एक बच्चा नहीं, एक पूरा सवाल
किसी सरकारी फाइल में यह बच्चा शायद सिर्फ एक संख्या हो सकता है। किसी योजना में वह किसी लाभार्थी की श्रेणी में आता हो सकता है। लेकिन फूलडूंगरी में उसे देखकर लगा कि वह संख्या नहीं, एक पूरा सवाल है—उसके बचपन का, उसकी पहचान का, उसके भविष्य का।

फूलडूंगरी में दारू दुकान के आसपास एक बच्चा लोगों से पैसे मांगता दिखाई दिया। बातचीत करने की कोशिश की गई तो वह अपना नाम तक स्पष्ट रूप से नहीं बता पा रहा था। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार वह सबर समुदाय से जुड़ा बताया गया, हालांकि उसकी जातीय पहचान और पारिवारिक स्थिति की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग से होना बाकी है।
मां-बाप हैं, फिर भी बच्चा सड़क पर क्यों?
स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार बच्चे के माता-पिता आसपास ही रहते हैं और परिवार नशे की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। परिवार की परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि किए बिना उन्हें आरोप के रूप में प्रकाशित करना उचित नहीं होगा, लेकिन एक बात आंखों के सामने थी—बच्चा सड़क पर था और दुकान-दुकान जाकर पैसे मांग रहा था।
रिंकू सिंह के होटल में मिली छत और भोजन
बच्चे की स्थिति को समझने के लिए दोबारा उसे तलाशने की कोशिश की गई तो वह रिंकू सिंह के होटल में कोल्ड ड्रिंक पीता मिला। स्थानीय जानकारी के अनुसार होटल खुलने के बाद से यह बच्चा वहां आता-जाता रहा है और अपनी पसंद का खाना मांगकर खाता है। होटल संचालक रिंकू सिंह उसके साथ मानवीय व्यवहार करते हैं और जरूरत के समय भोजन उपलब्ध कराते हैं।
एक तरफ सरकारी तंत्र है, जिसके पास योजनाएं, विभाग, बजट और बाल संरक्षण की संस्थागत व्यवस्था है। दूसरी तरफ एक होटल संचालक है, जिसके पास कोई सरकारी पद या बड़ा बजट नहीं—लेकिन उसने एक बच्चे को भूखा नहीं रहने दिया।
क्या सरकार को इस बच्चे की जानकारी है?
केंद्र सरकार की Mission Vatsalya व्यवस्था में बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए जिला स्तर पर District Child Protection Unit (DCPU), Child Welfare Committee (CWC) और Child Helpline जैसी व्यवस्थाएं हैं। इस योजना के लक्षित बच्चों में सड़क पर रहने वाले बच्चे, बाल भिक्षावृत्ति से जुड़े बच्चे तथा नशे या शोषण से प्रभावित बच्चे भी शामिल हैं। ऐसे में फूलडूंगरी का यह बच्चा सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि बाल संरक्षण व्यवस्था की जमीनी परीक्षा है।
सबर समुदाय के नाम पर योजनाएं बहुत, जमीन पर क्या?
झारखंड सरकार का कल्याण विभाग अनुसूचित जनजातियों सहित कमजोर वर्गों के सर्वांगीण विकास के लिए जिम्मेदार है और राज्य में PVTG Development Authority की व्यवस्था भी दर्ज है। सबर जैसे अत्यंत कमजोर जनजातीय समुदाय के मामले में विकास का मतलब केवल राशन, आवास या आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होना चाहिए—विकास का सबसे पहला पैमाना बच्चे का सुरक्षित बचपन होना चाहिए।
जमीनी आवाज के आठ सवाल
- क्या प्रशासन ने फूलडूंगरी क्षेत्र में इस बच्चे का सर्वे किया है?
- क्या जिला बाल संरक्षण इकाई को इस बच्चे की जानकारी है?
- क्या बाल कल्याण समिति ने ऐसे बच्चों की पहचान और पुनर्वास के लिए कार्रवाई की है?
- क्या बच्चे की उम्र, पहचान और पारिवारिक स्थिति की जांच हुई है?
- क्या वह स्कूल से जुड़ा है?
- यदि परिवार नशे की समस्या से जूझ रहा है तो नशामुक्ति और पुनर्वास की कोई पहल हुई है?
- क्या सबर समुदाय के बच्चों की स्थिति जानने के लिए नियमित सर्वेक्षण होता है?
- यदि सरकारी योजनाएं उपलब्ध हैं तो उनका लाभ इस बच्चे तक क्यों नहीं पहुंचा?
अब कार्रवाई कैसी होनी चाहिए?
प्रशासन को सबसे पहले बच्चे को अपराधी या भिखारी की तरह देखने के बजाय देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चे के रूप में देखना चाहिए। जमीनी स्तर पर जरूरी कदमों में बच्चे की सुरक्षित पहचान और उम्र का सत्यापन, तत्काल स्वास्थ्य व पोषण जांच, स्कूल से जोड़ने की कार्रवाई, परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की जांच, नशामुक्ति एवं पुनर्वास से जोड़ना, शोषण या तस्करी की आशंका की जांच, तथा DCPU और CWC स्तर पर केस का आकलन शामिल है।
जरूरत पड़ने पर Child Helpline 1098 और आपात स्थिति में 112 से सहायता ली जा सकती है।
सरकार से सीधा सवाल
आदिवासी समाज के उत्थान की योजनाएं बनना जरूरी है, बजट बनना जरूरी है, अधिकारी नियुक्त होना जरूरी है—लेकिन इन सबसे ज्यादा जरूरी है योजनाओं का उस बच्चे तक पहुंचना, जो अपना नाम तक नहीं बता पा रहा। किसी भी सरकार की असली सफलता उसके बड़े मंचों और आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस बच्चे के चेहरे पर दिखाई देती है जिसे समाज ने सबसे पीछे छोड़ दिया था।
फूलडूंगरी का यह बच्चा किसी राजनीतिक दल का सवाल नहीं है। यह मानवता का सवाल है, यह बाल अधिकार का सवाल है, यह सबर समाज के भविष्य का सवाल है। जमीनी आवाज पूछता है—कागजों से निकलकर योजनाएं कब पहुंचेंगी जमीन पर?





