गांधी का कोई विकल्प नहीं—क्योंकि गांधी एक व्यक्ति नहीं, सवाल पूछने की हिम्मत का नाम हैं


जमीनी आवाज | संपादकीय

गांधी का विकल्प कौन है?

यह सवाल सुनने में जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। क्योंकि गांधी का विकल्प किसी दूसरे नेता का नाम नहीं हो सकता। गांधी कोई कुर्सी नहीं थे, जिसे दूसरी कुर्सी से बदला जा सके। गांधी कोई चुनावी चिन्ह नहीं थे, जिसे दूसरे चुनावी चिन्ह से प्रतिस्थापित किया जा सके।

गांधी एक असुविधाजनक सवाल थे—और आज भी हैं।

वह सवाल जो सत्ता से पूछता है—आपके विकास में आखिरी आदमी कहां खड़ा है?

वह सवाल जो समाज से पूछता है—जिसके पास आवाज नहीं है, क्या उसकी चुप्पी को उसकी सहमति मान लिया जाए?

वह सवाल जो पत्रकार से पूछता है—तुम्हारी कलम ताकतवर के दरवाजे पर झुकती है या उस आदमी तक जाती है, जिसकी आवाज वहां तक पहुंचती ही नहीं?

और शायद यही कारण है कि गांधी को समझना आसान नहीं है।

गांधी को केवल चश्मे, चरखे, लाठी और तस्वीर में रख देने से गांधी समझ में नहीं आते। गांधी को समझना है तो उस आदमी की आंखों में देखना होगा, जिसके पास अपनी बात कहने के लिए कोई मंच नहीं है।

गांधी का असली अर्थ शायद वहीं से शुरू होता है।

आज राजनीति में आवाज बहुत है, लेकिन सुनने की क्षमता कितनी है?

हर तरफ भाषण हैं, घोषणाएं हैं, आरोप हैं, प्रत्यारोप हैं। सोशल मीडिया पर शब्दों की बाढ़ है। लेकिन गांव की वह आवाज कहां है जो राशन की दुकान तक पहुंचते-पहुंचते थक जाती है? वह मजदूर कहां है जिसकी मजदूरी फाइल में दर्ज है, लेकिन जेब में नहीं? वह किसान कहां है जिसकी जमीन पर योजनाओं के नक्शे बनते हैं, मगर उसकी राय अक्सर आखिरी पन्ने पर भी नहीं होती?

गांधी शायद इसी जगह खड़े दिखाई देते हैं।

सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारे में नहीं—सबसे कमजोर आदमी के दरवाजे पर।

इसलिए गांधी को किसी एक दल, विचारधारा या राजनीतिक खेमे की संपत्ति मानना भी उनके विचारों को छोटा करना है।

गांधी को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि उनके हर विचार पर बहस बंद कर दी जाए। लोकतंत्र में गांधी से असहमति भी हो सकती है, उनके निर्णयों की आलोचना भी हो सकती है और उनके ऐतिहासिक योगदान पर गंभीर बहस भी हो सकती है।

लेकिन एक बात पर बहस कठिन है—

अन्याय के सामने खड़े होने की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।

अहिंसा पर बहस हो सकती है, सत्याग्रह के तरीकों पर बहस हो सकती है, गांधी की राजनीति पर बहस हो सकती है।

लेकिन जब कोई कमजोर व्यक्ति न्याय मांगता है, तब उसके साथ खड़े होने का सवाल आज भी उतना ही जिंदा है।

यही गांधी की सबसे बड़ी चुनौती है।

गांधी की सबसे बड़ी मूर्ति शायद किसी चौराहे पर नहीं है

वह उस पत्रकार की कलम में है जो दबाव के बावजूद दस्तावेज देखकर खबर लिखता है।

वह उस अधिकारी के निर्णय में है जो प्रभावशाली व्यक्ति के बजाय नियम देखता है।

वह उस शिक्षक में है जो बच्चों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, इंसान बनने के लिए तैयार करता है।

वह उस ग्रामीण महिला में है जो अपने गांव के पानी के लिए अकेली आवाज उठाती है।

वह उस मजदूर में है जो अपनी मेहनत की पूरी मजदूरी मांगते हुए कहता है—“मैं भी इंसान हूं।”

और वह उस नागरिक में है जो सवाल पूछता है, लेकिन नफरत को अपना हथियार नहीं बनाता।

आज गांधी की तस्वीर हर जगह मिल सकती है।

लेकिन गांधी का रास्ता?

वह अभी भी तलाशना पड़ता है।

शायद इसलिए गांधी का कोई विकल्प नहीं है।

क्योंकि विकल्प किसी व्यक्ति का नहीं, उस नैतिक सवाल का होना चाहिए जो गांधी हमारे सामने छोड़ गए।

अगर समाज में सबसे कमजोर व्यक्ति लगातार पीछे छूट रहा है, तो गांधी का सवाल जिंदा है।

अगर सत्ता से सवाल पूछना अपराध समझा जाने लगे, तो गांधी का सवाल जिंदा है।

अगर सत्य से ज्यादा सुविधा महत्वपूर्ण हो जाए, तो गांधी का सवाल जिंदा है।

अगर राजनीति में विरोध का मतलब दुश्मनी और असहमति का मतलब देशद्रोह समझ लिया जाए, तो गांधी का सवाल जिंदा है।

और अगर पत्रकारिता में खबर से ज्यादा खबर का सौदा महत्वपूर्ण हो जाए, तो गांधी का सवाल शायद सबसे ज्यादा जरूरी हो जाता है।

जमीनी आवाज का मानना है—गांधी को पूजने से ज्यादा जरूरी है गांधी से सवाल करना और गांधी के सवालों को अपने समय में जिंदा रखना।

क्योंकि लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट देने का नाम नहीं है।

लोकतंत्र का अर्थ है—सत्ता से सवाल पूछने की आजादी, कमजोर की बात सुनने की जिम्मेदारी और असहमति के लिए जगह।

गांधी इसी लोकतांत्रिक आत्मा की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आवाज हैं।

इसलिए आज गांधी को खोजने के लिए किसी मूर्ति के पास जाने की जरूरत नहीं।

गांव की टूटी सड़क पर जाइए।

सरकारी अस्पताल की कतार में खड़े हो जाइए।

मजदूर के घर बैठिए।

किसान की जमीन पर जाइए।

उस परिवार से मिलिए जिसकी शिकायत महीनों से फाइल में पड़ी है।

जहां कोई अपनी आवाज सुनाने के लिए संघर्ष कर रहा होगा—

वहीं गांधी के सवाल खड़े मिलेंगे।

और शायद यही गांधी की सबसे बड़ी विडंबना भी है।

जिस देश ने गांधी को राष्ट्रपिता कहा, उसी देश को आज भी बार-बार यह तय करना पड़ता है कि वह सबसे कमजोर नागरिक के साथ कितना खड़ा है।

इसलिए गांधी का विकल्प खोजने से पहले एक दूसरा सवाल पूछिए—

क्या हमने गांधी के सवालों का जवाब देना शुरू कर दिया है?

अगर जवाब नहीं है, तो गांधी अभी खत्म नहीं हुए।

गांधी की जरूरत अभी बाकी है।

— जमीनी आवाज

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