चीन जब तक बनारस में न घुसे, तब तक भारत में घुसपैठ कैसे मानी जाए?


 अरुणाचल की सीमा से उठते सवालों के बीच व्यंग्य का एक सीधा प्रश्न—क्या देश की सुरक्षा का पैमाना अब भी वही है, जो सत्ता की सुविधा के अनुकूल हो?

 पर क्या हुआ, इसकी निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाब चाहिए; देशभक्ति के नारों से न सीमा सुरक्षित होती है, न सवालों का जवाब मिलता है।

जमीनी आवाज | विशेष व्यंग्यात्मक संपादकीय

संपादक एवं प्रधान संपादक: असित भट्टाचार्य

चीन को भारत में घुसने के लिए अब बनारस का रास्ता क्यों चुनना चाहिए?

चाय गरम रखिए साहब! आज बात देश की सीमा की है, राष्ट्रीय सुरक्षा की है और उस राजनीतिक चश्मे की भी, जिसे पहन लेने के बाद कुछ लोगों को हर सवाल में साजिश और हर असुविधाजनक खबर में देशविरोध दिखाई देने लगता है।

व्यंग्य की दुनिया में एक नया नियम बना दिया जाए तो कैसा रहेगा?

चीन जब तक बनारस में घुसकर प्रधानमंत्री से मुलाकात न कर ले, तब तक उसे भारत में घुसा हुआ मानने की जरूरत ही क्या है?

हो सकता है चीन के सैनिक अरुणाचल प्रदेश के रास्ते आ रहे हों! हो सकता है उनका इरादा सीमा पार करके बनारस पहुंचने का हो! और क्या पता, वे प्रधानमंत्री से मिलने के लिए कोई विशेष प्रतिनिधिमंडल लेकर ही निकल पड़े हों!


बेशक, यह व्यंग्य है, कोई वास्तविक घटना का दावा नहीं।

लेकिन सवाल गंभीर है। अगर देश की सीमा से जुड़ी किसी खबर पर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब तथ्यों से मिलना चाहिए या राजनीतिक बचाव की आवाज इतनी तेज कर दी जाए कि सवाल सुनाई ही न दें?

सीमा पर सवाल और सियासत में जवाबदेही का संकट

अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। उसकी सीमा पर किसी भी प्रकार की घुसपैठ या सैन्य गतिविधि की खबर सामने आती है, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन खबर की पुष्टि, वास्तविक स्थिति और सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना भी उतना ही जरूरी है।

आखिर सीमा पर तैनात जवान किसलिए हैं? देश की सुरक्षा के लिए! और सरकार किसलिए है? देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने, खतरों का आकलन करने और जनता को आवश्यक जानकारी देने के लिए।

जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है—यदि सीमा पर कोई गंभीर घटना हुई है, तो उसकी वास्तविक स्थिति क्या है? क्या संबंधित एजेंसियों ने जांच की है? सरकार का आधिकारिक पक्ष क्या है?

इन सवालों को पूछना देश के खिलाफ होना नहीं है। बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी का हिस्सा है।

मगर हमारी राजनीतिक बहस का दुर्भाग्य देखिए। कई बार सवाल सीमा पर खड़े होते हैं और जवाब राजनीतिक मंच पर दिए जाते हैं। चर्चा घुसपैठ की होनी चाहिए, लेकिन बहस इस बात पर पहुंच जाती है कि सवाल पूछने वाला किस पक्ष का समर्थक है।

वाह रे राजनीति! सीमा पर खतरे की खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया कि सवाल किसने पूछा!

देशभक्ति का प्रमाणपत्र और सवाल पूछने का अपराध

देशभक्ति क्या केवल नारे लगाने का नाम है? क्या देश से प्रेम करने वाला नागरिक अपनी सरकार से जवाब नहीं मांग सकता? क्या सीमा की सुरक्षा पर सवाल उठाने के लिए किसी राजनीतिक दल की अनुमति लेनी पड़ेगी?

