नई दिल्ली। क्या गांधी सिर्फ इतिहास की किताबों में हैं, या आज भी उनके विचारों के साथ समाज के बीच चला जा सकता है? इसी सवाल को जमीन पर तलाशती ‘एक कदम गांधी के साथ पदयात्रा–कारवां प्यार का’ डॉक्यूमेंट्री फिल्म का शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित जवाहर भवन में प्रीमियर हुआ।

56 दिनों और 1,000 किलोमीटर की पदयात्रा पर आधारित फिल्म

सर्व सेवा संघ द्वारा आयोजित बनारस से दिल्ली तक 56 दिनों और करीब 1,000 किलोमीटर की पदयात्रा पर आधारित इस करीब 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में यात्रा के अलग-अलग पड़ावों, लोगों से संवाद, अनुभवों और पदयात्रियों की संवेदनाओं को संवेदनशील अंदाज में सामने रखा गया है। फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान दिल्ली की सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों, छात्र-छात्राओं और पदयात्रा में शामिल रहे साथियों की मौजूदगी रही। स्क्रीनिंग के बाद दर्शकों ने फिल्म की प्रस्तुति और उसके संदेश की सराहना की।

कार्यक्रम में सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। फिल्म स्क्रीनिंग के बाद चंदन पाल के साथ अमित सौम्य, जय मौर्या और गौरव पुरोहित ने अपने विचार साझा किए।

100 घंटे के सफर को 30 मिनट की कहानी में पिरोया

इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में नई दिल्ली स्थित Sparrow Communication की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पदयात्रा के दौरान रिकॉर्ड किए गए 100 घंटे से अधिक के फुटेज को करीब 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में ढालने का चुनौतीपूर्ण काम मोहम्मद फरमान ने किया। फिल्म के सुपरविजन की जिम्मेदारी संजय कुमार (Sparrow Communication) ने संभाली। कैमरा टीम में कौशल कुशराम, ऋतिक दावर, अन्नू सारथी, रेवा सोलंकी और विकास कुमार ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

फिल्म में शामिल इंटरव्यू के समन्वय में गौरव पुरोहित की भूमिका रही, जबकि श्वेता ने डॉक्यूमेंट्री को अपनी आवाज दी। पटकथा लेखन में अरविंद अंजुम और विकास कुमार शामिल रहे।

खादी के अंगवस्त्र से सम्मान, गीत से शुरू हुआ कार्यक्रम

फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले जसवीर सिंह ने गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन सर्व सेवा संघ के मंत्री अरविंद अंजुम ने किया। कार्यक्रम के दौरान Sparrow Communication से जुड़े संजय भाई और हर्ष को सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल द्वारा खादी अंगवस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।

‘एक कदम गांधी के साथ’ की यह डॉक्यूमेंट्री सिर्फ 56 दिनों की यात्रा का दृश्य दस्तावेज नहीं, बल्कि उन अनुभवों और संवादों को सहेजने की कोशिश है, जो बनारस से दिल्ली तक पैदल चलते हुए लोगों के बीच बने। ‘कारवां प्यार का’ के रूप में यह यात्रा अब सिनेमा के जरिए उन लोगों तक पहुंच रही है, जो इस सफर का हिस्सा नहीं बन सके।