कचरा सिर्फ कचरा नहीं, व्यवस्था का आईना है
किसी शहर की असली तस्वीर उसके बड़े-बड़े भवनों से नहीं, बल्कि उसकी गलियों, नालियों और कचरे के ढेरों से दिखाई देती है। घाटशिला में लंबे समय से कचरे का उठाव, संग्रहण, नालियों की सफाई और उसके समुचित निष्पादन का सवाल गंभीर बना हुआ है। ऐसे में यह केवल सफाई व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, नागरिक सम्मान और स्वस्थ जीवन के अधिकार से जुड़ा सवाल बन चुका है।
सवाल सीधा है—क्या स्वच्छता प्रशासन की प्राथमिकता है या केवल बैठकों और कागजी योजनाओं का विषय?
घरेलू कचरा घर से निकलने के बाद कहां जाएगा, उसे कौन उठाएगा, किस स्थान पर संग्रहित किया जाएगा और उसका अंतिम निष्पादन किस तरह होगा—इन सवालों का स्पष्ट और स्थायी जवाब किसी भी व्यवस्थित शहरी क्षेत्र की बुनियादी आवश्यकता है। घाटशिला में यदि लंबे समय तक कचरा जमा रहता है और नालियां गंदगी से बजबजाती रहती हैं, तो सवाल केवल सफाईकर्मियों का नहीं, पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली का है।
‘सक्रिय संवेदना’ ने फिर उठाई मूल जनसमस्या
इसी गंभीर सवाल को लेकर सामाजिक संस्था ‘सक्रिय संवेदना’ ने उपायुक्त का ध्यान आकर्षित किया है। संस्था ने आवेदन देकर मांग की है कि घरेलू कचरे के निष्पादन की सुनिश्चित व्यवस्था की जाए। सूखे और गीले कचरे का नियमित उठाव हो तथा उसे किसी निर्धारित डंपिंग यार्ड में पहुंचाने की व्यवस्था बनाई जाए।
लेकिन ‘सक्रिय संवेदना’ की पहल केवल समस्या बताने तक सीमित नहीं है। संस्था की ओर से समस्या के समाधान के विकल्पों पर भी ध्यान दिलाया गया है।
विजय कुमार पाण्डेय ने बताया समाधान का रास्ता
‘सक्रिय संवेदना’ से जुड़े विजय कुमार पाण्डेय ने कहा कि घाटशिला में कचरा प्रबंधन को केवल कचरा उठाकर कहीं फेंक देने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसके लिए रिसाइक्लिंग की भी योजना बनाई जानी चाहिए, ताकि उपयोगी कचरे का पुनः इस्तेमाल हो सके और कचरे की समस्या को स्थायी रूप से नियंत्रित किया जा सके।
उन्होंने बताया कि लगभग एक वर्ष पूर्व अनुमंडलाधिकारी कार्यालय में आयोजित बैठक में कचरा निष्पादन को लेकर विस्तृत योजना बनी थी। उस बैठक में मऊभण्डार कॉपर के उच्चाधिकारियों ने भी वैकल्पिक व्यवस्था होने तक अपने डंपिंग यार्ड के इस्तेमाल की सहमति दी थी।
विजय कुमार पाण्डेय के अनुसार, मऊभण्डार के डंपिंग यार्ड में घाटशिला का कचरा फेंका जा सकता है और इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक समन्वय किया जा सकता है। जब एक संभावित डंपिंग स्थल की व्यवस्था सामने थी और इस पर सहमति भी बन चुकी थी, तो फिर यह योजना आगे क्यों नहीं बढ़ सकी—यह सवाल अब प्रशासनिक जवाब मांगता है।
"रिसाइक्लिंग की योजना बने, केवल डंपिंग से काम नहीं चलेगा"
विजय कुमार पाण्डेय का जोर इस बात पर भी है कि घाटशिला को कचरे की समस्या से स्थायी मुक्ति दिलाने के लिए कचरे के रिसाइक्लिंग की व्यवस्थित योजना बनाई जाए। इसका अर्थ यह है कि गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र किया जाए, उपयोगी सामग्री को अलग किया जाए और उसके पुनर्चक्रण की व्यवस्था विकसित की जाए।
ऐसी व्यवस्था से एक ओर शहर में कचरे का दबाव कम हो सकता है, वहीं दूसरी ओर कचरे से उपयोगी सामग्री निकालने और उसके पुनः उपयोग की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। अर्थात सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि "कचरा कहां फेंकें?" सवाल यह भी होना चाहिए—"कचरे का कितना हिस्सा दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है?"
