चांडिल डैम 181 RL पार, खेत बने जलाशय—विस्थापितों की फसल डूबी, विकास के दावों पर उठे सवाल

30 से अधिक गांवों के खेतों में कमरभर पानी, पकने के मुहाने पर खड़ी धान की फसल बर्बादी के कगार पर; किसानों का सवाल—डैम की उपलब्धियों में हमारी डूबी फसल का हिसाब कौन देगा?

24–48 घंटे पानी नहीं उतरा तो सड़ सकती है हजारों एकड़ की फसल, किसानों ने तत्काल जलस्तर प्रबंधन, सर्वे और मुआवजे की मांग उठाई

लगातार बारिश और सुवर्णरेखा परियोजना से पानी छोड़े जाने के बाद चांडिल डैम का जलस्तर शुक्रवार शाम 4 बजे 181 RL मीटर के पार पहुंच गया। जलस्तर बढ़ते ही डूब क्षेत्र के दर्जनों गांवों के निचले खेत जलमग्न हो गए हैं। खेतों में कमरभर पानी भरने से पकने के मुहाने पर पहुंच चुकी धान की फसल पर संकट गहरा गया है।

इन गांवों में सबसे ज्यादा असर

कुकड़ू, नीमडीह, चांडिल और ईचागढ़ प्रखंड के 30 से अधिक गांवों के निचले इलाकों में खेतों के डूबने की सूचना है:

  • कुकड़ू प्रखंड: बांदाबीर, केंदाआन्दा, आदारडीह, चौका, कारकीडीह, चानो-चोराटखाल
  • नीमडीह प्रखंड: हुटू, आंडा, तिलाईटांड़, कल्याणपुर, लावा, सीमा
  • चांडिल प्रखंड: रसुनिया, हाथीनादा, रूयानी, पियालडीह, बोराबिंदा, केशरगड़िया, डिमुडीह
  • ईचागढ़ प्रखंड: दियाडीह, रुगड़ी, खोकरो, मैसाढ़ा, गाराडीह, मातकमडीह, लोपसोडीह, छोटा आमड़ा, हुटुप, ईचागढ़, पातकुम, हुरलूंग

धान की बालियां पानी में, किसानों की पूरी मेहनत डूबने का खतरा

किसानों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि जिस धान की फसल से कुछ ही समय बाद घर में अनाज आने वाला था, वही फसल अब पानी में डूबी हुई है। किसानों का कहना है कि यदि अगले 24 से 48 घंटे में खेतों से पानी नहीं निकला, तो लंबे समय तक पानी में डूबी फसल सड़ने की आशंका है।

यानी सवाल सिर्फ खेतों में पानी भरने का नहीं, बल्कि किसानों की महीनों की मेहनत, बीज, खाद, मजदूरी और आने वाले पूरे कृषि मौसम पर पड़े आर्थिक असर का है।

विस्थापित अधिकार मंच का सवाल—परियोजना की उपलब्धि किसके लिए?

विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने परियोजना प्रबंधन और प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चांडिल परियोजना के लिए विस्थापितों ने अपनी जमीन, घर और आजीविका गंवाई, लेकिन आज उसी परियोजना के जलस्तर के कारण उनकी खेती संकट में है।

उन्होंने आरोप लगाया कि खेतों में पानी घुसने की शिकायत के लिए किसान अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास करते हैं, लेकिन मुख्य अभियंता और कार्यपालक अभियंता से संपर्क नहीं हो पाता।

यदि चांडिल परियोजना को उसकी उपलब्धियों के लिए सम्मान मिल रहा है, तो उस परियोजना से प्रभावित विस्थापित किसानों की डूबती फसल और आजीविका की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

अब सबसे बड़ा सवाल

  • क्या जलस्तर बढ़ाने से पहले डूब क्षेत्र के किसानों को पर्याप्त सूचना दी गई?
  • क्या परियोजना प्रबंधन के पास गांववार आपातकालीन सूचना और संपर्क व्यवस्था है?
  • अगर किसानों की फसल डूबती है तो नुकसान का सर्वे कौन करेगा और मुआवजा कब मिलेगा?
  • क्या किसी परियोजना की सफलता का पैमाना सिर्फ उसके आंकड़े और उपलब्धियां हैं, या उस परियोजना से प्रभावित विस्थापित परिवारों की सुरक्षित आजीविका भी उसकी जिम्मेदारी है?

किसानों ने मांगा तत्काल हस्तक्षेप

प्रभावित किसानों और विस्थापित अधिकार मंच ने मांग की है कि जलस्तर का तत्काल प्रबंधन किया जाए, खेतों से पानी निकालने की व्यवस्था की जाए और प्रभावित क्षेत्रों का तत्काल सर्वे कराया जाए। किसानों को फसल क्षति का उचित मुआवजा देने के साथ-साथ भविष्य में जलस्तर बढ़ने से पहले डूब क्षेत्र के ग्रामीणों को अनिवार्य सूचना देने की व्यवस्था की मांग भी उठाई गई है।

किसानों की चिंता साफ है—अगर पानी खेतों में रहा तो फसल बर्बाद होगी, और अगर फसल बर्बाद हुई तो परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूटेगी।

अब देखना यह है कि 181 RL पार कर चुके चांडिल डैम के पानी से जूझ रहे किसानों की आवाज प्रशासन और परियोजना प्रबंधन तक कब पहुंचती है और डूबती फसल का सरकारी हिसाब कब शुरू होता है।