स्वागत बोर्ड, लेकिन सवालों से घिरा

घाटशिला रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही यात्रियों और आम लोगों की नजर जिस बोर्ड पर पड़ती है, उस पर लिखा है—"हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड आपका स्वागत करता है।" पहली नजर में यह बोर्ड घाटशिला और हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के पुराने औद्योगिक रिश्ते की तस्वीर पेश करता है। लेकिन इसी बोर्ड के आसपास की जमीन और उसकी वर्तमान स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

बताया जाता है कि जिस स्थान पर यह बोर्ड लगा है, वह रेलवे की जमीन है। कभी इसी क्षेत्र में हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का फॉरवर्डिंग ऑफिस हुआ करता था, जहां से मालगाड़ियों के माध्यम से अयस्क की आवाजाही होती थी। वक्त बदला, हालात बदले और आज वह फॉरवर्डिंग ऑफिस बंद पड़ा है।

लेकिन सवाल यह है कि जब फॉरवर्डिंग ऑफिस बंद है, तब स्वागत किसका और किस अधिकार से? फॉरवर्डिंग ऑफिस के आसपास उगी झाड़ियां और जंगल तथा परिसर में जमा कचरा व्यवस्था की एक अलग कहानी कहते हैं।

लीज खत्म हुई या अब भी कायम है?

जमीनी आवाज का सीधा सवाल है—क्या रेलवे और हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के बीच इस जमीन को लेकर लीज अथवा कोई अन्य वैधानिक समझौता आज भी प्रभावी है? अगर लीज समाप्त हो चुकी है तो रेलवे की जमीन पर HCL का बोर्ड किस अनुमति के आधार पर लगा है? और अगर लीज अभी भी जारी है तो उसकी शर्तें क्या हैं? जमीन के रखरखाव, सुरक्षा और स्वच्छता की जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों का जवाब किसी आरोप से नहीं, बल्कि दस्तावेज से मिल सकता है।

‘आपका स्वागत है’ का बोर्ड, लेकिन कचरे का स्वागत कौन कर रहा है?

एक तरफ स्टेशन से उतरने वाला व्यक्ति HCL के स्वागत बोर्ड को देखता है। दूसरी तरफ उसी बोर्ड के आसपास अगर जंगल और कचरा दिखाई दे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा स्वागत है? क्या स्वागत सिर्फ बोर्ड लगाने तक सीमित है? क्या कंपनी की सामाजिक जिम्मेदारी केवल कागजों और परियोजनाओं तक सीमित है, या उस जगह तक भी पहुंचती है जहां कंपनी के नाम का बोर्ड वर्षों से खड़ा है?

CSR पर भी उठता है सवाल

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की सामाजिक जिम्मेदारियों और CSR गतिविधियों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। लोगों का सवाल है कि कंपनी की CSR गतिविधियों का लाभ किन क्षेत्रों और किन परियोजनाओं तक पहुंच रहा है? क्या घाटशिला स्टेशन और उसके आसपास कंपनी की पुरानी औद्योगिक पहचान से जुड़े स्थानों की स्वच्छता और बुनियादी देखरेख CSR या कंपनी की सामाजिक जिम्मेदारी के दायरे में नहीं आ सकती?

प्लांट बंद, लेकिन गतिविधियों पर सवाल बरकरार

मऊभंडार प्लांट के बंद होने से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़े प्रभाव को लेकर स्थानीय लोगों की अपनी पीड़ा है। दूसरी ओर कंपनी के अधिकारी, कर्मचारी, सुरक्षा व्यवस्था और यूनियन की मौजूदगी आज भी क्षेत्र में दिखाई देती है। स्थानीय स्तर पर कंपनी की आवासीय संपत्तियों, फ्लैटों और दुकानों के लीज से जुड़े लेन-देन को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं।

जमीनी आवाज किसी व्यक्ति या कर्मचारी पर आरोप नहीं लगा रहा। सवाल सिर्फ इतना है कि यदि कंपनी की संपत्तियां लीज पर दी जा रही हैं तो उसकी पूरी प्रक्रिया, दरें, नियम और प्राप्त राशि सार्वजनिक क्यों न हो?

जमीनी आवाज के सवाल—जवाब सार्वजनिक होना चाहिए

घाटशिला अनुमंडल प्रशासन, रेलवे, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड प्रबंधन और कंपनी यूनियन से जमीनी आवाज के कुछ सीधे सवाल हैं:

  • घाटशिला स्टेशन के बाहर रेलवे की जमीन पर HCL का स्वागत बोर्ड किस अनुमति के आधार पर लगा है?
  • इस जमीन को लेकर रेलवे और HCL के बीच वर्तमान में कोई लीज/अनुमति/समझौता प्रभावी है या नहीं?
  • यदि लीज समाप्त हो चुकी है तो बोर्ड अब तक क्यों लगा हुआ है?
  • यदि लीज जारी है तो जमीन के रखरखाव और साफ-सफाई की जिम्मेदारी किसकी है?
  • बंद पड़े फॉरवर्डिंग ऑफिस के परिसर में जंगल और कचरे की स्थिति पर कंपनी और रेलवे की क्या जिम्मेदारी बनती है?
  • HCL की CSR राशि घाटशिला अनुमंडल में किन-किन योजनाओं पर खर्च हुई है?
  • कंपनी की संपत्तियों को लीज पर देने की वर्तमान प्रक्रिया क्या है और उससे कंपनी को कितनी राशि प्राप्त हो रही है?

सवाल बोर्ड से बड़ा है

यह सिर्फ एक पुराने बोर्ड की कहानी नहीं है। यह सवाल है जमीन के अधिकार का। यह सवाल है जवाबदेही का। यह सवाल है कंपनी और रेलवे के बीच हुए समझौतों की पारदर्शिता का। जमीनी आवाज का सवाल किसी संस्था को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस सवाल का जवाब मांगना है जो वर्षों से उसी बोर्ड की तरह वहीं खड़ा है—

"अगर यह जमीन आपकी जिम्मेदारी नहीं है, तो आपका बोर्ड यहां क्यों है? और अगर जिम्मेदारी आपकी है, तो यह बदहाली क्यों है?"