एक साल पहले की बैठक आज भी सवालों के घेरे में
लगभग एक वर्ष बीतने के बावजूद यदि उस बैठक में बनी योजना का स्थायी परिणाम सामने नहीं आया है तो अब उसकी समीक्षा जरूरी है।
- क्या प्रस्ताव पर आगे कोई कार्रवाई हुई?
- क्या डंपिंग यार्ड के इस्तेमाल को लेकर औपचारिक प्रक्रिया पूरी हुई?
- क्या वैकल्पिक स्थल तलाशा गया?
- क्या कचरा उठाव और परिवहन की जिम्मेदारी तय हुई?
और यदि नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? जनता को इन सवालों के जवाब मिलने चाहिए।
प्रो. मित्रेश्वर: उम्र के अंतिम पड़ाव में भी समाज के सवालों से जुड़े
इस पूरी पहल का सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष प्रो. मित्रेश्वर की सामाजिक सक्रियता है। उम्र के अंतिम पड़ाव में भी उन्होंने स्वयं को समाज के सवालों से अलग नहीं किया। घर पर रहकर भी सामाजिक समस्याओं पर विचार करना, उन्हें सामने लाना और संबंधित प्रशासन का ध्यान आकृष्ट करना उनके लिए केवल कोई औपचारिक गतिविधि नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी है। इसी सामाजिक सोच से ‘सक्रिय संवेदना’ जैसी पहल का जन्म हुआ।
प्रो. मित्रेश्वर का स्पष्ट विचार है कि स्वच्छ जीवन मानवाधिकार का मसला है और कोई भी कल्याणकारी व्यवस्था इसे अस्वीकार नहीं कर सकती। उनके अनुसार मल-मूत्र और गंदगी से भरी नालियां केवल शहर की बदसूरती नहीं बतातीं, बल्कि यह भी बताती हैं कि नागरिकों के स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।
नालियों की सफाई भी उतनी ही जरूरी
कचरा उठाव के साथ नालियों की नियमित सफाई भी जरूरी है। गंदगी से भरी नालियां जलनिकासी और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए चुनौती बन सकती हैं। इसलिए प्रशासन को केवल कचरा उठाने की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि नालियों की नियमित सफाई, निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।
पंचायत से जिला स्तर तक तय हो जिम्मेदारी
‘सक्रिय संवेदना’ का मानना है कि ग्राम पंचायत से लेकर पंचायत समिति और जिला परिषद तक आवश्यक निर्देश देकर इस समस्या के समाधान की दिशा में काम किया जा सकता है। प्रखंड और अनुमंडल स्तर पर भी समन्वय स्थापित किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि किसकी क्या जिम्मेदारी है, यह स्पष्ट हो। क्योंकि जब जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं होती तो समस्या एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक घूमती रहती है और जनता के हिस्से में केवल इंतजार आता है।
अब यक्ष प्रश्न: घाटशिला की स्वच्छता कब बनेगी प्राथमिकता?
घाटशिला में कचरा निष्पादन का सवाल नया नहीं है। लोगों ने आवाज उठाई। संस्थाओं ने गुहार लगाई। बैठक हुई। योजना बनी। डंपिंग यार्ड के वैकल्पिक इस्तेमाल की सहमति की बात सामने आई। फिर भी समस्या आज सवाल बनकर खड़ी है।
इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि घाटशिला का कचरा कब उठेगा? बल्कि सवाल यह है—
- "एक वर्ष पहले बनी योजना का क्या हुआ?"
- "मऊभण्डार डंपिंग यार्ड के इस्तेमाल की सहमति के बाद भी व्यवस्था जमीन पर क्यों नहीं उतरी?"
- "घाटशिला के लिए स्थायी कचरा प्रबंधन और रिसाइक्लिंग योजना कब बनेगी?"
और सबसे बड़ा सवाल—"स्वच्छ और स्वस्थ जीवन का सवाल प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता सूची में आखिर कब जगह पाएगा?"
‘सक्रिय संवेदना’ ने सवाल सामने रख दिया है। विजय कुमार पाण्डेय ने समाधान के विकल्प भी सामने रख दिए हैं। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्योंकि कचरा उठाना महज सफाई का काम नहीं—यह नागरिक के सम्मान, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन से जुड़ी जिम्मेदारी है। और किसी भी शहर की सभ्यता का सबसे सच्चा प्रमाण यही है कि वह अपने कचरे के साथ कितना जिम्मेदार व्यवहार करता है।





