दूसरों के एक बयान पर नैतिकता का पहाड़ खड़ा करने वालों को अपने खेमे की बयानबाजी क्यों नहीं दिखाई देती? सत्ता की सुविधा के हिसाब से बदल जाती है क्या मर्यादा की परिभाषा?
विपक्ष को कमजोर समझने की भूल मत कीजिए! सत्ता का अहंकार जब जनता के सवालों से टकराता है, तब कुर्सी के सबसे मजबूत पाये भी हिलने लगते हैं।
जमीनी आवाज | विशेष व्यंग्यात्मक संपादकीय
असित भट्टाचार्य की कलम से
वाह रे राजनीति! अपनी बारी में चुप्पी, दूसरे की बारी में नैतिकता की सुनामी!
राजनीति का भी अपना अलग न्यायशास्त्र है। अपना आदमी बोले तो बयान का संदर्भ देखिए, विरोधी बोले तो चरित्र का प्रमाणपत्र मांगिए! अपने खेमे की जुबान फिसले तो उसे भावनाओं की अभिव्यक्ति बताइए और विपक्ष की जुबान से कोई शब्द निकल जाए तो लोकतंत्र, संस्कार, संस्कृति और मर्यादा—सभी को खतरे में घोषित कर दीजिए!
गजब का राजनीतिक गणित है साहब!
एक तरफ किसी के दिवंगत पिता का उल्लेख होते ही नैतिकता की पूरी पाठशाला खुल जाती है। दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन में महिलाओं, विरोधियों और उनके परिवारों को लेकर की गई विवादित टिप्पणियों पर वही नैतिकता अचानक छुट्टी पर चली जाती है।

जब विपक्ष कुछ कहे तो सवाल—राजनीति का स्तर इतना नीचे कैसे गिर गया?
जब सत्ता पक्ष के किसी नेता की टिप्पणी विवादों में आए तो जवाब—बयान को संदर्भ से काटकर मत देखिए!
अरे भाई, संदर्भ का चश्मा दोनों आंखों पर लगाइए! लोकतंत्र में नैतिकता कोई ऐसी सरकारी योजना नहीं है जिसका लाभ केवल विपक्ष को मिले और सत्ता पक्ष के लिए अलग नियमावली जारी हो जाए।
मर्यादा का पैमाना एक ही होना चाहिए। अपनी तरफ हो या विपक्ष की तरफ—गलत बात गलत और सही बात सही!
लेकिन समस्या यह है कि सत्ता का चश्मा लगते ही कई बार अपने पक्ष की गलतियां भी उपलब्धियों जैसी दिखाई देने लगती हैं। फिर विपक्ष का हर सवाल साजिश, हर विरोध राजनीति और हर आलोचना राष्ट्रविरोध का प्रमाणपत्र बांटने का अवसर बन जाती है।
यहीं से लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।
सत्ता पक्ष को आईना दिखाने वाला विपक्ष चाहिए, आरती उतारने वाला नहीं!
सत्ता पक्ष को यदि केवल प्रशंसा सुननी है, तो फिर विपक्ष की जरूरत ही क्या है? संसद में सवाल पूछने वाले भी सत्ता की तारीफ करें, सड़क पर विरोध करने वाले भी तालियां बजाएं और जनता महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी जवाबदेही पर सवाल उठाने से पहले अनुमति ले!
फिर तो लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक दरबार चलाइए!
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सत्ता पक्ष की आरती उतारना नहीं, बल्कि उसकी नीतियों, बयानों और फैसलों पर सवाल उठाना है। विपक्ष गलत हो तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, लेकिन केवल इसलिए कि वह विपक्ष में है, उसके हर सवाल को खारिज कर देना लोकतांत्रिक समझदारी नहीं है।
और सत्ता पक्ष को यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिए कि विरोधियों की किसी एक गलती से उसके अपने सारे सवाल समाप्त हो जाते हैं।
विपक्ष के एक गलत बयान से सत्ता पक्ष के सौ सवालों का हिसाब माफ नहीं हो जाता।
यही वह बुनियादी बात है जिसे राजनीतिक अहंकार अक्सर भूल जाता है।
विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उसे केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि प्रमाण, तर्क और जनता के मुद्दों के साथ सत्ता को घेरना होगा। जब विपक्ष तथ्य लेकर खड़ा होता है, तब सत्ता को जवाब देना पड़ता है। और जब जवाब देने के बजाय केवल विरोधियों को कटघरे में खड़ा किया जाता है, तब जनता के मन में नए सवाल जन्म लेते हैं।
सत्ता पक्ष को शायद ऐसा विपक्ष पसंद आए जो हर विवाद पर सफाई देता रहे और हर सवाल पर पीछे हट जाए। लेकिन लोकतंत्र में जनता को ऐसा विपक्ष चाहिए जो सत्ता से कह सके—आप कुर्सी पर हैं, इसलिए सवालों से ऊपर नहीं हैं!
