जमीनी आवाज | विशेष संपादकीय

असित भट्टाचार्य

संपादक, जमीनी आवाज

रंग में भगवा, इंसान में गाली! सोशल मीडिया के सियासी विद्वानों पर जमीनी आवाज का तीखा सवाल

उपशीर्षक 1: विचारधारा पर बहस करने का दम नहीं, तो अक्षरों के सहारे चरित्र प्रमाणपत्र बांटने का नया चलन!

उपशीर्षक 2: कांग्रेस हो या भाजपा, लोकतंत्र में सवालों का जवाब तर्क से दिया जाता है, गालियों से नहीं!

चाय की दुकान से सोशल मीडिया तक: राजनीति का स्तर गिरा या हमारी सोच का?

चाय की दुकान पर चर्चा हो रही थी। चाय गर्म थी और बहस उससे भी ज्यादा गर्म। मुद्दा था सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वह राजनीतिक भाषा, जिसमें किसी ने भाजपा के अंग्रेजी नाम के पहले अक्षर ‘B’ को भगवा से जोड़कर अपनी व्याख्या पेश की, तो कांग्रेस के नाम के पहले अक्षर ‘C’ के साथ कथित तौर पर एक अभद्र शब्द जोड़कर उसके आगे खाली स्थान छोड़ दिया।

अब सवाल यह है कि राजनीति में विचार खत्म हो जाएं, तो क्या अक्षरों को गाली का हथियार बना देना ही नई राजनीतिक समझदारी है?

चाय की दुकान पर किसी ने तंज कसा—रंग का संबंध भगवा हो सकता है, लेकिन किसी इंसान की पहचान उसके रंग से नहीं, उसके कर्मों से होनी चाहिए। किसी के नाम का पहला अक्षर देखकर उसके चरित्र का फैसला सुनाने वाले आखिर किस लोकतांत्रिक संस्कार का प्रदर्शन कर रहे हैं?

जमीनी आवाज का सवाल: गाली देने से पहले अपना राजनीतिक ज्ञान तो जांचिए!

सोशल मीडिया पर आज एक अजीब प्रतियोगिता चल रही है। कौन किस पार्टी को ज्यादा नीचा दिखा सकता है, कौन किस नेता के समर्थकों को ज्यादा अपमानित कर सकता है और कौन दो अक्षरों के सहारे लोगों के लिए ज्यादा अपमानजनक शब्द गढ़ सकता है!

मानो राजनीतिक बहस नहीं, शब्दों की नीलामी चल रही हो।

भाजपा का समर्थक यदि कांग्रेस के लिए अपमानजनक शब्द इस्तेमाल करता है, तो क्या इससे भाजपा की नीतियों का कोई प्रमाण मिलता है? और कांग्रेस का समर्थक यदि भाजपा को गाली देता है, तो क्या इससे कांग्रेस की उपलब्धियां साबित हो जाती हैं?

नहीं!

गाली न किसी पार्टी की उपलब्धि है, न किसी विचारधारा की ताकत। यह केवल बताती है कि बहस करने वाला व्यक्ति अपने तर्कों को किस स्तर तक ले जा रहा है।

लोकतंत्र में भाजपा से सवाल पूछना अपराध नहीं है। कांग्रेस से सवाल पूछना भी अपराध नहीं है। किसी सरकार की आलोचना करना देशद्रोह नहीं और किसी विपक्षी दल की नाकामी उजागर करना राजनीतिक शत्रुता नहीं।

लेकिन जब समर्थक अपनी पार्टी की आलोचना सुनते ही तर्क छोड़कर गाली पर उतर आएं, तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं विचारों की जगह अंधसमर्थन ने ले ली है।

‘बी’ और ‘रो’ का व्यंग्य: खाली जगह जनता भरेगी, लेकिन आईना कौन देखेगा?


जमीनी आवाज आज सोशल मीडिया के उन सियासी विद्वानों के सामने दो अधूरे शब्द रखती है—‘बी’ और ‘रो’

बी ______

रो ______

इन रिक्त स्थानों को भरने की आजादी पाठकों के पास है। लेकिन सवाल सिर्फ शब्द भरने का नहीं, अपनी सोच की परीक्षा लेने का भी है।

क्या आप इन खाली जगहों में ऐसा शब्द भरेंगे, जो किसी की गरिमा को चोट पहुंचाए? या ऐसा शब्द चुनेंगे, जो राजनीतिक चरित्र, सार्वजनिक व्यवहार और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करे?

फैसला आपका है!

क्योंकि शब्दों का चुनाव ही बताता है कि हम बहस करना चाहते हैं या केवल अपनी कुंठा निकालना चाहते हैं।

और जो लोग हर आलोचना को अपनी पार्टी पर हमला मान लेते हैं, उनसे एक सीधा सवाल है—क्या आपकी पार्टी इतनी कमजोर है कि उसे बचाने के लिए आपको गालियों का सहारा लेना पड़ता है?

अंधभक्ति का सबसे बड़ा संकट: नेता सवालों से ऊपर कैसे हो गया?

लोकतंत्र में नेता जनता का प्रतिनिधि होता है, भगवान नहीं। राजनीतिक दल जनता की सेवा के माध्यम हैं, किसी के निजी धर्मस्थल नहीं।

नेता गलती करे तो सवाल होना चाहिए। सरकार वादा पूरा न करे तो जवाब मांगा जाना चाहिए। विपक्ष जनता के मुद्दे छोड़ दे तो उसकी भी आलोचना होनी चाहिए।

लेकिन हमारे यहां उलटी गंगा बहने लगी है।

सड़क टूटी हो, अस्पताल में सुविधाएं न हों, युवाओं को रोजगार न मिले, किसानों की समस्याएं बनी रहें या किसी गरीब की सुनवाई न हो—सवाल पूछने के बजाय बहस इस बात पर होने लगती है कि सवाल पूछने वाला किस पार्टी का समर्थक है!

