शिक्षा अगर केवल किताबों और परीक्षाओं तक सीमित रह जाए तो वह अधूरी है। शिक्षा का वास्तविक विस्तार तब होता है, जब वह व्यक्ति को अपने मन, विचार, व्यवहार और समाज के प्रति जिम्मेदारियों को समझने की दिशा दिखाए। इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला के स्वामी विवेकानंद सभागार में बौद्ध अध्ययन के अंतर्गत “बौद्ध अध्ययन में मंत्र-जप का महत्व” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में बौद्ध दर्शन को केवल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से देखने के बजाय उसके दार्शनिक, नैतिक, मानसिक और सामाजिक आयामों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने विद्यार्थियों को बताया कि ध्यान, एकाग्रता, आत्म-अनुशासन, करुणा और मैत्री जैसी अवधारणाएं बौद्ध चिंतन की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं और इनका अध्ययन व्यक्ति को अपने विचारों तथा व्यवहार को समझने का अवसर दे सकता है।
मंत्र-जप केवल उच्चारण नहीं, सजगता और एकाग्रता का अभ्यास भी
कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय की सहायक कुलसचिव श्रीमती अर्चना सिंह ने किया। विषय की भूमिका रखते हुए उन्होंने कहा कि बौद्ध अध्ययन में मंत्र-जप को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि चित्त की एकाग्रता, ध्यान, मानसिक अनुशासन और आत्म-जागरूकता के अभ्यास के रूप में भी समझा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि मंत्र की पुनरावृत्ति का महत्व केवल शब्दों के उच्चारण में नहीं, बल्कि उस दौरान मन की सजगता में निहित है। व्यक्ति जब ध्यानपूर्वक मंत्र का उच्चारण करता है, तो उसका ध्यान बार-बार वर्तमान क्षण की ओर लौटता है। इस दृष्टि से मंत्र-जप ध्यान और आत्म-जागरूकता के अभ्यास का माध्यम बन सकता है।
मुख्य वक्ता ने विद्यार्थियों को कराया मंत्रोच्चारण का अनुभव
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता मोन्क डॉ. चन्द्र कीर्ति, विभागाध्यक्ष, बौद्ध अध्ययन विभाग, स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ, उत्तर प्रदेश ने बौद्ध दर्शन और मंत्र-जप के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को मंत्रोच्चारण की प्रक्रिया से जोड़ते हुए एकाग्रता, चेतना, ध्यान, आध्यात्मिक जागरूकता, ज्ञान और सकारात्मक चिंतन जैसे विषयों को सरल ढंग से समझाया।
उन्होंने कहा कि मंत्र-जप को शब्दों की यांत्रिक पुनरावृत्ति मानना इसके व्यापक संदर्भ को सीमित कर देना होगा। इसके साथ जागरूकता, ध्यान, भाव और आत्म-अनुशासन का समन्वय महत्वपूर्ण है। सजगता के साथ किया गया अभ्यास व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को देखने-समझने का अवसर दे सकता है।
एकाग्रता से करुणा तक—मंत्र-जप के कई आयाम
व्याख्यान के दौरान डॉ. चन्द्र कीर्ति ने मंत्र-जप के विभिन्न पहलुओं को विद्यार्थियों के सामने व्यावहारिक रूप में रखा।
चित्त की एकाग्रता: उन्होंने बताया कि मन का स्वभाव लगातार अलग-अलग विचारों और विषयों की ओर भटकना है। मंत्र की पुनरावृत्ति ध्यान को एक बिंदु पर केंद्रित करने का अभ्यास प्रदान कर सकती है।
मानसिक शांति और संतुलन: लयबद्ध मंत्रोच्चारण को विचारों की गति को धीमा करने और आंतरिक स्थिरता के अभ्यास से जोड़कर समझाया गया।
करुणा और मैत्री: बौद्ध दर्शन में करुणा और मैत्री की केंद्रीय भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने तिब्बती बौद्ध परंपरा में प्रचलित “ॐ मणि पद्मे हूँ” का उदाहरण दिया और इसे अवलोकितेश्वर से जुड़ी करुणा की परंपरा के संदर्भ में समझाया।
ध्यान और अनुशासन: उन्होंने कहा कि किसी भी आध्यात्मिक अभ्यास का महत्व केवल बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर जागरूकता, धैर्य और आत्म-अनुशासन के विकास में देखा जाना चाहिए।
परंपरा और संस्कृति: बौद्ध धर्म की विभिन्न शाखाओं में मंत्रों की अलग-अलग भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने विशेष रूप से वज्रयान परंपरा में मंत्र, ध्यान और साधना के संबंध को समझाया।
ध्वनि और मन: मंत्र की ध्वनि, लय और पुनरावृत्ति किस प्रकार ध्यान को वर्तमान क्षण की ओर केंद्रित करने का माध्यम बन सकती है, इस पहलू पर भी विद्यार्थियों को जानकारी दी गई।
मुख्य वक्ता को किया गया सम्मानित
कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने मुख्य वक्ता मोन्क डॉ. चन्द्र कीर्ति को सम्मानित किया।
कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास है कि विद्यार्थियों को अलग-अलग ज्ञान परंपराओं, दर्शन और चिंतन धाराओं से परिचित कराया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों के ज्ञान को कक्षा की सीमाओं से बाहर ले जाकर उन्हें व्यापक मानवीय और दार्शनिक दृष्टिकोण से जोड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि बौद्ध दर्शन भारतीय दार्शनिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विद्यार्थियों को ऐसी ज्ञान-परंपराओं का अध्ययन करना चाहिए, जो उनमें प्रश्न करने, चिंतन करने और अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझने की क्षमता विकसित करें।
“शिक्षा सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं”—कुलाधिपति ने विद्यार्थियों को दिया संदेश
कार्यक्रम में कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए शिक्षा के व्यापक उद्देश्य पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का लक्ष्य केवल प्रमाणपत्र या डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति में ज्ञान, विवेक, अनुशासन, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना है।
उन्होंने कहा कि तकनीकी और भौतिक विकास के दौर में मानसिक संतुलन और मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखना भी जरूरी है। बौद्ध दर्शन में मौजूद आत्मचिंतन, करुणा, मैत्री और संयम जैसे विचार विद्यार्थियों को व्यापक जीवन-दृष्टि विकसित करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे ज्ञान को अपने जीवन से जोड़ें, अनुशासन को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें।
कुलसचिव ने कहा—समग्र व्यक्तित्व विकास भी विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी
कुलसचिव डॉ. नीत नयना ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल पाठ्यक्रम आधारित शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व विकास के लिए भी प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि आज विद्यार्थियों के सामने शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा के साथ सामाजिक और मानसिक चुनौतियां भी हैं। ऐसे समय में ध्यान, आत्म-अनुशासन, सकारात्मक चिंतन और मानवीय मूल्यों की समझ संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक हो सकती है।
उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे ज्ञान को परीक्षा और डिग्री तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने आचरण और जीवन-मूल्यों में भी उतारने का प्रयास करें।
वरिष्ठ अतिथि का सम्मान
कार्यक्रम में जी.एम. वानखेड़े, सेवानिवृत्त प्रबंधक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, नागपुर की गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने कार्यक्रम में सहभागिता करते हुए विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय परिवार का उत्साहवर्धन किया।
राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. शिवचन्द्र झा ने जी.एम. वानखेड़े को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया। डॉ. झा ने कहा कि अनुभवी एवं वरिष्ठ व्यक्तित्वों की शैक्षणिक कार्यक्रमों में सहभागिता विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी होती है और उनके अनुभवों से नई पीढ़ी को सीखने का अवसर मिलता है।
विद्यार्थियों ने प्रत्यक्ष रूप से समझा मंत्र-जप और बौद्ध चिंतन
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को मंत्रोच्चारण, बौद्ध दर्शन तथा मंत्र-जप की विभिन्न अवधारणाओं को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। इससे विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण में दर्शन, ध्यान, आत्मचिंतन और मानवीय मूल्यों से जुड़ी चर्चा को नया आयाम मिला।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, कर्मचारी तथा छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। उपस्थित लोगों ने मुख्य वक्ता के विचारों को रुचिपूर्वक सुना।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि ज्ञान केवल पुस्तकों में दर्ज जानकारी नहीं, बल्कि मन, विचार, व्यवहार और जीवन-दृष्टि को बेहतर बनाने की निरंतर प्रक्रिया भी है।