महा सप्तमी विशेष संपादकीय | असित भट्टाचार्य
प्रधानमंत्री जी, भक्तों से कब तक चलेगी सत्ता की गाड़ी? जनता जागी तो नट-बोल्ट वाले रोबोट कहां से लाइएगा?
प्रधानमंत्री जी, बुरा लगे तो लगे, लेकिन सवाल पूछना हमारा धर्म है और जवाब देना सत्ता की जिम्मेदारी!
प्रधानमंत्री जी,
आज महा सप्तमी है। मां दुर्गा की आराधना का पर्व है। बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला अवसर है। ऐसे में एक सवाल आपसे भी बनता है—क्या लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को दुश्मन समझ लिया जाए और बिना सवाल किए हर बात पर ताली बजाने वालों को ही सच्चा देशभक्त मान लिया जाए?
जमीनी आवाज के संपादक की बात शायद आपको अच्छी न लगे। आपके समर्थकों को भी चुभ सकती है। लेकिन पत्रकारिता का काम किसी की प्रशंसा में कसीदे पढ़ना नहीं, बल्कि सत्ता के सामने जनता के सवाल रखना है।

प्रधानमंत्री जी, आखिर कब तक चलेगी मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति?
जब भी देश में महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आमदनी और आम आदमी की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठते हैं, तो बहस का रुख दूसरी तरफ मुड़ता हुआ क्यों दिखाई देता है?
कभी पाकिस्तान, कभी कश्मीर, कभी गोबर और गोमूत्र, तो कभी हिंदू-मुसलमान के नाम पर सोशल मीडिया की अदालत सज जाती है।
पाकिस्तान में कौन क्या कर रहा है, इस पर चर्चा हो सकती है। कश्मीर राष्ट्रीय महत्व का विषय है। गोबर और गोमूत्र के उपयोग पर वैज्ञानिक चर्चा भी हो सकती है। लेकिन क्या देश की सारी समस्याएं इन्हीं विषयों में सिमट गई हैं?
क्या आम आदमी के घर का बजट ठीक हो गया? क्या युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार मिल गया? क्या सरकारी अस्पतालों में इलाज की चिंता समाप्त हो गई? क्या स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था आदर्श बन गई? क्या किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाकर निश्चिंत हो गया?
अगर इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं, तो देश को बताइए। और अगर नहीं हैं, तो इन सवालों से ध्यान हटाने के बजाय इनका जवाब दीजिए।

प्रधानमंत्री जी, देश भक्तों से नहीं, विवेक से चलता है!
एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। हर भाजपा समर्थक अंधभक्त नहीं है और सरकार का विरोध करने वाला हर व्यक्ति देशविरोधी नहीं हो जाता। लोकतंत्र में समर्थन भी अधिकार है और असहमति भी।
लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी पसंद के नेता की हर गलती को सही ठहराने लगे, सवाल पूछने वाले को गद्दार बताने लगे और प्रमाण के बजाय प्रचार को सच मानने लगे, तब लोकतंत्र के लिए चिंता पैदा होती है।
नेता आते हैं, जाते हैं और सरकारें बदलती हैं। लेकिन देश और उसकी जनता बनी रहती है।
प्रधानमंत्री जी, आपने भी राजनीति में लंबा सफर तय किया है। आपसे बेहतर कौन समझेगा कि किसी नेता की लोकप्रियता और किसी देश की वास्तविक स्थिति में अंतर होता है?
सोशल मीडिया पर हजारों लोग किसी नेता के पक्ष में नारे लगा सकते हैं। लाखों लोग पोस्ट साझा कर सकते हैं। लेकिन किसी पोस्ट पर मिलने वाली तालियों से किसी परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदलती। किसी ट्रेंड से अस्पताल में डॉक्टरों की संख्या नहीं बढ़ती। किसी नारे से बेरोजगार युवक को नौकरी नहीं मिलती।
और अब जरा अंधसमर्थन की उम्र पर भी बात कर लीजिए!
प्रधानमंत्री जी, आज जो लोग बिना सवाल किए आपके साथ खड़े हैं, क्या वे सभी हमेशा वैसे ही खड़े रहेंगे? क्या आने वाली पीढ़ियां भी हर बात को बिना जांचे स्वीकार कर लेंगी? क्या युवाओं को हमेशा यही समझाया जा सकेगा कि सवाल मत पूछो, बस समर्थन करो?
इंसान का दिमाग किसी पार्टी का स्थायी कार्यालय नहीं है, जहां एक बार झंडा लग गया तो जीवन भर ताला लगा रहेगा।
आज जो युवा सोशल मीडिया पर आपके समर्थन में लिखता है, कल वही रोजगार न मिलने पर सवाल भी पूछ सकता है। आज जो व्यक्ति सरकार की हर घोषणा पर तालियां बजाता है, कल अपने घर का खर्च नहीं चलने पर हिसाब भी मांग सकता है।
यह राजनीति का सामान्य सच है। जनता किसी की निजी संपत्ति नहीं है।
और अगर कभी अंधसमर्थन करने वाले लोगों की आंखें खुल गईं, वे अपनी राजनीतिक पसंद पर पुनर्विचार करने लगे, तो क्या तब सत्ता की गाड़ी चलाने के लिए नट-बोल्ट से बने रोबोटों की जरूरत पड़ेगी?
रोबोट सवाल नहीं पूछता। उसे जो निर्देश मिलता है, वह वही करता है। लेकिन लोकतंत्र में जनता रोबोट नहीं होती। जनता सोचती है, समझती है, गलती करती है, अपनी गलती सुधारती है और जरूरत पड़ने पर सत्ता भी बदल देती है।

