विलुप्त हो रहा लोधा समाज! याद आई बिरहोरों की कहानी...
PVTG का दर्जा, योजनाओं की भरमार फिर भी जंगल, जमीन, रोजगार और पहचान के संकट में लोधा समुदाय
जंगलमहल.... असित भट्टाचार्य की विशेष रिपोर्ट
जिस समाज ने सदियों तक जंगल को अपना घर, जंगल की उपज को अपना रोजगार और प्रकृति को अपनी पहचान बनाया, आज वही लोधा समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। सरकारी दस्तावेजों में यह समुदाय PVTG यानी Particularly Vulnerable Tribal Group—विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की लंबी सूची मौजूद है। लेकिन सवाल यह है कि इन योजनाओं का वास्तविक असर लोधा बस्तियों तक कितना पहुंचा?

जमीनी आवाज की यह खोजी रिपोर्ट इसी सवाल की पड़ताल करती है।
इतिहास में मिला कलंक, आज भी पीछा नहीं छोड़ रहा सवाल
लोधा समाज का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान इस समुदाय को Criminal Tribes Act के तहत कलंकित किया गया था। 1952 में इस कानून के समाप्त होने के बाद लोधाओं को विमुक्त जनजाति की पहचान मिली और बाद में उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ।
कानून बदला, पहचान बदली, सरकारी दस्तावेज बदले—लेकिन सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
पुराना कलंक इतिहास का हिस्सा बन गया, लेकिन उसके प्रभाव से निकलने में समाज को लंबा समय लगा।
जंगल ही जीवन था, जंगल घटे तो रोजगार भी घट गया
लोधा समुदाय की पारंपरिक जिंदगी जंगल से गहराई से जुड़ी रही है। जंगल से लकड़ी, कंद-मूल, जड़ी-बूटियां और दूसरी वन उपज जुटाकर परिवारों का जीवन चलता था।
लेकिन जंगलों का लगातार सिकुड़ना, वन कानूनों और संसाधनों पर बढ़ता नियंत्रण तथा बदलती आर्थिक परिस्थितियों ने इस पारंपरिक जीवन-व्यवस्था को कमजोर कर दिया।
आज बड़ी संख्या में परिवार कृषि मजदूरी, दैनिक मजदूरी और मौसमी रोजगार पर निर्भर हैं।

सवाल सीधा है—जिस समुदाय की अर्थव्यवस्था जंगल पर टिकी थी, जब जंगल ही कम होते गए तो उसके लिए स्थायी वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था किसने की?
PVTG का दर्जा—लेकिन क्या जमीन पर बदली जिंदगी?
लोधा समाज को PVTG की श्रेणी में रखना इस बात को स्वीकार करता है कि यह समुदाय विशेष संरक्षण और लक्षित विकास का हकदार है।
केंद्र सरकार की PM-JANMAN योजना का उद्देश्य PVTG समुदायों तक पक्के आवास, पेयजल, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और आजीविका जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना है।
पश्चिम बंगाल में PVTG समुदायों की सैकड़ों बस्तियां और हजारों परिवार चिन्हित किए गए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 तक 418 PVTG गांवों में जलापूर्ति की मंजूरी थी, लेकिन इनमें 86 गांवों को ही उस समय पूर्ण रूप से संतृप्त बताया गया।
यहीं से बड़ा सवाल उठता है—योजना स्वीकृत होना और सुविधा का घर तक पहुंचना—क्या दोनों एक ही बात हैं?
कागज पर स्वीकृति विकास की शुरुआत हो सकती है, लेकिन गांव के लिए विकास तब है जब पानी घर तक पहुंचे, सड़क चलने लायक हो, बिजली जले और परिवार को स्थायी आजीविका मिले।
सरकारी योजनाओं की लंबी सूची, लेकिन जमीन पर कितनी रोशनी?
