जमीनी आवाज | विशेष संपादकीय

असित भट्टाचार्य की कलम से

जिसकी मेहनत से दुनिया चलती है, वही दो वक्त की रोटी और सम्मान के लिए संघर्षरत; जिसकी आस्था अटूट है, उसकी झोली में खुशियों से ज्यादा इंतजार और तकलीफें क्यों?

झूठे सपनों, राजनीतिक नारों और व्यवस्था की विफलताओं के बीच असली सवाल—ईमानदारी से जीने वाला पीछे और छल-कपट से आगे निकलने वाला आखिर क्यों दिखाई देता है?

भगवान के दरबार में सिर झुकाने वाले गरीब की पीड़ा क्या सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी, या उसकी आस्था को ही उसकी मजबूरी मान लिया गया है?

गरीब भगवान को सिर्फ इसलिए नहीं मानता कि उसे चमत्कार की उम्मीद है। कई बार वह भगवान को इसलिए भी पकड़कर बैठा रहता है, क्योंकि जिंदगी में उसका हाथ थामने वाला कोई और दिखाई नहीं देता!

यह एक कड़वी सामाजिक सच्चाई है, जिसे समझने के लिए किसी बड़े अर्थशास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक या समाजशास्त्री की जरूरत नहीं। गांव की किसी झोपड़ी में चले जाइए, किसी मजदूर के घर बैठ जाइए, किसी ऐसे परिवार की आंखों में झांक लीजिए जिसकी पूरी जिंदगी मेहनत और अभाव में गुजर रही है। आपको समझ में आ जाएगा कि गरीब की आस्था केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि उसके टूटते हुए हौसले को बचाए रखने का एक सहारा भी है।

वह सुबह उठता है, काम की तलाश में निकलता है, पसीना बहाता है, परिवार के लिए रोटी जुटाता है और रात को थककर लौटता है। उसके पास न बड़े-बड़े दावे हैं, न सत्ता के गलियारों तक पहुंच और न ही अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए कोई विशेष सुविधा। उसके पास अगर कुछ बचता है, तो वह है उसकी मेहनत, उसका विश्वास और अगले दिन के बेहतर होने की उम्मीद।

इसी उम्मीद के सहारे वह मंदिर में दीपक जलाता है, देवी-देवताओं के सामने सिर झुकाता है और मन ही मन प्रार्थना करता है—हे भगवान! किसी तरह मेरे बच्चों का भविष्य संवार देना।

लेकिन सवाल यह है कि जिस गरीब की आस्था इतनी अटूट है, उसकी जिंदगी में दुखों का सिलसिला इतना लंबा क्यों है?

आस्था अटूट, लेकिन जिंदगी में संघर्ष ही संघर्ष!

नवरात्र में मंदिरों में भीड़ उमड़ती है। दुर्गापूजा के पंडाल सजते हैं। घंटियां बजती हैं, शंखनाद होता है, आरती गूंजती है और मां दुर्गा से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

इन्हीं श्रद्धालुओं के बीच वह गरीब भी खड़ा होता है, जिसकी जेब में शायद प्रसाद खरीदने के लिए भी बहुत कम पैसे हों। वह भी मां से अपने परिवार की खुशहाली मांगता है। उसके लिए मां दुर्गा केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि शक्ति, साहस और संकटों से लड़ने की प्रेरणा हैं।

लेकिन पूजा समाप्त होने के बाद जब वह अपने घर लौटता है, तो उसके सामने वही पुरानी चुनौतियां खड़ी मिलती हैं।

रोजगार की चिंता, महंगाई का दबाव, बच्चों की पढ़ाई, इलाज का खर्च और भविष्य की अनिश्चितता।

उसके घर में नवरात्र के नौ दिन भी संघर्ष के साथ गुजरते हैं और बाकी दिन भी।

फिर भी वह भगवान पर विश्वास करता है।

क्यों?

क्योंकि जब सामाजिक सुरक्षा कमजोर पड़ती है, जब सरकारी योजनाओं का लाभ हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंचता, जब न्याय और अवसर पाने की राह कठिन हो जाती है, तब आस्था उसके मन को टूटने से बचाने का सहारा बन सकती है।

लेकिन यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—गरीब की आस्था का सम्मान होना चाहिए, उसकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाया जाना चाहिए।

भगवान में विश्वास करना उसकी निजी स्वतंत्रता है। मगर किसी भी समाज की जिम्मेदारी है कि उसके नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए केवल प्रार्थना के भरोसे न छोड़ दिया जाए।

ईमानदार आदमी परेशान और बेईमान खुशहाल क्यों दिखाई देता है?

यहीं से एक दूसरा सवाल जन्म लेता है।

आखिर ऐसा क्यों दिखाई देता है कि ईमानदारी से कमाने वाला व्यक्ति अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करता रहता है, जबकि कुछ लोग छल, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और अनुचित तरीकों से धन कमाकर ऐशो-आराम की जिंदगी जीते नजर आते हैं?