मंगल भारी, बृहस्पति की दशा खराब और कुर्सी पर संकट के बादल?
अब जरा राजनीतिक ज्योतिष की भी सुन लीजिए!
कहते हैं कि जब मंगल भारी हो और बृहस्पति की दशा अनुकूल न हो, तब आदमी को बोलने से पहले सोचना चाहिए। लेकिन राजनीति में कुछ लोगों की कुंडली में शायद एक ऐसा विशेष ग्रह बैठा होता है जो उन्हें हर विवाद में अपना बयान सही और विरोधी का बयान अपराध दिखाई देता है।
मंगल भारी हो तो जुबान तलवार बन जाती है। बृहस्पति खराब हो तो विवेक छुट्टी पर चला जाता है। और जब अहंकार का राहु सिर पर चढ़ जाए, तब कुर्सी के नीचे की जमीन भी दिखाई देना बंद हो जाती है!
यह ज्योतिष की वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं, राजनीति के मौजूदा मिजाज पर एक व्यंग्य है।
अब सवाल यह है कि यदि हर विवाद में विपक्ष को ही दोषी ठहराया जाएगा, हर आलोचना को साजिश बताया जाएगा और अपने खेमे के हर बयान को उचित साबित करने की कोशिश होगी, तो नुकसान किसका होगा?
विपक्ष का, सत्ता पक्ष का या उस जनता का जो रोजमर्रा की समस्याओं के बीच राजनीति से जवाब चाहती है?
सत्ता की कुंडली में ग्रहों से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता का विश्वास होता है। मंगल-बृहस्पति की दशा बदलने में ज्योतिषी समय लगा सकते हैं, लेकिन जनता का विश्वास कमजोर पड़ जाए तो उसे वापस पाने के लिए भाषण से ज्यादा काम करना पड़ता है।
और हां, राजनीति में कभी-कभी घटनाएं इतनी तेजी से बदलती हैं कि कल तक मजबूत दिखाई देने वाली कुर्सी पर बैठे लोगों को आज अपने ही बयानों का हिसाब देना पड़ जाता है।
किसी मंत्री का इस्तीफा होगा, कोई कुर्सी हिलेगी या सत्ता का समीकरण बदलेगा—यह भविष्यवाणी करना हमारा काम नहीं। मगर इतना जरूर है कि लोकतंत्र में कोई पद स्थायी सुरक्षा कवच नहीं है।
कुर्सी चाहे कितनी भी मजबूत हो, जनता का भरोसा कमजोर पड़ने लगे तो राजनीतिक गणित के सारे समीकरण दोबारा लिखने पड़ सकते हैं।
30 सेकंड में हर मामला सुलझा सकता है… लेकिन पहले अहंकार छोड़िए!
अब आइए उस तीस सेकंड पर, जिसका राजनीतिक अर्थ समझना जरूरी है।
कभी-कभी किसी विवाद को लंबा खींचने के बजाय तीस सेकंड की ईमानदार स्वीकारोक्ति ज्यादा असरदार होती है।
तीस सेकंड में कहा जा सकता है—हां, हमारे पक्ष से भी गलती हुई है। हम उसकी समीक्षा करेंगे।
तीस सेकंड में स्वीकार किया जा सकता है—विपक्ष का सवाल उचित है, उसका जवाब तथ्यों के साथ देंगे।
तीस सेकंड में यह भी कहा जा सकता है—व्यक्तिगत टिप्पणियों की राजनीति से हमें बचना चाहिए, चाहे टिप्पणी किसी भी तरफ से की गई हो।
लेकिन नहीं! राजनीति में गलती स्वीकार करना कई बार सबसे कठिन काम बना दिया जाता है। सफाई पर सफाई दी जाती है, बयान का बचाव होता है, समर्थकों से तालियां बजवाई जाती हैं और विवाद को समाप्त करने के बजाय उसे और लंबा कर दिया जाता है।
क्यों भाई? तीस सेकंड में मामला सुलझाने के लिए केवल घड़ी नहीं, थोड़ा विवेक भी चाहिए!
यहां तीस सेकंड का मतलब कोई वास्तविक समय-सीमा नहीं, बल्कि उस राजनीतिक तत्परता का प्रतीक है जिसमें गलती स्वीकार करके विवाद को बढ़ने से रोका जा सकता है।
सत्ता पक्ष चाहे तो अपने नेताओं की विवादित टिप्पणियों पर स्पष्ट रुख अपनाकर, विरोधियों के प्रति समान मर्यादा बरतकर और जनता के सवालों का सीधा जवाब देकर अनेक विवादों को बढ़ने से रोक सकता है।
लेकिन अगर हर बार जवाब की जगह आरोप, तर्क की जगह तंज और जिम्मेदारी की जगह बचाव चुना जाएगा, तो विवाद समाप्त होने के बजाय राजनीतिक बोझ बनते जाएंगे।
इसलिए कहने का मन करता है—छोड़िए सत्ता का लोभ, आपसे न होगा!