लोधा समुदाय के लिए केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार की कई योजनाएं हैं।
पक्का आवास।
नल से जल।
बिजली।
सड़क।
स्वास्थ्य सुविधाएं।
पोषण योजनाएं।
राशन।
शिक्षा।
आजीविका।
महिलाओं और बच्चों के लिए विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाएं।

पश्चिम बंगाल सरकार ने West Bengal Lodha Sabar Development Board का गठन भी किया है, जिसका उद्देश्य समुदाय के समग्र और टिकाऊ विकास से जुड़ा है।
लेकिन योजनाओं की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका वास्तविक लाभ।
क्योंकि किसी गरीब परिवार के लिए योजना का मतलब सरकारी फाइल नहीं—घर की छत, चूल्हे का भोजन, बच्चे की पढ़ाई, बीमारी में इलाज और हाथ में रोजगार है।
कागज पूछता है—योजना स्वीकृत है।
जमीन पूछती है—लाभ कहां है?
यही वह दूरी है जिसे जमीनी आवाज अपनी रिपोर्ट में तलाशना चाहता है।
शिक्षा का संकट—अगली पीढ़ी का भविष्य दांव पर
दूरदराज जंगल और ग्रामीण इलाकों में रहने के कारण शिक्षा तक पहुंच लोधा समाज के सामने लंबे समय से चुनौती रही है।
गरीबी के कारण बच्चे कई बार पढ़ाई के बजाय परिवार की आर्थिक मदद करने को मजबूर होते हैं। दूसरी ओर आधुनिक शिक्षा और रोजगार की जरूरत बढ़ रही है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोधा समाज के बच्चे आगे बढ़ें भी और अपनी भाषा, संस्कृति, लोकगीत तथा पारंपरिक ज्ञान से कटें भी नहीं।
क्योंकि किसी समुदाय का विकास तभी पूर्ण माना जाता है जब उसकी आर्थिक स्थिति सुधरे और उसकी सांस्कृतिक पहचान भी सुरक्षित रहे।
स्वास्थ्य और पोषण—गरीबी का सबसे गंभीर चेहरा
अत्यधिक गरीबी का सबसे सीधा असर भोजन और स्वास्थ्य पर पड़ता है।
दूरदराज की बस्तियों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, पोषण, मातृ स्वास्थ्य और बच्चों की चिकित्सा जैसी समस्याएं गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
कागज पर स्वास्थ्य योजनाएं मौजूद हैं।
लेकिन सवाल यह है—क्या जरूरत पड़ने पर डॉक्टर गांव तक पहुंचता है? क्या गर्भवती महिला को समय पर इलाज मिलता है? क्या बच्चे को पर्याप्त पोषण मिलता है? क्या गंभीर बीमारी में परिवार को समय पर अस्पताल तक पहुंचने की सुविधा मिलती है?
PVTG समाज के लिए स्वास्थ्य सुविधा सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि अस्तित्व से जुड़ा सवाल है।
रोजगार की तलाश में पलायन, पीछे छूटती संस्कृति
स्थायी रोजगार के अवसरों की कमी के कारण युवाओं का शहरों की ओर पलायन बढ़ना भी लोधा समाज के सामने चुनौती है।
शहर उन्हें मजदूरी दे सकता है। लेकिन क्या शहर उनकी भाषा बचा पाएगा? क्या उनके लोकगीत बचेंगे? क्या जंगल से जुड़ा पारंपरिक औषधीय ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुंचेगा? क्या उनकी पारंपरिक जीवनशैली जीवित रहेगी?