क्या ईमानदारी अब केवल किताबों, भाषणों और नैतिक शिक्षा तक सीमित रह गई है?

क्या मेहनत करने वाले व्यक्ति को हमेशा समझौता करना होगा?

क्या नियमों का पालन करने वाला नागरिक इसलिए पीछे रह जाएगा, क्योंकि उसके पास नियमों को अपने हिसाब से मोड़ने की ताकत नहीं है?

इन सवालों को केवल भावुकता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

हालांकि यह भी सच है कि हर अमीर बेईमान नहीं होता और हर गरीब ईमानदार नहीं होता। धनवान व्यक्ति अपनी मेहनत, योग्यता और उद्यम से भी आगे बढ़ते हैं। गरीबी अपने आप में ईमानदारी का प्रमाण नहीं, ठीक वैसे ही जैसे अमीरी बेईमानी का प्रमाण नहीं है।

असली सवाल अमीर और गरीब का नहीं, बल्कि ईमानदारी और बेईमानी के साथ होने वाले व्यवहार का है।

अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से मेहनत करता है, फिर भी उसे उचित मजदूरी नहीं मिलती, तो सवाल व्यवस्था से होना चाहिए।

अगर कोई योग्य युवा वर्षों तक नौकरी के लिए भटकता है, जबकि कहीं सिफारिश और भ्रष्टाचार से अवसर बांटे जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो सवाल जवाबदेही का होना चाहिए।

अगर कोई प्रभावशाली व्यक्ति कानून से बच निकलता है और सामान्य नागरिक न्याय पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करता है, तो सवाल कानून के समान अनुपालन का होना चाहिए।

क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि उसके ताकतवर लोग कितने सुखी हैं। उसकी परीक्षा यह है कि कमजोर नागरिक कितना सुरक्षित, सम्मानित और न्यायपूर्ण जीवन जी पा रहा है।

लोकतंत्र में सपने दिखाना आसान, सपनों को पूरा करना कठिन!

अब बात राजनीति की।

लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। कोई नेता अपने भाषणों से लोगों को प्रभावित करता है, कोई अपने काम से विश्वास अर्जित करता है और कोई भविष्य के सुनहरे सपने दिखाकर सत्ता तक पहुंचता है।

लेकिन चुनाव जीतना और जनता की जिंदगी बदलना दो अलग-अलग बातें हैं।

प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो, मंत्री हो या स्थानीय जनप्रतिनिधि—हर व्यक्ति से उसके काम का हिसाब मांगना जनता का अधिकार है।

किसी नेता की लोकप्रियता उसकी जवाबदेही समाप्त नहीं करती। किसी दल का समर्थन करने से नागरिक के सवाल पूछने का अधिकार खत्म नहीं होता। और किसी सरकार की आलोचना करना अपने आप में देशविरोध नहीं हो जाता।

जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए, गरीब परिवारों को कितनी राहत मिली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति कितनी सुधरी और भ्रष्टाचार की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई।

लोकतंत्र में भाषणों की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण है जनता के जीवन में आया वास्तविक बदलाव।

कोई नेता कितना पढ़ा-लिखा है, उसकी भाषा कितनी प्रभावशाली है या वह मंच से कितने बड़े दावे करता है—ये बातें अकेले उसकी सफलता का पैमाना नहीं हो सकतीं। इसी तरह किसी व्यक्ति की औपचारिक शिक्षा कम होना अपने आप में उसकी नेतृत्व क्षमता को खारिज करने का आधार नहीं है।

लेकिन चाहे नेता कितना भी शिक्षित हो या कम शिक्षित, उसके निर्णयों, वादों और कामकाज की समीक्षा होना जरूरी है।

प्रधानमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति हो या पंचायत का प्रतिनिधि—जनता को भावनात्मक नारों के साथ-साथ ठोस परिणाम भी चाहिए।

देश केवल भाषणों से आगे नहीं बढ़ता। देश तब आगे बढ़ता है, जब उसके नागरिकों के जीवन में अवसर, सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और न्याय बढ़ते हैं।

क्या गरीब की आस्था को उसकी कमजोरी समझ लिया गया है?

यह सवाल और भी गंभीर है।

गरीब भगवान पर भरोसा करता है। वह मंदिर जाता है, व्रत रखता है, पूजा करता है और कठिन समय में प्रार्थना करता है। यह उसका अधिकार है और उसकी आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए।

लेकिन क्या उसकी आस्था के साथ उसकी समस्याओं पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान दिया जाता है?

क्या धार्मिक आयोजनों में उमड़ने वाली भीड़ के बीच उस मजदूर की चिंता पर भी चर्चा होती है, जो अगले दिन काम मिलेगा या नहीं, यह नहीं जानता?

क्या देवी की आराधना के बीच उस बेटी की शिक्षा और सुरक्षा का सवाल भी उतनी ही प्रमुखता से उठता है, जिसके परिवार के पास सीमित संसाधन हैं?

