जमीनी आवाज | संपादकीय

असित भट्टाचार्य

कहां तो हर घर तिरंगा पहुंचाने का दावा था, अब तिरंगा लहरा रहा है तो फटा क्यों है?

उपशीर्षक 1: राष्ट्रभक्ति के नारों से लोकतंत्र की परीक्षा नहीं होती, परीक्षा तब होती है जब सत्ता से सवाल पूछे जाते हैं।

उपशीर्षक 2: छात्र सड़कों पर हों, विपक्ष सवाल उठाए या जनता जवाब मांगे—लोकतंत्र में जवाब की जगह गाली, तिरस्कार और कानून की अनदेखी नहीं ले सकती।

कहां तो बड़े-बड़े दावे थे—हर घर तिरंगा, हर हाथ तिरंगा, हर दिल में देशभक्ति! देश के कोने-कोने में तिरंगे के सम्मान का संदेश पहुंचाने की मुहिम चली। मगर आज जब तिरंगा लहरा रहा है, तो सवाल उठता है—उसके सम्मान की जिम्मेदारी केवल झंडा फहराने तक थी, या उस लोकतांत्रिक भावना को बचाए रखने की भी, जिसके लिए यह तिरंगा करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का प्रतीक है?

तिरंगा कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है। उसके तीन रंगों में देश की विविधता, त्याग, शांति, साहस और प्रगति के सपने समाए हैं। उसके नीचे खड़े होकर सत्ता की शपथ लेने वाले यह कैसे भूल सकते हैं कि भारत केवल सरकार का नाम नहीं है? भारत उन विद्यार्थियों का भी है, जो अपने भविष्य के लिए सवाल पूछते हैं। उन नागरिकों का भी, जो अपने अधिकार मांगते हैं। उन विपक्षी नेताओं का भी, जो सरकार के फैसलों का विरोध करते हैं। और उन लोगों का भी, जिनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचते-पहुंचते थक जाती है।

तिरंगे की शान ऊंची रखने के लिए केवल डंडे पर झंडा चढ़ाना काफी नहीं, लोकतंत्र की मर्यादा भी ऊंची रखनी पड़ती है।

सवाल छात्रों से नहीं, सवालों से परेशानी क्यों?

जब छात्र अपने भविष्य, शिक्षा, रोजगार या अधिकारों को लेकर आंदोलन करते हैं, तो उनसे सवाल पूछे जा सकते हैं। उनके आंदोलन के तरीकों पर चर्चा हो सकती है। कानून के उल्लंघन की स्थिति में कानून के अनुसार कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन क्या किसी छात्र आंदोलन का जवाब केवल सख्ती से दिया जा सकता है? क्या युवाओं की बेचैनी को समझने की कोशिश करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?

याद रखिए, छात्र केवल आज के विद्यार्थी नहीं हैं। वे कल के कर्मचारी, अधिकारी, शिक्षक, वैज्ञानिक, पत्रकार और जनप्रतिनिधि भी हैं। आज उनके सवालों को सुनने से इनकार किया जाएगा, तो कल यही सवाल और व्यापक रूप में समाज के सामने खड़े होंगे।

सत्ता के पास प्रशासन है, संसाधन हैं और व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी है। उसके पास जवाब देने के लिए मंच भी है और अपनी नीतियों का बचाव करने के लिए तर्क भी। फिर सवाल पूछने वालों के सामने तर्क के बजाय अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने की जरूरत क्यों पड़ती है?

लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। सवाल का जवाब देना सत्ता की जवाबदेही है।

विपक्ष विरोधी हो सकता है, देशद्रोही नहीं!

विपक्ष का काम सरकार की हर बात पर तालियां बजाना नहीं है। उसका काम नीतियों की समीक्षा करना, कमियों को सामने लाना और जनता के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगना भी है। विपक्ष गलत हो सकता है, उसकी आलोचना हो सकती है और उसके आरोपों की जांच हो सकती है। लेकिन केवल विरोध करने के कारण किसी को अपमानित करना या उसकी आवाज को महत्वहीन बताना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है।

आज राजनीति में शब्दों की मर्यादा पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। सार्वजनिक मंचों से ऐसे शब्द निकलें, जो व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुंचाएं, समाज में कटुता बढ़ाएं और मुद्दों को पीछे धकेल दें, तो नुकसान किसी एक दल का नहीं, पूरे राजनीतिक वातावरण का होता है।

सवाल सीधा है—यदि विपक्ष के आरोप गलत हैं, तो तथ्य रखिए। यदि आरोप निराधार हैं, तो प्रमाण सामने रखिए। यदि सरकार का काम सही है, तो उपलब्धियों का हिसाब दीजिए।

लेकिन गाली का जवाब गाली, तिरस्कार का जवाब तिरस्कार और आरोप का जवाब केवल दूसरे आरोप से दिया जाएगा, तो जनता अपने वास्तविक सवालों के जवाब कहां खोजेगी?

राजनीति में आवाज ऊंची करने से दलील मजबूत नहीं होती। कई बार सबसे ऊंचे मंच से दिया गया जवाब भी जनता के एक सीधे सवाल के सामने मौन हो जाता है।

कानून सबके लिए है या केवल आम आदमी के लिए?

