नहीं देता, तब वही जनता फिर अधिकारियों और नेताओं के चक्कर काटती है।
सवाल यह भी है—क्या जनप्रतिनिधियों ने परियोजना की प्रगति की नियमित समीक्षा की? क्या किसी ने पूछा कि निर्धारित समय सीमा तक काम कितना हुआ? क्या किसी ने भुगतान और भौतिक प्रगति का सार्वजनिक हिसाब मांगा? अगर जनता को हर छोटी समस्या के लिए नेता और अधिकारी के दरवाजे पर जाना पड़े, तो फिर करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं की निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है?
जनता भी कब तक नेताओं और अधिकारियों के पीछे दौड़ती रहेगी?
यह कहानी सिर्फ सरकार और विभाग की नहीं है। जनता की भी अपनी जिम्मेदारी है। जब सड़क खराब होती है तो लोग आवाज उठाते हैं। जब काम रुकता है तो प्रतिनिधियों के पीछे जाते हैं। लेकिन करोड़ों की परियोजनाओं की प्रगति पर लगातार निगरानी रखने, दस्तावेज मांगने और सार्वजनिक जवाबदेही तय कराने के लिए कितने लोग आगे आते हैं?
लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने वाली भीड़ नहीं है। जनता सरकारी पैसे की असली मालिक है। जिस पैसे से सड़क बन रही है, वह जनता के ही टैक्स और सार्वजनिक धन से आता है। इसलिए सवाल पूछना किसी नेता या अधिकारी पर एहसान नहीं—जनता का अधिकार है।
अब सवाल सड़क का नहीं, सिस्टम का है
कांदरबेड़ा-दोमुहानी सड़क परियोजना के आंकड़े अब कई सवाल एक साथ खड़े कर रहे हैं: ₹101 करोड़ की स्वीकृति, करीब आठ किलोमीटर की सड़क, निर्धारित समय सीमा समाप्त और उपलब्ध प्रगति आंकड़ों में करीब 22 प्रतिशत भौतिक काम।
अब सरकार को यह बताना होगा कि देरी की असली वजह क्या है। यदि संवेदक दोषी है तो कार्रवाई क्या हुई? यदि विभागीय निगरानी में कमी है तो जिम्मेदार अधिकारी कौन है? यदि भूमि, वन या अन्य स्वीकृतियों की समस्या है तो उसे कब तक दूर किया जाएगा? और यदि भुगतान नियमों के अनुसार हुआ है तो उसका पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
ईचागढ़ को भाषण नहीं, सड़क चाहिए
राकेश रंजन महतो ने मांग की है कि कांदरबेड़ा-दोमुहानी सड़क परियोजना की भौतिक प्रगति, वित्तीय प्रगति, भुगतान, मापी, गुणवत्ता जांच, समय विस्तार और देरी के कारणों को सार्वजनिक किया जाए तथा जिम्मेदारी तय की जाए। यह मांग सिर्फ एक राजनीतिक बयान के रूप में नहीं, बल्कि सरकारी जवाबदेही के सवाल के रूप में देखी जानी चाहिए।
क्योंकि अंततः जनता का सवाल बेहद साधारण है—सड़क के नाम पर करोड़ों रुपये स्वीकृत हुए हैं, तो सड़क जमीन पर कब दिखाई देगी? और उससे भी बड़ा सवाल—अगर सरकार समय पर काम नहीं करा सकती, विभाग निगरानी नहीं कर सकता और जनप्रतिनिधि सवाल नहीं उठा सकते, तो फिर जनता आखिर किसके दरवाजे पर जाए?
अब ईचागढ़ की जनता को सिर्फ शिलान्यास की तस्वीर नहीं चाहिए। उसे सड़क चाहिए, काम की रफ्तार चाहिए और अपने पैसे का पूरा हिसाब चाहिए।