क्या मां दुर्गा की शक्ति का उत्सव मनाने वाला समाज अपने आसपास अन्याय का सामना कर रही महिलाओं के लिए भी मजबूती से खड़ा होता है?

अगर हम वास्तव में आस्था का अर्थ समझते हैं, तो हमें इन सवालों से बचना नहीं चाहिए।

धर्म और मानवीय संवेदना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्ची आस्था मनुष्य को दूसरों का दर्द समझना सिखा सकती है। देवी की आराधना शक्ति और साहस की प्रेरणा दे सकती है। लेकिन इस प्रेरणा को सामाजिक जीवन में उतारना भी उतना ही जरूरी है।

गरीब को केवल यह कह देना कि भगवान सब ठीक कर देंगे, पर्याप्त नहीं है।

उसे रोजगार चाहिए, उचित मजदूरी चाहिए, इलाज चाहिए, शिक्षा चाहिए और अपने अधिकारों के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था चाहिए।

प्रार्थना उसे हौसला दे सकती है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए मानवीय प्रयास, जवाबदेह शासन और मजबूत संस्थाएं भी आवश्यक हैं।

जमीनी आवाज का सवाल: भगवान से शिकायत नहीं, व्यवस्था से जवाब चाहिए!

जमीनी आवाज का यह संपादकीय किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं है। न ही इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की संपत्ति, किसी नेता की लोकप्रियता या किसी समुदाय की आस्था को निशाना बनाना है।

हमारा सवाल उस सोच से है, जो गरीब के दुख को उसकी नियति मानकर स्वीकार कर लेती है।

हमारा सवाल उस व्यवस्था से है, जिसमें एक जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी लगातार संघर्ष करना पड़ता है।

हमारा सवाल उन राजनीतिक दावों से है, जिनकी सच्चाई को जमीन पर उतरकर परखना जरूरी है।

और हमारा सवाल समाज के उन लोगों से भी है, जो दूसरों की तकलीफ देखकर चुप रह जाना आसान समझते हैं।

गरीब को भगवान पर विश्वास करने दीजिए। उसकी आस्था का मजाक मत उड़ाइए। लेकिन उसकी गरीबी को भी उसकी किस्मत कहकर नजरअंदाज मत कीजिए।

उसे यह मत सिखाइए कि वह केवल सहता रहे और सवाल न पूछे।

उसे यह भरोसा भी दीजिए कि उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा, उसके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलेगी, बीमारी की स्थिति में इलाज का रास्ता खुलेगा और अन्याय होने पर उसे न्याय पाने का अवसर मिलेगा।

क्योंकि एक स्वस्थ लोकतंत्र में गरीब को केवल सहानुभूति नहीं, अधिकार भी मिलने चाहिए।

अंतिम सवाल: दीपक मंदिर में जलेगा, लेकिन गरीब के घर रोशनी कब पहुंचेगी?

नवरात्र में जब हम मां दुर्गा के सामने दीपक जलाते हैं, तो सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे आसपास कितने घर ऐसे हैं, जहां त्योहार की रोशनी के पीछे आर्थिक चिंता का अंधेरा छिपा है?

कितने परिवार ऐसे हैं, जो बच्चों की मुस्कान के लिए अपनी जरूरतें टाल देते हैं?

कितने मेहनतकश लोग ऐसे हैं, जो पूरी जिंदगी ईमानदारी से गुजार देते हैं, लेकिन बुढ़ापे में भी आर्थिक सुरक्षा के लिए संघर्ष करते हैं?

और कितने ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपनी समस्याओं का समाधान मांगने के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?

इन सवालों के जवाब किसी एक राजनीतिक दल, एक सरकार या एक व्यक्ति पर आरोप लगाकर नहीं मिलेंगे। इसके लिए तथ्यों, नीतियों, प्रशासनिक जवाबदेही और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी को परखना होगा।

लेकिन इतना तय है कि जिस दिन गरीब की मेहनत को सम्मान मिलेगा, जिस दिन ईमानदार नागरिक को अपने अधिकारों के लिए अपमानित नहीं होना पड़ेगा, जिस दिन सत्ता के दावों का मूल्यांकन जनता के वास्तविक जीवन से होगा—उस दिन लोकतंत्र का अर्थ और अधिक सार्थक होगा।

भगवान में आस्था रखना गलत नहीं है। गलत यह है कि गरीब की आस्था को देखकर समाज उसकी पीड़ा भूल जाए।

गरीब को भगवान का सहारा भी चाहिए और व्यवस्था का न्याय भी। उसे मंदिर में जलते दीपक की रोशनी भी चाहिए और अपने घर में सम्मान, सुरक्षा तथा खुशहाली की रोशनी भी।

क्योंकि सवाल यह नहीं कि गरीब भगवान को कितना मानता है।

सवाल यह है कि गरीब को इंसान समझकर उसका हक देने वाली व्यवस्था हम कब बनाएंगे?

यही सवाल है। यही चिंतन है। और यही जमीनी आवाज की कलम का उद्देश्य है।

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