लोकतंत्र की असली ताकत कानून के शासन में है। कानून का सम्मान केवल नागरिकों से अपेक्षित नहीं है; शासन चलाने वाले संस्थानों और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी भी है कि वे कानून के दायरे में रहकर काम करें।

किसी भी मामले में कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं, इसका फैसला तथ्यों, साक्ष्यों और उचित प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है। लेकिन यदि कहीं कानून की अनदेखी होती है, तो उसकी जांच और जवाबदेही भी होनी चाहिए—चाहे मामला किसी सामान्य नागरिक का हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का।

जनता का भरोसा तब कमजोर होता है, जब उसे यह महसूस होने लगे कि नियमों की कठोरता व्यक्ति की हैसियत देखकर बदल जाती है। इसलिए सत्ता से सवाल पूछना जरूरी है—क्या कानून का पालन कराने वालों के लिए भी वही मानक लागू होते हैं, जिनकी अपेक्षा आम नागरिक से की जाती है?

यह सवाल किसी एक सरकार या दल तक सीमित नहीं है। सत्ता में जो भी हो, जवाबदेही का सिद्धांत सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने से पहले देश के सवाल सुनिए!

देशभक्ति का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है देश के नागरिकों के सम्मान की रक्षा करना, संविधान की भावना का आदर करना, सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखना और उन समस्याओं को स्वीकार करना, जिन्हें दूर करने की जरूरत है।

देश से प्रेम करने वाला व्यक्ति देश की कमियों पर भी सवाल पूछ सकता है। किसी व्यवस्था की आलोचना करना देश का अपमान नहीं होता, यदि वह आलोचना तथ्यों और जनहित पर आधारित हो।

जो विद्यार्थी रोजगार पूछता है, वह दुश्मन नहीं हो जाता। जो नागरिक शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति पर सवाल उठाता है, वह राष्ट्रविरोधी नहीं बन जाता। जो पत्रकार सार्वजनिक धन के इस्तेमाल का हिसाब मांगता है, वह व्यवस्था का शत्रु नहीं हो जाता। और जो विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है, उसे केवल विरोधी होने के कारण उसकी बात सुनने से इनकार नहीं किया जा सकता।

देशभक्ति का सबसे मजबूत प्रमाण यह है कि देश के नागरिक बिना भय के अपने सवाल पूछ सकें और उन्हें तथ्यों के आधार पर जवाब मिले।

तिरंगा लहराने और उसकी भावना निभाने में फर्क है!

तिरंगे को सम्मान देना केवल राष्ट्रीय पर्वों का कार्यक्रम नहीं है। यह उस विचार का सम्मान है, जिसमें अलग-अलग विचारों, भाषाओं, समुदायों और राजनीतिक मतों के बावजूद देश एक साथ खड़ा रहता है।

तिरंगे की शान तब भी है, जब सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे से असहमत हों। उसकी शान तब भी है, जब कोई छात्र शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रखे। उसकी शान तब भी है, जब कोई पत्रकार सत्ता से असुविधाजनक सवाल पूछे। और उसकी शान तब भी है, जब कोई आम नागरिक यह कहने का साहस करे कि उससे किए गए वादे पूरे नहीं हुए।

लोकतंत्र में असहमति कोई बीमारी नहीं है, जिसे दबाकर समाप्त कर दिया जाए। असहमति वह अवसर है, जो सरकार को अपनी गलतियां सुधारने और जनता का भरोसा मजबूत करने का रास्ता देता है।

तिरंगे का सम्मान करने वाले हर नागरिक को यह समझना होगा कि राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

जमीनी आवाज का सवाल

सत्ता आज आपकी है, कल किसी और की हो सकती है। कुर्सियां बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। लेकिन जनता के सवाल नहीं बदलते—रोजगार कहां है? शिक्षा कैसी है? व्यवस्था कितनी जवाबदेह है? कानून का पालन कौन कर रहा है? और जनता की आवाज सुन कौन रहा है?

यदि सरकार सही है, तो उसे सवालों से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यदि विपक्ष गलत है, तो उसे तथ्यों से जवाब दिया जा सकता है। यदि छात्र गलत हैं, तो उनके सामने तर्क और कानून रखा जा सकता है। लेकिन यदि हर असहमति को अपमान से, हर सवाल को तिरस्कार से और हर आलोचना को दुश्मनी से जोड़ा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद के लिए जगह छोटी पड़ने लगती है।

जमीनी आवाज किसी राजनीतिक दल की जय-जयकार करने के लिए नहीं, जनता के सवाल सामने रखने के लिए है। हमारी कसौटी किसी नेता का पद, किसी दल का झंडा या किसी सरकार का प्रचार नहीं, बल्कि जनहित, तथ्य और जवाबदेही है।

और अंत में वही सवाल, जो आज हर उस व्यक्ति को खुद से पूछना चाहिए, जो तिरंगे के सम्मान की बात करता है—

कहां तो हर घर तिरंगा पहुंचाने का दावा था, अब तिरंगा लहरा रहा है तो फटा क्यों है?

कहीं हम तिरंगे को ऊंचा उठाने की रस्म तो निभा रहे हैं, लेकिन उसके नीचे खड़े नागरिक के सम्मान, अधिकार और सवालों को बचाने की जिम्मेदारी भूल तो नहीं रहे?

क्योंकि तिरंगा केवल लहराने के लिए नहीं है। वह हमें याद दिलाने के लिए भी है कि देश किसी एक व्यक्ति, किसी एक दल या किसी एक सरकार से बड़ा है।

जय हिंद!

जमीनी आवाज — खबरें जमीन की, जमाने की।