यदि कोई सरकार अच्छा काम करती है, तो उसकी प्रशंसा होनी चाहिए। यदि कहीं चूक होती है, तो उसकी जांच भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों का सम्मान और उसकी जवाबदेही की मांग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

लेकिन जब राजनीतिक समर्थन इतना गहरा हो जाए कि अपने पक्ष की हर बात सही और दूसरे पक्ष का हर सवाल गलत लगने लगे, तब समस्या केवल राजनीति की नहीं रहती। समस्या उस सोच की हो जाती है, जो देश और सरकार के बीच का अंतर भूलने लगती है।

देश सरकार से बड़ा है। देश की सुरक्षा किसी दल की प्रतिष्ठा से बड़ी है। और सीमा पर तैनात जवानों का सम्मान राजनीतिक बहस का हथियार नहीं, राष्ट्रीय जिम्मेदारी का विषय है।

यदि चीन से जुड़ी किसी खबर में सच्चाई है, तो सरकार को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि खबर भ्रामक है, तो उसका खंडन भी प्रमाण के साथ होना चाहिए।

सिर्फ यह कह देना कि सवाल पूछने वाले देश का भला नहीं चाहते, किसी समस्या का समाधान नहीं है।

चीन को बनारस पहुंचने की जरूरत नहीं, जवाब सीमा पर चाहिए!

हमारे व्यंग्य का असली निशाना चीन नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जो गंभीर सवालों को भी राजनीतिक सुविधा के तराजू पर तौलने लगती है।

चीन को बनारस तक आने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। भारत की सीमा जहां है, सुरक्षा की जिम्मेदारी भी वहीं से शुरू होती है।

देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी सीमाएं सुरक्षित हैं या नहीं। सीमा पर कोई घटना हुई है तो उसका विवरण क्या है। और यदि सोशल मीडिया या समाचार माध्यमों में कोई अपुष्ट दावा फैल रहा है, तो उसकी सच्चाई क्या है।

इसका जवाब न नारों से मिलेगा, न तंज कसकर सवाल पूछने वालों को चुप कराने से और न ही हर आलोचना को राजनीतिक दुश्मनी बताने से।

जवाब मिलेगा तथ्यों से, पारदर्शिता से और जिम्मेदार कार्रवाई से।

और हां, अगर कभी चीन के सैनिक सचमुच बनारस पहुंचने की कोशिश करें, तो उस पर व्यंग्य लिखने के बजाय देश को यह जानना ज्यादा जरूरी होगा कि सीमा से बनारस तक पहुंचने की नौबत आई ही कैसे!

तब तक सवाल पूछने दीजिए। खबरों की जांच होने दीजिए। सरकार को अपना पक्ष रखने दीजिए। और जनता को तथ्यों के आधार पर राय बनाने दीजिए।

क्योंकि लोकतंत्र में नागरिकों को केवल तालियां बजाने के लिए नहीं चुना गया है।

जमीनी आवाज का सवाल

अगर सीमा पर घुसपैठ की खबर गलत है, तो उसका प्रमाण सामने रखिए। अगर खबर सही है, तो स्थिति स्पष्ट कीजिए। और अगर जांच चल रही है, तो जनता को बताइए कि सच्चाई सामने लाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

देश को न अंधभक्ति चाहिए, न अंधविरोध। देश को चाहिए तथ्य, जवाबदेही और सुरक्षित सीमाएं।

चीन कहां तक पहुंचा, यह जांच का विषय है; लेकिन सवाल पूछने वाले की देशभक्ति पर फैसला सुनाने से पहले तथ्यों का सामने आना जरूरी है।

जमीनी आवाज कहती है—सीमा की रक्षा जवानों के साहस से होती है, सरकार की जवाबदेही से मजबूत होती है और जनता की जागरूकता से लोकतंत्र सुरक्षित रहता है।

खबरें जमीन की, जमाने की।

— असित भट्टाचार्य

संपादक एवं प्रधान संपादक, जमीनी आवाज