जब युवा अपनी बस्ती से दूर होंगे और लगातार आधुनिक जीवन के संपर्क में आएंगे, तो आर्थिक बदलाव के साथ सांस्कृतिक बदलाव भी तेज होगा।
यही वजह है कि लोधा समाज के सामने संकट केवल गरीबी का नहीं, पहचान का भी है।
विलुप्ति का खतरा सिर्फ आबादी का नहीं होता
किसी समाज के विलुप्त होने का अर्थ सिर्फ यह नहीं कि उसके लोग पूरी तरह समाप्त हो जाएं।
कई बार कोई समुदाय अपनी भाषा खो देता है। अपना पारंपरिक ज्ञान खो देता है। अपने लोकगीत खो देता है। अपनी जीवनशैली खो देता है। अपनी सामाजिक पहचान खो देता है।
और अंततः उसकी अलग सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है।
लोधा समाज आज इसी चिंता के घेरे में खड़ा दिखाई देता है।
इसलिए सवाल सिर्फ आबादी का नहीं है। सवाल है—क्या लोधा समाज अपनी पहचान के साथ आने वाली पीढ़ी तक पहुंच पाएगा?

बिरहोर की कहानी फिर क्यों याद आ रही है?
करीब तीन दशक पहले बिरहोर समाज की बदहाली पर लिखी गई रिपोर्ट ने समाज का ध्यान उस समुदाय की ओर खींचा था, जो विकास की मुख्यधारा से दूर रह गया था।
आज लोधा समाज को देखकर वही सवाल फिर सामने खड़ा है।
समय बदल गया। सरकारें बदलीं। योजनाओं के नाम बदले। बजट बढ़े। घोषणाएं बढ़ीं।
लेकिन सबसे कमजोर समुदायों की जिंदगी में बदलाव की रफ्तार क्या पर्याप्त रही?
यही जांच का विषय है।
सरकार से जमीनी आवाज के सीधे सवाल
लोधा समाज की वास्तविक स्थिति पर सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए—
कितने लोधा परिवारों के पास अपनी जमीन है?
कितने परिवार आज भी मजदूरी पर निर्भर हैं?
कितने परिवारों को PM-JANMAN के तहत आवास मिला?
कितने घरों में नियमित पेयजल पहुंचा?
कितनी बस्तियों तक पक्की सड़क पहुंची?
कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला?
कितने बच्चे उच्च शिक्षा तक पहुंच पाए?
लोधा भाषा, लोकगीत, पारंपरिक चिकित्सा और सांस्कृतिक ज्ञान को बचाने के लिए क्या ठोस कार्यक्रम चल रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल—PVTG का विशेष दर्जा देने के बाद क्या सरकार ने सिर्फ योजनाएं गिनी हैं, या लोधा परिवारों की जिंदगी भी गिनी है?
जमीनी आवाज रखेगा लगातार नजर
यह रिपोर्ट किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। यह उस व्यवस्था से सवाल है जो सबसे कमजोर समुदायों के विकास के लिए योजनाएं बनाती है और फिर उन योजनाओं की वास्तविक जमीन तक पहुंच की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था की होती है।
लोधा समाज को सिर्फ आंकड़ा नहीं समझा जा सकता।
यह एक जीवित समाज है। इसकी अपनी संस्कृति है। अपना इतिहास है। अपनी भाषा और परंपराएं हैं। और सबसे महत्वपूर्ण—जीने और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अधिकार है।
अगर आज इस समाज की समस्याओं को गंभीरता से नहीं देखा गया, तो आने वाली पीढ़ी सिर्फ यह पूछेगी कि—जिस समाज के लिए इतनी योजनाएं बनीं, वह फिर भी पीछे क्यों रह गया?
जमीनी आवाज इस सवाल को यहीं नहीं छोड़ेगा।
हम लोधा बस्तियों तक जाएंगे। योजनाओं के कागज और जमीन की हकीकत को मिलाएंगे।
देखेंगे—योजना कहां बनी? पैसा कहां गया? काम कहां हुआ? लाभ किसे मिला?
और सबसे बड़ा सवाल—जिसके नाम पर विकास हुआ, उसकी जिंदगी कितनी बदली?
जमीनी आवाज की नजर अब लोधा समाज पर बनी रहेगी।