यह किसी पद छोड़ने की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि सत्ता के उस अहंकार पर व्यंग्य है जो गलती मानने को कमजोरी और हर सवाल का विरोध करने को ताकत समझ बैठता है।
अब जनता हर बार लपेटने के मूड में नहीं है!
राजनीतिक दल शायद यह मानकर चलते हों कि जनता कुछ दिन विवाद देखेगी, बयान सुनेगी, फिर अगली खबर की तरफ बढ़ जाएगी।
लेकिन जनता केवल सोशल मीडिया की दर्शक नहीं है। वह अपने घर का बजट भी देखती है, रोजगार की चिंता भी करती है, बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाती है और सरकारी दफ्तरों के चक्कर भी लगाती है।
उसे यह भी दिखाई देता है कि किसी विरोधी के बयान पर तत्काल प्रतिक्रिया देने वाले कितने तत्पर हैं और जनता के सवालों पर जवाब देने में कितनी देर लगती है।
जनता हर राजनीतिक आरोप को सच नहीं मानती और हर सरकारी दावे को अंतिम सत्य भी नहीं मानती। वह अपने अनुभव, उपलब्ध तथ्यों और समय के साथ अपने निष्कर्ष बनाती है।
इसलिए सत्ता पक्ष को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल विपक्ष की आलोचना करके जनता के मन में उठने वाले हर सवाल को समाप्त किया जा सकता है।
और विपक्ष को भी समझना चाहिए कि जनता का भरोसा केवल सत्ता-विरोधी बयान देने से नहीं मिलता। भरोसा तब मिलता है जब सवालों के साथ समाधान भी सामने रखे जाते हैं।
आखिरकार, जनता किसी दल की स्थायी संपत्ति नहीं है। वह सवाल पूछ सकती है, समर्थन दे सकती है, विरोध कर सकती है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से अपना फैसला सुना सकती है।
जमीनी आवाज का अंतिम सवाल
सत्ता पक्ष से हमारा सवाल है—क्या मर्यादा केवल विपक्ष के लिए है? क्या जवाबदेही केवल विरोधियों की जिम्मेदारी है? क्या अपने खेमे के नेताओं की विवादित टिप्पणियों पर भी उतनी ही स्पष्टता दिखाई जाएगी जितनी विपक्ष के बयान पर दिखाई जाती है?
और विपक्ष से हमारा सवाल है—क्या आप जनता के मुद्दों को लेकर लगातार, तथ्यपूर्ण और मजबूती से खड़े रहेंगे, या राजनीतिक विवादों की आंधी में जनता की वास्तविक समस्याओं को पीछे छोड़ देंगे?
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिका है, लेकिन जिम्मेदारी का भार सत्ता पक्ष पर इसलिए अधिक है क्योंकि शासन चलाने और फैसलों का जवाब देने की जिम्मेदारी उसी के पास होती है।
विपक्ष का काम सवाल पूछना है। सत्ता का काम जवाब देना है। जनता का काम दोनों को परखना है।
याद रखिए, राजनीति में सबसे बड़ा संकट विरोधी का कोई बयान नहीं, बल्कि अपनी गलती को गलती मानने से इनकार करना है।
सत्ता पक्ष को विपक्ष की हर बात मानने की जरूरत नहीं है, लेकिन हर उचित सवाल का जवाब देने की जिम्मेदारी से वह बच नहीं सकता। विपक्ष को सत्ता की हर बात का विरोध करने की जरूरत नहीं है, लेकिन जहां जवाबदेही जरूरी हो, वहां उसे पीछे भी नहीं हटना चाहिए।
और सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों से बस इतनी गुजारिश है—मंगल को शांत करने के लिए पूजा-पाठ अपनी जगह, बृहस्पति के उपाय अपनी जगह; लेकिन राजनीति की कुंडली सुधारनी है तो पहले अहंकार का ग्रह कमजोर कीजिए और जनता के सवालों को सुनना शुरू कीजिए।
क्योंकि कुर्सी की उम्र का फैसला ज्योतिषीय व्यंग्य नहीं करता। लोकतंत्र में सरकारों को जनता के विश्वास और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर परखा जाता है।
तीस सेकंड में मामला सुलझ सकता है—अगर जवाब देने का इरादा हो।
वरना सत्ता का लोभ छोड़िए जनाब, जनता अब सिर्फ तमाशा देखने के मूड में नहीं है। वह सवाल पूछने और जवाब मांगने के मूड में है!
— असित भट्टाचार्य
संपादक एवं प्रधान संपादक, जमीनी आवाज
खबरें जमीन की, जमाने की।