यही लोकतंत्र की ताकत है।
करोड़पतियों की चमक और आम आदमी की हकीकत!
प्रधानमंत्री जी, देश में संपन्न लोग होना कोई अपराध नहीं है। उद्योगपति भी देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। लेकिन जब आम आदमी की आर्थिक परेशानियों पर चर्चा होती है, तब यह सवाल भी उठना चाहिए कि विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है।
क्या देश की आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन केवल बड़ी कंपनियों, शेयर बाजार और बड़े निवेश के आंकड़ों से किया जाएगा? या उस मजदूर की जिंदगी से भी, जो दिन भर मेहनत करने के बाद अपने बच्चों की फीस और घर का राशन जुटाने में परेशान है?
क्या उस बेरोजगार युवा की पीड़ा भी विकास के आंकड़ों में दिखाई देती है, जो वर्षों की पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में भटक रहा है?
देश के नागरिक को भाषण नहीं, अवसर चाहिए। उसे केवल आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए। उसे यह भरोसा चाहिए कि उसकी मेहनत से उसके परिवार का भविष्य बेहतर होगा।
यही असली राष्ट्रनिर्माण है।
रामदेव, गोमूत्र और कंपनियों पर व्यंग्य करने से पहले एक बात!
बाबा रामदेव या उनसे जुड़ी किसी कंपनी की आर्थिक स्थिति के बारे में बिना प्रमाण कोई दावा करना उचित नहीं होगा। लेकिन इस पूरे प्रसंग से एक राजनीतिक सवाल जरूर निकलता है।
क्या देश की राजनीति इतनी कमजोर हो गई है कि उसे हर समय किसी प्रतीक, किसी विवाद या किसी भावनात्मक मुद्दे के सहारे जनता का ध्यान बनाए रखना पड़े?
किसी कंपनी का कारोबार बाजार, मांग और प्रतिस्पर्धा से तय होता है। किसी नेता की लोकप्रियता का फैसला जनता करती है। लेकिन किसी सरकार की सफलता का फैसला उसके काम से होना चाहिए।
प्रधानमंत्री जी, देश को न गोमूत्र पर अनावश्यक विवाद चाहिए, न किसी समुदाय के प्रति नफरत। देश को चाहिए रोजगार, अच्छी शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, महिलाओं की सुरक्षा, जवाबदेह प्रशासन और ऐसी राजनीति जिसमें असहमति को भी सम्मान मिले।
महा सप्तमी पर मां दुर्गा से एक प्रार्थना!
मां दुर्गा को शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। आज उनके चरणों में यही प्रार्थना है कि देश के नागरिकों को इतनी विवेकशक्ति मिले कि वे नेता की प्रशंसा और उसके काम के बीच का अंतर समझ सकें।
सत्ता पक्ष को इतनी नैतिक शक्ति मिले कि वह आलोचना सुन सके। विपक्ष को इतनी जिम्मेदारी मिले कि वह जनता के वास्तविक मुद्दे उठाए। पत्रकारों को इतना साहस मिले कि वे बिना प्रमाण किसी पर आरोप न लगाएं और प्रमाण सामने आने पर किसी प्रभावशाली व्यक्ति से सवाल पूछने से पीछे न हटें।
और जनता को इतना आत्मविश्वास मिले कि वह किसी भी नेता से कह सके—आपका सम्मान अपनी जगह, लेकिन हमारे सवालों का जवाब दीजिए।

प्रधानमंत्री जी, अंतिम सवाल आपसे!
आपके पास मंत्रिमंडल है, प्रशासन है, संसाधन हैं और समर्थकों की बड़ी संख्या भी है। लेकिन क्या इनमें से कोई भी चीज जनता के विवेक की जगह ले सकती है?
आपके समर्थक आपकी ताकत हो सकते हैं, लेकिन उनकी आंखें और दिमाग उनकी अपनी संपत्ति हैं। वे आज आपका समर्थन करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि कल भी बिना सवाल किए आपका समर्थन करेंगे।
लोकतंत्र में जनता को हमेशा एक ही जवाब देना संभव नहीं है। कभी वह समर्थन करती है, कभी सवाल पूछती है और कभी अपना फैसला बदल देती है।
इसलिए प्रधानमंत्री जी, जनता को अंधसमर्थक बनाए रखने की चिंता छोड़िए। ऐसा काम कीजिए कि लोगों को आपका समर्थन करने के लिए तर्क मिलें, प्रमाण मिलें और अपने जीवन में बदलाव दिखाई दे।
क्योंकि जिस दिन राजनीति को नागरिकों के विवेक से डर लगने लगेगा, उस दिन समस्या नागरिकों में नहीं, राजनीति की दिशा में होगी।
याद रखिए—रोबोट आदेश मान सकता है, लेकिन लोकतंत्र नागरिकों की चेतना से चलता है।
महा सप्तमी के इस पावन अवसर पर जमीनी आवाज की ओर से देश की सत्ता और जनता, दोनों को यही संदेश है—आस्था व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन शासन सार्वजनिक जवाबदेही से चलता है।
सवाल पूछिए। प्रमाण मांगिए। काम का हिसाब लीजिए। क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल दर्शक नहीं, असली निर्णायक है।
— असित भट्टाचार्य
संपादक, जमीनी आवाज
खबरें जमीन की, जमाने की।