यही वह जगह है, जहां राजनीति जनता के मुद्दों से भटककर पहचान और अपमान की लड़ाई बन जाती है।

अंधभक्ति का अर्थ केवल किसी नेता की प्रशंसा करना नहीं है। असली समस्या तब शुरू होती है, जब व्यक्ति अपने पसंदीदा नेता की गलती को गलती मानने से इनकार कर देता है और सवाल पूछने वाले को ही दुश्मन घोषित कर देता है।

याद रखिए, सवाल पूछने वाला हमेशा विरोधी नहीं होता और प्रशंसा करने वाला हमेशा हितैषी नहीं होता।

कभी-कभी आलोचना ही सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सेवा होती है।

पंद्रह लाख का दर्द और राजनीतिक बहस का असली सवाल

जब आम आदमी अपने पंद्रह लाख रुपये डूबने की आशंका से परेशान हो, जब किसी परिवार की वर्षों की मेहनत दांव पर लगी हो, जब बेरोजगार नौजवान भविष्य को लेकर चिंतित हो और गरीब आदमी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा हो, तब राजनीति का असली सवाल यह होना चाहिए कि जनता को राहत कैसे मिलेगी।

लेकिन सोशल मीडिया पर यदि बहस इस बात तक सिमट जाए कि किस पार्टी के नाम के अक्षर से कौन-सा अपमानजनक शब्द बनाया जा सकता है, तो यह केवल भाषा का पतन नहीं, जनहित के मुद्दों से भटकाव भी है।

जनता को यह जानना है कि उसका पैसा सुरक्षित है या नहीं। उसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और जवाबदेही चाहिए।

उसे अक्षरों के सहारे गाली का नया शब्दकोश नहीं चाहिए।

जमीनी आवाज की दोटूक: पार्टी से प्रेम कीजिए, लेकिन विवेक को गिरवी मत रखिए!

भाजपा समर्थकों से हमारा सवाल है—क्या भाजपा की नीतियों और उपलब्धियों का बचाव तथ्यों से नहीं किया जा सकता?

कांग्रेस समर्थकों से हमारा सवाल है—क्या कांग्रेस की नीतियों और राजनीतिक इतिहास पर बहस करने के लिए अपमानजनक भाषा जरूरी है?

और उन तमाम राजनीतिक समर्थकों से हमारा सवाल है, जो अपने नेता के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं—क्या आपने कभी सोचा है कि जिस नेता के लिए आप दूसरों से लड़ रहे हैं, वह आपके जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए कितना जवाबदेह है?

नेता बदलते हैं। सरकारें बदलती हैं। राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। लेकिन आम आदमी की समस्याएं तब तक नहीं बदलतीं, जब तक उन पर ईमानदारी से काम नहीं होता।

इसलिए अपनी राजनीतिक पसंद जरूर रखिए, लेकिन अपना विवेक किसी के पास जमा मत कीजिए।

किसी पार्टी की आलोचना सुनकर नाराज होने से पहले तथ्यों को परखिए। किसी नेता की प्रशंसा सुनकर तालियां बजाने से पहले उसके काम को देखिए। और किसी राजनीतिक पोस्ट को साझा करने से पहले यह सोचिए कि वह समाज में बहस बढ़ा रही है या नफरत?

अंतिम सवाल: शब्दों से चरित्र बनता है या चरित्र से शब्दों की पहचान होती है?

जमीनी आवाज का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती असहमति के सम्मान में है, गाली की ऊंचाई में नहीं।

किसी पार्टी के नाम का पहला अक्षर बदल देने से उसका इतिहास नहीं बदलता। किसी समर्थक को अपमानित कर देने से उसकी विचारधारा का खंडन नहीं होता। और किसी नेता को भगवान बना देने से उसकी जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती।

जो लोग दूसरों को नीचा दिखाने के लिए शब्द खोजते हैं, उन्हें कभी अपने भीतर भी झांकना चाहिए।

क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि दूसरे दल के नाम के अक्षर से कौन-सा शब्द बनाया जा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस दल का झंडा आप उठाए हुए हैं, उसने आपके जीवन में क्या बदला है और आप उससे क्या सवाल पूछने का साहस रखते हैं?

जमीनी आवाज की अपील: अंधसमर्थक मत बनिए, जागरूक नागरिक बनिए!

पार्टी से प्रेम कीजिए, लेकिन देश और समाज के हित को उससे ऊपर रखिए। नेता का सम्मान कीजिए, लेकिन उसे सवालों से ऊपर मत रखिए। विरोध कीजिए, लेकिन भाषा की मर्यादा मत छोड़िए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ताकतवर नागरिक वह नहीं, जो सबसे ऊंची आवाज में गाली देता है; सबसे ताकतवर नागरिक वह है, जो सत्ता से सवाल पूछता है और अपने पसंदीदा नेता से भी जवाब मांगता है।

चाय ठंडी हो सकती है, बहस खत्म हो सकती है, लेकिन सवाल जिंदा रहने चाहिए।

यही जमीनी आवाज की पत्रकारिता है।

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